Month: August 2017

  • ऑनलाइन फंड ट्रांसफर के सरल तरीके

    ऑनलाइन फंड ट्रांसफर के सरल तरीके

    Hand of man with credit card, using a ATM

    अब आपको पैसे ट्रांसफर करने के लिए बैंकों की लाईनों में लगने की जरूरत नहीं है। बैंक बंद हों या आप बैंक से दूर हों ऐसी स्थिति में ऑनलाइन फंड ट्रांसफर आपकी मदद कर सकता है। आप भी जानिए कुछ सरल तरीके-

    ऑनलाइन फंड ट्रांसफर सिस्टम किसी दूसरे के खाते में पैसे ट्रांसफर करने की बेहद सुरक्षित और तेज प्रक्रिया है। इसके लिए आपको अपने बैंक से नेटबैंकिंग फैसिलिटी लेनी होती है। यूजर आईडी और पासवर्ड लेकर आप नेटबैंकिंग के जरिए हर वे काम कर सकते हैं, जिसके लिए आपको बैंक जाना पड़ता है। सरकारी बैंकों में यूजर आईडी और पासवर्ड लेने की लंबी प्रक्रिया है लेकिन निजी बैंकों ने इसे काफी हद तक आसान बनाया हुआ है।
    तीन तरह की फैसिलिटीः
    1. नेट बैंकिंग के जरिए
    2. एटीएम के जरिए
    3. मोबाइल बैंकिंग के जरिए

    1. नेट बैंकिंग से फंड ट्रांसफरः
    नेट बैंकिंग के जरिए फंड ट्रांसफर फैसिलिटी अमूमन दो तरह की होती है। RTGS यानी रियल टाइम ग्रॉस सेटलमेंट और NEFT यानी नैशनल इलेक्ट्रॉनिक फंड ट्रांसफर सिस्टम। इनमें कोई खास फर्क नहीं है, सिवाय इसके कि कुछ बैंकों ने NEFT में फंड ट्रांसफर की लिमिट तय की हुई है। बैंक अकाउंट खुलवाने के दौरान ही आपको नेट बैंकिंग में रजिस्ट्रेशन से संबंधित किट दी जाती है। रजिस्ट्रेशन के बाद आपको अपने पेज पर थर्ड पार्टी ट्रांसफर ऑप्शन में जाना होगा। इसमें लाभार्थी अकाउंट नंबर ऐड करना होगा। नेट बैंकिंग रजिस्ट्रेशन के बाद आप मोबाइल और एटीएम से भी पैसे ट्रांसफर कर सकते हैं।

    2. एटीएम के जरिए फंड ट्रांसफर: तमाम बैंकों ने एटीएम के जरिए भी फंड ट्रांसफर की फैसिलिटी दी हुई है। इसे कार्ड टु कार्ड ट्रांसफर सिस्टम भी कहते हैं। डेबिट कार्ड को एटीएम में डालने या स्वाइप करने के बाद आपको जिसे भी पैसे भेजने हैं, उसका 16 अंकों का डेबिट कार्ड नंबर फीड करना होगा। इसके बाद आपको जितना पैसा ट्रांसफर करना है, वो फीड करना होगा। इसके बाद जैसे ही आप ओके बटन दबाएंगे, आपके अकाउंट से उतनी रकम डेबिट (घट) हो जाएगी यानि पैसा जरूरतमंद के कार्ड में ट्रांसफर हो जाएगा। इस फैसिलिटी के तहत आपको बैंक की ब्रांच में जाने की जरूरत नहीं पड़ेगी और किसी भी एटीएम से काम चल जाएगा। आप एक दिन में 5 हजार और महीने भर में 25 हजार रुपये तक ट्रांसफर कर सकते हैं। हालांकि अभी ये सुविधा शुरुआती दौर में है और नेटवर्किंग प्रक्रिया पूरी नहीं होने से लोगों को दिक्कतें भी होती हैं। फिलहाल स्टेट बैंक ऑफ इंडिया की ही सर्विस कुछ हद तक संतोषजनक है। इसमें पैसे भेजने वाले और प्राप्त करने वाले, दोनों के पास एसबीआई डेबिट कार्ड होना चाहिए। प्राइवेट बैंकों में येस बैंक, आईसीआईसीआई, एचडीएफसी, एक्सिस जैसे तमाम बैंकों ने भी ये फैसिलिटी दी हुई है। ग्राहकों को आकर्षित करने के लिए फिलहाल इस सर्विस पर कोई चार्ज नहीं लिया जा रहा है।

    3. मोबाइल के जरिए फंड ट्रांसफर: इसके लिए पैसे भेजने वाले और उसे हासिल करने वाले के पास मोबाइल मनी आइडेंटिफिकेशन यानी MMID और मोबाइल बैंकिंग का पासवर्ड यानी MPIN होना जरूरी है। इन्हें आप अपने बैंक से हासिल कर सकते है। अब अपने मोबाइल से *99# डायल करें और ध्यान से निर्देश सुनें। अमूमन डायल पैड पर 3 नंबर दबाने पर फंड ट्रांसफर प्रॉसेस शुरू होता है। इसमें आपको फंड प्राप्तकर्ता का 10 अंकों का मोबाइल नंबर और उसके बाद स्पेस देकर 7 अंकों का MMID डालना होता है। इसके बाद जितनी रकम आपको भेजनी है, वो भरनी होगी। फिर आपको बैंक से पूर्व में मिली हुई MPIN (मोबाइल बैंकिंग का पासवर्ड) डालकर ट्रांजैक्शन को ओके करना होगा। इसके बाद पैसा जरूरतमंद के पास ट्रांसफर हो जाएगा। मोबाइल बैंकिंग के जरिए आप IMPS माध्यम से भी फंड ट्रांसफर कर सकते हैं। इसमें आपको लाभार्थी का अकाउंट नंबर और 11 अंकों का IFSC कोड डालना होगा। इसके बाद भेजने वाली रकम दर्ज करें। फिर अपना MPIN डालकर ट्रांजैक्शन को ओके करें। पैसा जरूरतमंद तक पहुंच जाएगा। *99# डायल कर आप अपने खाते में रकम से संबंधित जानकारी भी ले सकते हैं और चाहें तो मिनी स्टेटमेंट भी प्राप्त कर सकते हैं।

    NEFT/RTGS
    एनईएफटी या आरटीजीएस को रियल टाइम फंड ट्रांसफर के रूप में भी जाना जाता है। यह एक ऐसी सुविधा है, जिसमें कोई शख्स, कंपनी या फर्म किसी दूसरे के अकाउंट में पैसे का ट्रांसफर कर सकते हैं। यह ट्रांसफर बैंक के वर्किंग पीरियड में होता है। इसमें जो भी ट्रांजैक्शन होता है, उसके लिए रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के पास संबंधित बैंक रिक्वेस्ट भेजते हैं। इसके बाद ही वह पैसा दूसरे शख्स के खाते में ट्रांसफर हो पाता है। इसमें कुछ घंटों का समय लगता है। NEFT के तहत एक निश्चित समय तक बैंक फंड ट्रांसफर रिक्वेस्ट का कलेक्शन करते हैं। इसे कट ऑफ टाइम कहते हैं। यानी आपने फंड ट्रांसफर भले ही किसी भी वक्त किया हो, पैसा फौरन ट्रांसफर नहीं होता। RTGS प्रति ट्रांजैक्शन के आधार पर काम करता है और फंड तत्काल ट्रांसफर होता है।

    IMPS
    IMPS में रियल टाइम वर्किंग होने के चलते आप दिए गए समय के अलावा फंड ट्रांसफर नहीं कर पाएंगे। मसलन रात के वक्त फंड ट्रांसफर की सुविधा आपको नहीं मिलती। इसके लिए बैंकों ने विकल्प के तौर पर IMPS यानी इमीडियेट पेमेंट सर्विस भी शुरू की हुई है। इसमें आप किसी के भी खाते में कभी भी पैसे ट्रांसफर कर सकते हैं। हालांकि दूसरे काम मसलन रिचार्ज या बिल पेमेंट नहीं कर पाएंगे। इसमें न तो समय की बाध्यता है, न दिन की। छुट्टी के दिन भी आप इसका फायदा उठा सकते हैं।

    इंटर बैंक और इंटर एकाउंट मनी ट्रांसफर: इसमें पैसों का लेन-देन बैंक के नेटवर्क के बीच में ही होता है। यह सिस्टम रियल टाइम आधार पर काम करता है। इसके तहत एकाउंट होल्डर किसी भी वक्त अपने या उसी बैंक में किसी तीसरे व्यक्ति के एकाउंट में पैसे ट्रांसफर कर सकता है। रियल टाइम सिस्टम के जरिए ट्रांसफर की गई राशि तुरंत उस एकाउंट में क्रेडिट हो जाती है। इसमें पैसे ट्रांसफर की कोई लिमिट नहीं है। बैंक इस सुविधा के लिए कोई चार्ज नहीं वसूलते हैं।

    यूपीआई:यूनिफाइड पेमेंट इंटरफेस सर्विस का नेशनल पेमेंट कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (एनपीसीआई) तेजी से विस्तार करने की तैयारी में है। यूपीआई एक यूनिक पेमेंट सॉल्यूशन है जिसे यूपीआई समर्थित किसी भी एप को ई-मेल, आधार नंबर और मोबाइल नंबर से एक्टिवेट कर सकते हैं।
    यूपीआई की मदद से एक से ज्यादा बैंक एकाउंट को एक साथ हैंडल किया जा सकता है। साथ ही किसी भी बैंक एकाउंट में पेमेंट करने के लिए एकाउंट नंबर की जरूरत नहीं होगी। कोई भी व्यक्ति किसी के भी बैंक एकाउंट में भुगतान उसके मोबाइल नंबर या बैंक के साथ लिंक ई-मेल एड्रेस के जरिए कर सकेगा। मसलन, इनमें से अगर कोई भी एक जानकारी रिसीवर के बैंक एकाउंट से लिंक है, तो उसके एकाउंट में फंड ट्रांसफर किया जाना संभव होगा। आपको बता दें कि इसके जरिए फंड ट्रांसफर रियल टाइम में किया जा सकेगा। यूजर के लिए यह सर्विस 24 घंटे उपलब्ध रहेगी।

  • डेरा सच्चा सौदा के समर्थक हत्याएं और आगजनी पर उतरे

    डेरा सच्चा सौदा के समर्थक हत्याएं और आगजनी पर उतरे

    पंचकूला(विनीत कुमार)।डेरा सच्चा सौदा के प्रमुख गुरमीत राम रहीम को सीबीआई की विशेष अदालत ने बलात्कार मामले में दोषी करार दिया है। उन्हें इस मामले में सजा 28 अगस्त को सुनाई जाएगी।अदालत के इस फैसले के बाद उनके समर्थकों ने पंजाब और हरियाणा में कई हिंसक वारदातों को अंजाम दिया जिससे पच्चीस से अधिक लोग मारे गए हैं। करोड़ों रुपयों की संपत्ति जला दी गई है। दो रेलवे स्टेशनों को आग में फूंक दिया गया है। हाईकोर्ट ने डेरा सच्चा सौदा की पूरी संपत्ति को राजसात करने के आदेश दिए हैं। अदालत ने कहा है कि डेरा समर्थक जिस सार्वजनिक संपत्ति को क्षति पहुंचाएंगे उसकी कीमत डेरा की संपत्ति से वसूल की जाएगी।

    प्रशासन ने हरियाणा के पंचकुला और पंजाब के फिरोजपुर, बठिण्डा और मानसा में कर्फ्यू लगा दिया गया है. फतेहाबाद, जयतो और फरीदकोट को रेड अलर्ट पर रखा गया है.हरियाणा के पुलिस महानिदेशक ने बताया है कि राज्य में 2500 लोगों को हिरासत में लिया गया है. राज्य के गृह सचिव राम निवास के मुताबिक हरियाणा में हालात नियंत्रण में है. समाचार एजेंसियों के मुताबिक दिल्ली के उपराज्यपाल अनिल बैजल ने दिल्ली पुलिस कमिश्नर को जानोमाल की हिफाजत के लिए एहतियाती कदम उठाने के लिए कहा है. हरियाणा के सिरसा में हालात पर काबू करने के लिए पुलिस ने सेना की मदद मांगी है.

    दिल्ली पुलिस ने बताया है कि हिंसा फैलाने के मामले में दिल्ली से तीन लोगों को गिरफ्तार किया गया है. दो लोगों को बदरपुर से गिरफ्तार किया गया है जबकि एक व्यक्ति को ख़्याला से गिरफ्तार किया गया है.संगरूर में पुलिस ने चार लोगों को पेट्रोल बम के साथ गिरफ्तार किया है. पंचकुला में कुछ सरकारी इमारतों में भी आग लगा दी गई है.हरियाणा के मुख्यमंत्री के मीडिया सलाहकार अमित आर्य ने एक बयान जारी कर बताया, “हमने पंचकुला में कर्फ्यू लगाया है. आगे की कार्रवाई के लिए हरियाणा कैबिनेट की बैठक की जा रही है.”

    हरियाणा और पंजाब में हो रही हिंसा का असर रेल यातायात पर भी पड़ा है. रेलवे के प्रवक्ता अनिल सक्सेना ने बताया है कि उत्तर रेलवे ने इस रूट से आने वाली ट्रेनों को रद्द कर दिया है.
    रेलवे प्रवक्ता ने दिल्ली के आनंद विहार रेलवे स्टेशन पर खड़ी रीवा एक्सप्रेस के दो डिब्बों को आग लगाए जाने की घटना पर स्पष्टीकरण भी दिया है. सक्सेना ने कहा, “आनंद विहार में एक घटना सामने आई थी लेकिन ये डिब्बे यार्ड में खड़े थे और किसी ने इनमें आग लगा दी. लेकिन किसी भीड़ के इसमें शामिल होने की बात सामने नहीं आई है.”

    हिंसा की घटनाओं के चलते 26 अगस्त को पंजाब के कई ज़िलों में स्कूल और कॉलेजों को बंद रखने के लिए कहा गया है. राजस्थान के गंगानगर ज़िले में इंटरनेट सेवाएं बंद की गई हैं.
    दिल्ली मेट्रो को भी अलर्ट पर रखा गया है. समाचार एजेंसी ने सीआईएसएफ़ के महानिदेशक ओपी सिंह के हवाले से बताया कि उत्तर प्रदेश और हरियाणा से लगे सभी स्टेशनों पर चौकसी बढ़ा दी गई है.

    उधर, डेरा सच्चा सौदा के एक प्रवक्ता डॉक्टर दिलावर इंशा ने कहा है, “हमारे साथ अन्याय हुआ है. हम अपील करेंगे. हमारे साथ वही हुआ है जो इतिहास में गुरुओं के साथ हुआ था. डेरा सच्चा सौधा मानवता की भलाई के लिए है. सभी शांति बनाएं रखें.”

    पंजाब के मानसा और मलोट में रेलवे स्टेशन को डेरा समर्थकों ने आग लगा दी है. फिरोजपुर में प्रशासन ने कर्फ्यू जैसे क़दम उठाने के लिए कहा है. अमृतसर और तरणताल में पुलिस के आला अधिकारियों की बैठक हो रही है.रेड अलर्ट के साथ-साथ सीमा पर चौकसी बढ़ा दी गई है. पंजाब और हरियाणा के कई स्थानों से डेरा समर्थकों द्वारा हिंसा की ख़बरें मिल रही हैं. सुरक्षा बलों और डेरा समर्थकों के बीच झड़प में 11 लोगों की मौत की पुष्टि हुई है. कई लोग घायल हुए हैं.

    हरियाणा के पंचकुला और पंजाब के फिरोजपुर, बठिण्डा और मानसा में कर्फ्यू लगा दिया गया है.
    उधर, पंजाब और हरियाणा दोनों राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने डेरा समर्थकों से अमन और शांति बनाए रखने की अपील की है. कैप्टन अमरिंदर सिंह ने कहा है कि हम किसी को राज्य में माहौल ख़राब करने की इजाजत नहीं देंगे.

    मई 2002 में डेरा सच्चा सौदा प्रमुख गुरमीत सिंह पर यौन शोषण के आरोप लगाते हुए डेरा की एक साध्वी ने गुमनाम पत्र तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को भेजा था. जिसकी एक प्रति पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश को भी भेजी गई.हाईकोर्ट ने 24 सितंबर 2002 को साध्वी यौन शोषण मामले में जांच के आदेश दिए.पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय ने 10 नवंबर 2003 को सीबीआई को एफआईआर दर्ज कर जांच के आदेश जारी किए.

  • छात्रवृत्ति जिसे दें उसका आधार नंबर लिखेंःआर्य

    छात्रवृत्ति जिसे दें उसका आधार नंबर लिखेंःआर्य

    भोपाल,23 अगस्त(पीआईसीएमपीडॉटकॉम)।
    अनुसूचित जाति कल्याण राज्य मंत्री लाल सिंह आर्य ने निर्देश दिये हैं कि विभाग की सभी छात्रवृत्ति योजना को आधार नम्बर से लिंक किया जाये। उन्होंने निर्देश दिये कि विभाग में सामग्री खरीदी जेम के माध्यम से ही हो। श्री आर्य आज अनुसूचित जाति कल्याण विभाग की गतिविधियों की समीक्षा कर रहे थे। इस मौके पर प्रमुख सचिव आशीष उपाध्याय और आयुक्त श्रीमती दीपाली रस्तोगी उपस्थित थी।

    विभिन्न योजनाओं का कम्प्यूटर डॉटाबेस तैयार किया जाये

    श्री आर्य ने कहा कि अनुसूचित जाति-जनजाति वर्ग के बच्चों के लिये संचालित विभिन्न योजना का डॉटाबेस तैयार किया जाये। योजनाओं का कम्प्यूटर के माध्यम से ऐनालेसिस हो। उन्होंने निर्देश दिये कि मुख्यमंत्री बच्चों से सीधा संवाद स्थापित कर सके, ऐसी व्यवस्था बनाये। इसके लिये सूचना प्रौद्योगिकी विभाग से सहयोग लिया जाये।

    श्री आर्य ने विभिन्न योजनाओं में जिला स्तर पर की गई कार्यवाही की मॉनीटरिंग को कहा। उन्होंने कहा कि इस संबंध में कलेक्टर, संभागीय अधिकारी और जिला संयोजक को पत्र जारी किया जाये। श्री आर्य ने निर्देश दिये कि पिछले वर्ष अस्पृश्यता निवारणार्थ किन पंचायतों का सम्मान किया गया और इस वर्ष कौन-सी पंचायतों का चयन किया गया है, इसकी जानकारी मंगवाई जाये। उन्होंने अस्पृश्यता निवारण शिविर की जानकारी भी एकत्रित करने को कहा।

    सोशल मीडिया के जरिये उपलब्धि का हो प्रचार-प्रसार

    श्री लाल सिंह आर्य ने विभाग की उपलब्धियों को सोशल मीडिया के जरिये प्रचारित करने के निर्देश दिये। उन्होंने अनुसूचित जाति और आदिम जाति कल्याण विभागों की योजनाओं की उपलब्धियों और लाभार्थियों की संख्या आदि का प्रचार-प्रसार करने को कहा। उन्होंने विशेष अवसरों का एक वार्षिक रूट चार्ट तैयार करने के निर्देश भी दिये।

    क्रीड़ा महाकुंभ या ओलपिंक जैसे कार्यक्रम की शुरूआत

    राज्य मंत्री श्री आर्य ने लोकप्रिय खिलाड़ी से समारोह में खेलकूद गतिविधियों के उत्कृष्ट खिलाड़ियों का सम्मान करवाने को कहा। उन्होंने खेल प्रतिभाओं को निखारने के लिये राज्य स्तर पर बड़े शहरों में क्रीड़ा महाकुंभ या ओलपिंक जैसे कार्यक्रम की शुरूआत करने को कहा।

    दो से 5 अक्टूबर स्वच्छता और वृक्षारोपण के होंगे कार्यक्रम

    श्री आर्य ने दो अक्टूबर महात्मा गाँधी जयंती से 5 अक्टूबर महर्षि वाल्मीकी के प्रकटोत्सव तक छात्रावास और आश्रम शालाओं में स्वच्छता अभियान और वृक्षारोपण का अभियान चलाने के निर्देश दिये। उन्होंने अभियान में स्थानीय जन-प्रतिनिधियों को भी जोड़ने को कहा।

    बाल संसद शुरू करने के निर्देश

    श्री आर्य ने नेतृत्व विकास शिविर में भारत या मध्यप्रदेश दर्शन कार्यक्रम को जोड़ने के निर्देश दिये। साथ ही उन्होंने राष्ट्रीय भावना से ओत-प्रोत, ‘राष्ट्र निर्माण में युवाओं की भूमिका’ विषय पर बच्चों की बाल-संसद शुरू करने को भी कहा। उन्होंने राष्ट्रीय स्तर के विषय पर वाद-विवाद प्रतियोगिता करने और डाक्यूमेन्ट्री फिल्म दिखाने के निर्देश दिये।

    अधिकारियों की तरह कर्मचारियों का भी हो प्रशिक्षण

    राज्य मंत्री श्री लाल सिंह आर्य ने इस साल का अधिकारियों का प्रशिक्षण प्रशासन अकादमी के माध्यम से करवाने को कहा। उन्होंने ग्वालियर, जबलपुर, इंदौर और भोपाल में जिला स्तरीय कर्मचारियों का प्रशिक्षण करने को भी कहा। उन्होंने स्व-सहायता समूह को ऋण देने के पूर्व प्रशिक्षण देने की योजना भी तैयार करने के निर्देश दिये। श्री आर्य ने अनुसूचित जाति कल्याण विभाग में अमले की कमी की पूर्ति करने के लिये आदिम जाति कल्याण विभाग से अमला लेने का प्रस्ताव देने को कहा।

    निर्माणाधीन भवनों के कार्यों की होगी समीक्षा

    श्री आर्य ने अनुसूचित जाति-जनजाति की विद्यार्थियों को आवास सहायता योजना को लोकसेवा गारंटी से जोड़ने और विभागीय छात्रावास का मूल्यांकन करवाने को कहा। श्री लाल सिंह आर्य ने पीआईयू के जरिये बनाये जा रहे भवन निर्माण की प्रगति और समय-सीमा की जानकारी के साथ समीक्षा बैठक करने को कहा।

    बताया गया कि अंतर्जातीय विवाह प्रोत्साहन योजना में वर्ष 2016-17 में 110 जोड़ों को लाभान्वित किया गया। वर्ष 2015-16 में 152 स्व-सहायता समूह को लाभान्वित किया गया। पीआईयू के जरिये 120 छात्रावास भवन बनाये जा रहे हैं। ऑनलाइन पद्धति के जरिये लगभग 22 लाख विद्यार्थियों को प्री और पोस्ट मेट्रिक छात्रवृत्ति दी जा रही है।

  • चीनी माल का बहिष्कार करेंःइंद्रेश कुमार

    चीनी माल का बहिष्कार करेंःइंद्रेश कुमार

    भोपाल21 अगस्त,(पीआईसीएमपीडॉटकॉम)।भारत ने कभी किसी देश की जमीन हड़पने का प्रयास नहीं किया। इसके बावजूद चीन और पाकिस्तान जिस तरह की चालें चल रहे हैं उन्हें पता ही नहीं चल रहा कि उनकी जमीन कैसे खिसक रही है। पाकिस्तान ने यदि भारत से द्वेष बंद नहीं किया तो निकट भविष्य में वह अपना मौजूदा अस्तित्व ही गंवा देगा। इसी तरह चीन समुद्र की ओर बढ़ने की ललक में दुनिया से टकराव की नीति पर चल रहा है। दक्षिणी सागर में तेरह देश मिलकर चीन की लूट रोकने के लिए जुट गए हैं। उसके सभी पड़ौसी देशों से संबंध खराब हैं और वह बिखरने की कगार तक पहुंच गया है। हिंद बलोच फोरम के आव्हान पर आज भोपाल में एकत्रित जनसमूह को संबोधित करते हुए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य इंद्रेश कुमार ने ये बातें कहीं।

    हिंद बलोच फोरम पाकिस्तान में बेहतर जीवन की लड़ाई लड़ रहे बलोचिस्तान के नागरिकों के हित में आवाज बुलंद कर रहा है। इस संगठन का उद्देश्य देश विदेश में बलोचिस्तान के नागरिकों के मानवाधिकारों के हनन की आवाज बुलंद करना है।……. जम्मू कश्मीर और बलोचिस्तान में पाकिस्तान का बर्बर चेहरा….. विषय पर आयोजित इस सेमिनार में देश के कई जाने माने विशेषज्ञों ने भी अपने विचार व्यक्त किए। इनमें हिंद बलोच फोरम के संयोजक स्वामी जितेन्द्रानंद सरस्वती,हिंद बलोच फोरम के अध्यक्ष और जाने माने ज्योतिषाचार्य पवन सिन्हा (गुरुजी), राजनीतिक विश्लेषक और पाकिस्तान मामलों के जानकार पुष्पेन्द्र कुलश्रेष्ठ, हिंद बलोच फोरम के राष्ट्रीय सूत्रधार गोविंद शर्मा,रक्षा विशेषज्ञ कर्नल आरएसएन सिंह ने भी अपने विचार व्यक्त किए। फादर मरिया स्टीफेन और सभी धर्मगुरु भी इस अवसर पर उपस्थित थे।स्थानीय स्तर पर आयोजित इस कार्यक्रम के संयोजक गजेन्द्र सिंह चौहान, अश्विनी, अजय ठाकुर एवं कई अन्य युवाओं ने कार्यक्रम को सफल बनाने में अपना सक्रिय सहयोग दिया। भारत और बलोचिस्तान की बहनों ने राखी बांधकर इस आयोजन को स्नेह सूत्र में पिरोया।

    हिंदू मुस्लिम एकता के लिए बरसों से कार्य कर रहे संघ के स्वयंसेवक इंद्रेश कुमार ने कहा कि हम कभी पाकिस्तान,इस्लाम या मुसलमान के विरोधी नहीं रहे। पाकिस्तान हमारी इच्छा के विरुद्ध बनाया गया था। तत्कालीन नेताओं नेहरू और जिन्ना ने इसमें भले ही सहमति दी हो पर दोनों देशों के नागरिक इस बंटवारे से न तो तब सहमत थे और न आज। पाकिस्तान के मौजूदा शासक इसके बावजूद आज भारत से द्वेष पैदा कर रहे हैं और चीन से गलबहियां डाल रहे हैं। इसके कारण पाकिस्तान के लोगों में भय फैल गया है कि चीन कहीं भविष्य में हमें तिब्बत की तरह गड़प न कर जाए।

    उन्होंने कहा कि लार्ड माऊंटबैटन के जिस कागज पर नेहरू और जिन्ना ने हस्ताक्षर किए थे वो आजादी का नहीं विभाजन का दस्तावेज था। इस विभाजन से दोनों देशों के तीन करोड़ लोग उजड़ गए, दस लाख लोगों का कत्लेआम हुआ, चार लाख बहनों ने आत्महत्या की या बलात्कार के बाद उनकी हत्या कर दी गई, छह लाख लोगों को धर्म परिवर्तन करना पड़ा। उन्होंने बताया कि आजादी के जश्न में बापू स्वयं मौजूद नहीं थे। एक भी दस्तावेज या वीडियो नहीं है जिसमें उन्होंने आजादी का संदेश दिया हो। उन्होंने इस अवसर पर झंडा भी नहीं फहराया। वे तो चाहते थे कि स्वाधीनता आंदोलन के दौरान कांग्रेस के बैनर पर देश के लोगों को एकजुट किया गया था। इसलिए इसे राजनीतिक दल का स्वरूप न दिया जाए। इसके बावजूद चंद स्वार्थी लोगों ने अपनी राजनीति चमकाने के लिए स्वाधीनता संग्राम की याद दिला दिलाकर देश को लूटा। आज कांग्रेस के नेताओं से पूछा जाना चाहिए कि उन्होंने स्वाधीनता संग्राम में कब भागीदारी की जो सेनानियों के नाम पर आज तक देश का दोहन कर रहे हैं।

    श्री इंद्रेश कुमार ने कहा कि जो लोग देश के अन्य राज्यों से पाकिस्तान पहुंचे थे वे आज मुहाजिर कहे जाते हैं। पाकिस्तान के लोगों ने कानून बनाकर उन्हें शरणार्थी का दर्जा दिया और वे आज भी पाकिस्तान के नागरिक नहीं बन सके हैं। आज वे कह रहे हैं कि अपने बुजुर्गों की गलती के लिए वे भारत से क्षमा चाहते हैं। भारत अपने प्रभाव का उपयोग करके उन्हें या तो पाकिस्तान का नागरिक बनवाए या हमें भारत में वापस शामिल कर ले। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान के सिंध, गिलगित, बाल्टिस्तान के लोगों ने कभी पाकिस्तान नहीं मांगा था। बलूचिस्तान और सिंध के लोगों ने तो बाकायदा दिल्ली आकर पंडित नेहरू से ये विभाजन रोकने का अनुरोध किया था पर वे नहीं माने। पाकिस्तान की फौजें उन्हें नियंत्रण में रखने के लिए दो लाख मुस्लिमों का कत्ल कर चुकी है। यही वजह है कि पाकिस्तान में नो मोर पाकिस्तान का नारा देने वाले सात संगठन अपनी आवाज उठा रहे हैं। पाकिस्तान नफरत के मार्ग पर चल रहा है इसलिए वह विकास की दौड़ में पिछड़ता जा रहा है।

    कश्मीर की मुख्यमंत्री मेहबूबा मुफ्ती और नेशनल कांफ्रेंस के अध्यक्ष व लोक सभा सांसद फारूख अब्दुला के बयानों के बारे में इंद्रेश कुमार ने कहा कि एक बार अनुच्छेद 35 ए को हटाकर जरूर देख लिया जाना चाहिए कि इसका क्या असर होता है। हो सकता है इसी से कोई रास्ता निकल आए। मेहबूबा मुफ्ती के बयान पर कटाक्ष करते हुए उन्होंने कहा कि तिरंगे की मौत नहीं हो सकती इसलिए इसका जनाजा भी नहीं निकल सकता। इसलिए इस तरह की बातें फिजूल हैं। उन्होंने युवाओं से आव्हान किया कि वे कश्मीर में जमीन खरीदने और बसने के लिए तैयार रहें।

    उन्होंने कहा कि भारत का हिंदू कभी मुसलमान के खिलाफ नहीं रहा। जब बाबरी ढांचे को ढहाने देश भर से स्वयंसेवक अयोध्या पहुंच रहे थे तो उन्होंने किसी दूसरी मस्जिद को हाथ भी नहीं लगाया। किसी भी मुसलमान को चांटा भी नहीं मारा। इस सच्चाई के बावजूद यदि कोई हिंदू को मुसलमानों का दुश्मन बताए तो ये उसके शैतानी दिमाग की उपज ही हो सकती है। पूर्व राष्ट्रपति हामिद अंसारी के बयान के बारे में उन्होंने कहा कि देश भर में कश्मीर के लाखों छात्र विभिन्न राज्यों में पढ़ते हैं कहीं भी उनसे वैमनस्य नहीं रखा जाता है। इसके बावजूद यदि कोई कहता है कि भारत का मुसलमान डरा हुआ है तो वह जिस देश को सुरक्षित समझता है वहां चला जाए। किसी को भारत का माहौल खराब करने की अनुमति नहीं दी जा सकती।

    श्री इंद्रेश कुमार ने कहा कि भारत की कूटनीतिक सफलता ही तो है कि आज दुनिया का एक भी देश चीन का मित्र नहीं है। पाकिस्तान भी पूरी दुनिया से अलग थलग पड़ गया है पर दुनिया के तमाम देश भारत के मित्र हैं। हम कन्फ्यूशियस वाले चीन के पक्षधर हैं, कम्युनिस्ट चीन के नहीं। डोकलाम में हमने अपनी अतिरिक्त सेना तैनात की है। हम युद्ध नहीं चाहते वार्ता से टकराव टालने का प्रयास कर रहे हैं। चीन यदि टकराव का रास्ता अपनाएगा तो इस नकारात्मक सोच के चलते वह बिखर भी जाएगा। उन्होंने कहा कि चीन और पाकिस्तान को सन्मार्ग पर लाने के लिए देश के लोगों को आगे आना होगा। भारत ने चीन को कच्चे माल की सप्लाई बंद कर दी है। हम लोगों से ये भी अपील कर रहे हैं कि तीज त्योहार से लेकर रोज की पूजा तक में इस्तेमाल होने वाले चीन के माल का उपयोग बंद कर दें।उन्होंने लोगों को चीन और पाकिस्तान की विस्तारवादी सोच से उपजे आतंकवाद से मुक्ति के लिए प्रार्थना करने का अनुरोध किया।

  • जन ज्वार का नट सम्राट अमितशाह

    जन ज्वार का नट सम्राट अमितशाह

    भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने आज भोपाल में मुख्यमंत्री मेधावी योजना का शुभारंभ किया।

    - भरतचन्द्र नायक
    भारतीय जनता पार्टी ने राजनीति के विशिष्ठ पड़ाव पर ऐसे समय जब तीन दशकों से केन्द्र में स्पष्ट बहुमत मिलना लगभग असंभव मान लिया गया 16 वी लोकसभा के चुनाव 2014 में प्रचार अभियान की कमान दूसरी पीढ़ी को सौंपी। संघ और पार्टी ने लीक से हटकर कमान सौंपी तब सभी विस्मित थे। चुनाव अभियान की कमान नरेन्द्र मोदी ने संभाली और पार्टी तथा मतदाताओं के बीच विश्वास का सेतु बनाने में सफलता पायी। लोकसभा चुनावों में पार्टी ने जीत का गणित लगाया नरेन्द्र मोदी ने उसे आसानी से पूरा कर प्रचंड बहुमत के साथ ऐसे राज्यों तक में पहुंच बनायी जहां जीत का आधार जाति और सम्प्रदाय था। इससे पार्टी के साम्प्रदायिक होने का जो ठप्पा सियासी दल लगाते थे नरेन्द्र मोदी ने उसे तोड़ डाला और वाराणसी और स्वयं लखनऊ से चुनाव जीतकर सभी को आश्चर्य चकित कर दिया। उन्होंने 26 मई 2014 को प्रधानमंत्री पद की शपथ लेने के समय अपने विश्वस्त साथी अमित शाह को केन्द्रीय मंत्री परिषद में शामिल होने की दावत दी लेकिन अमित शाह ने गुजरात में विधायक बने रहकर संगठन के कार्य में रूचि लेना बेहतर समझा। किंग बनने के बजाए उन्हें किंग मेकर की भूमिका में पाकर भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष का ताज संगठन ने सौंपा। काम चुनौतीपूर्ण था, लेकिन 52 वर्षीय अमित शाह ने संगठन के अपने साथियों को नई तकनीक और प्रौद्योगिकी को आत्मसात कर संगठन के विस्तार में जुटने का आव्हान किया। महासदस्यता अभियान में मोबाइल से सदस्यता की शुरूआत का कौशल अपनाकर देश में 11 करोड़ से अधिक सदस्य बनाकर भारतीय जनता पार्टी को देश ही नहीं दुनिया का सबसे बड़ा राजनैतिक दल होने का गौरव हासिल करा दिया। हिन्दी भाषी राज्यों से लेकर पूर्वोत्तर, पश्चिमोत्तर राजयों और दक्षिण के सुदूरवर्ती राज्यों में भारतीय जनता पार्टी की पहचान बना दी।

    राष्ट्रवाद को समर्पित भारतीय जनता पार्टी को दुनिया का सबसे बडा राजनैतिक दल होने का गौरव हासिल कर चीन की वामपंथी पार्टी का दावा काफूूर कर दिया। हिन्दी भाषी सूबों से लेकर पूर्वोत्तर, पश्चिमोत्तर राज्यों और दक्षिण के सुदूरवर्ती राज्यों में भारतीय जनता पार्टी का संगठन गढ़ दिया। नए सदस्यों को वैचारिक रूप से परिपक्व बनाने के लिए पं. दीनदयाल प्रशिक्षण महाअभियान के अंचल मे लाने का महत्वकांक्षी कार्यक्रम आरंभ हुआ और उसमें सफलता भी मिली।

    भारतीय राजनीति में ऐसा दुर्लभ संयोग ही होता है जब शीर्ष पर वैचारिक साम्य बन पाता है। कांग्रेस में भी प्रथम राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री एक ही दल के थे लेकिन वैचारिक आधार पर सोमनाथ मंदिर के निर्माण को लेकर परस्पर विरूद्ध ध्रुवों पर थे लेकिन भाजपा के दो प्रमुख प्रधानमंत्री और पार्टी के राष्टीय अध्यक्ष अमित शाह की केमिस्ट्री ऐसी बनी कि परस्पर अटल विश्वास के धनी साबित हुए। अमित शाह के राज्यसभा चुनाव में जीत हासिल करने के बाद उन्हें केन्द्रीय मंत्रिमंडल में शामिल कर रक्षा मंत्रालय दिए जाने का सुझाव जोरदारी के साथ आया लेकिन अमित शाह की संगठन में असीमित रूचि और मिशन 2019 को ध्यान में रखकर अमित शाह ने स्वयं केन्द्रीय मंत्रीमंडल में शामिल होने से इंकार करके आज की युवा पीढी और सत्ता लोलुप राजनेताओं के समक्ष एक अनुकरणीय आदर्श उपस्थित हुआ है।

    दरअसल प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और राष्टीय अध्यक्ष अमित शाह के वैचारिक साम्य का ही नतीजा है कि संगठन और सरकार के निर्णय समय पर होते है जिनसे राजनैतिक दल और कार्यकर्ता भी चैक जाते है। इसलिए इनके निर्णय के प्रति सदा कोतुहल बना रहता है और दोनों के बीच हुए निर्णय को संगठन आम सामूहिक स्वीकृति मानकर आत्मसात करता है। कमोवेश राष्टपति के चुनाव में प्रत्याशी को लेकर जब रामनाथ कोविंद की घोषणा की गयी उसकी उपयुक्तता को लेकर हर्ष मिश्रित आश्चर्य जनक प्रतिक्रिया देखी गयी। सत्ता और संगठन में नरेन्द्र मोदी और अमित शाह के बीच जो सहमति बनती है वहीं संगठन का अंतिम फैसला माना जाता है। किसी तीसरे की भूमिका नगण्य होती है। अलबत्ता सत्ता और संगठन के स्तर पर जो फैसला लिया जाता है उसकी जानकारी सरसंघचालक डाॅ मोहन भागवत को चर्चा के रूप में होती है। निर्णय लेने में उनकी भी भूमिका नहीं होती है। इससे हर फैसले में अंत तक गोपनीयता का निर्वाह किया जाता है। फैसले के अमल में कठिनाई अथवा अन्यथा कोई परिस्थिति पैदा होने पर वे जवाबदेही की सहर्ष स्वीकार करते है। इस तरह जवाबदेही का भाव बने रहने के साथ कठिनाई का स्पष्टीकरण भी देते है और बता देते है निर्णय दूरदर्शितापूर्ण और कठोर है। प्रसव पीडा तो होगी लेकिन नतीजा राष्ट के व्यापक हित में होगा। नोटबंदी होने पर चैतरफा हमले झेले लेकिन जो भरोसा उन्होंने जनता को दिया कि कालेधन पर चोट भ्रष्टाचार पर अंकुश और आतंकवाद में कमी आयेगी। ऐसा होता देखकर देश की जनता ने कष्टों को गंवारा किया और सत्ता और संगठन की नीयत पर भरोसा किया। गुजरात में विधायक बने रहते 2012 में बहन आनंदी बेन पटेल के मुख्यमंत्री बनने पर उनके कार्यकलाप से अमित शाह संतुष्ट नहीं थे, लेकिन आनंदी बेन पटेल की गुजरात के मुख्यमंत्री पद पर उन्होंने कोई रूचि नहीं दिखायी क्योंकि उन्हें तो भाजपा संगठन का विस्तार और देश में भगवा परचम फहराना उनकी प्रतिबद्धता बन चुकी थी। इस मायने में यदि अमित शाह को चुनावी दांवपैच में माहिर होने, अपनी गुरूवात्कर्षण शक्ति से दूसरे दलों को समीप लाने में महारत होने के कारण उन्हें चुनाव जीतने का तंत्र मंत्र साधक कहा जाए तो अतिश्योक्ति नहीं होगी। उनका कार्यकाल यह प्रमाणित भी करता है कि जिस राजनैतिक दल को साम्प्रदायिक कहकर कथित सेकुलरवादी राजनैतिक अस्पृष्य बना चुके थे आज उसका परचम डेढ दर्जन राज्यों भारत के 70 प्रतिशत भूभाग पर फहरा रहा है।

    वाकया 8 अगस्त का था। राजनैतिक प्रेक्षकों ने देखा कि गुजरात में अमित शाह और केन्द्रीय मंत्री स्मृति ईरानी की जीत प्रत्याषित थी ही लेकिन जिस कांग्रेस के पास सदन में 50 सदस्य थे और सोनिया गांधी के राजनैतिक सलाहकार अहमद भाई पटेल का जीतना आसान था कांग्रेस अपना घर संभालने में विवश दिखी। उसे अपने झुंड को सुरक्षित रखने के लिए कांग्रेस शासित कर्नाटक सरकार का संरक्षण लेना पडा। कहने की गरज ये कि अमित शाह ने नरेन्द्र मोदी के लक्ष्य कांग्रेस मुक्त भारत को पूरा करने में सारी शक्ति केन्द्रित कर दी है। अमित शाह के राज्यसभा में पहुंचने के साथ लोगों का सोचना है कि वे संसद भवन में प्रधानमंत्री के सबसे निकटतम और सबसे विश्वस्त व्यक्ति होंगे। ऐेसे लोंगों का यह सोच भी है कि उन्हें केन्द्र में रक्षामंत्री बनाकर संगठन की बागडोर केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्री को सौंपी जा सकती है। लेकिन अमित शाह को आने वाले दिनों में गुजरात में होने वाले विधानसभा चुनाव अहम होंगे और वे शायद ही संगठन से निकलकर सत्ता की पगडंडी पर कदम बढायेंगे। गुजरात के चुनाव में प्रधानमंत्री और राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह की साख पर गंभीर चुनौती होगी जिसे देखते हुए प्रधानमंत्री और संगठन शायद ही अमित शाह के प्रभार में परिवर्तन करे।

    इतिहास पर नजर दौडाए तो 1925 में राष्ट्र निर्माण के अनुष्ठान के रूप में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ने सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का सपना देखा था। उसे पूरा करने के लिए उपयुक्त तंत्र भी आवश्यक और अपेक्षित था। उपयुक्त तंत्र विकसित करने के लिए अटलजी और आडवाणी के करिश्मायी व्यक्तित्व को नहीं भुलाया जा सकता लेकिन उनकी सफलता आंशिक थी। नरेन्द्र मोदी और अमित शाह को इसका श्रेय मिलना ही चाहिए कि भारतीय गणतंत्र में आज सर्वोच्च पद पर राष्ट्रपति के रूप में रामनाथ कोविद, उपराष्ट्रपति वैंकेया नायडू और प्रधानमंत्री के पद पर नरेन्द्र मोदी विराजमान है। लोकसभा अध्यक्ष पद पर सुमित्रा महाजन है। इस पद पर रहकर वे पहले ही दलीय संबंध तोड चुकी है। लेकिन यह एक सुखद संयोग और कोतुहल जनक परिघटना है कि चारों राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की उपज है। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के स्वयंसेवक है। भारतीय राजनीति में न तो इनकी परंपरागत पहचान है और न इनका कोई गाॅडफादर रहा है। स्वयंसेवक की पहचान और राष्ट्र को वैभव के चरम शिखर पर पहुंचाना इनकी प्रतिबद्धता जरूर रही है। इन्हें राष्ट्र ने जो गंभीर दायित्व सौपा है वह फूलों की सेज नहीं कांटो का ताज है। एक करोड पच्चीस लाख लोगों की निगाहे इनके हर कदम पर गढी हुई हैै। यह इनके लिए यहां स्वर्णिम अवसर है वहीं गंभीर चुनौती भी है। सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की चर्चा विश्व पटल पर हो रही है, जिसे कथित सेकुलरवादी साम्प्रदायिक बताते हुए अस्तांचल की ओर बढ रहे है।

  • लोकप्रियता के समुंदर से सार्थकता के रत्न ढूंढती भाजपा

    लोकप्रियता के समुंदर से सार्थकता के रत्न ढूंढती भाजपा

    -आलोक सिंघई-
    भारत के चुनाव आयुक्त और मध्यप्रदेश कैडर के 1977 बैच के भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी रहे ओ.पी.रावत ने दो टूक लहजे में कहा है कि राजनीतिक पार्टियां केवल चुनाव जीतने का लक्ष्य लेकर चल रहीं हैं। इसमें नैतिकता को ताक पर धर दिया जा रहा है। लोकतंत्र तभी सार्थक है जब निष्पक्षता और पारदर्शिता को बनाए रखा जाए। उन्होंने ये सलाह गुजरात राज्यसभा चुनाव में दो कांग्रेस विधायकों की क्रास वोटिंग के मुद्दे पर दी है। ये सलाह भी तब आई है जब भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह मध्यप्रदेश के दौरे पर आए हैं। श्री रावत स्वयं मध्यप्रदेश कैडर के आईएएस अधिकारी हैं। वे मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के राजनीतिक गुरु सुंदरलाल पटवा के भी करीबी रहे हैं। जाहिर है उनके इस बयान के कई अर्थ लगाए जाने लगे हैं। कांग्रेस और खासतौर पर राज्य सभा सदस्य अहमद पटेल आरोप लगाते रहे हैं कि अमित शाह उनके विधायकों को खरीदकर उनकी पार्टी में विद्रोह फैलाना चाहते थे। हालांकि ये बातें करना कांग्रेस और उसके किसी भी नेता को शोभा नहीं देता क्योंकि कांग्रेस का इतिहास ही तोड़ फोड़ और अवसरवादिता पर टिका है। उसने हमेशा अपने विरोधियों की सरकारें गिरवाईं और जोड़ तोड़ से सत्ता हासिल की है।इसके बावजूद इस पर चिंतन तो होना ही चाहिए कि लोकतंत्र को मजबूती कैसे मिल सकती है।

    राजनीति हमेशा सत्ता का लक्ष्य लेकर की जाती है। जाहिर है कि सत्ता के लिए आवश्यक गठबंधन करना कई बार राजनेताओं की मजबूरी भी होती है। इसमें किसी नौकरशाह की सलाह का कोई अर्थ नहीं है। दरअसल नौकरशाह को इसकी सलाह भी नहीं देनी चाहिए। उसका काम तो सिर्फ कानून की कसौटी लागू करना है। भारतीय जनता पार्टी पर वामपंथी विचारकों ने दक्षिणपंथी होने का ठप्पा लगा रखा था। आज भी वे भाजपा को फासीवादी नीतियों पर चलने वाली, तानाशाही शैली अपनाने वाली और आरएसएस की कठपुतली पार्टी बताते हैं। वे ये मानने तैयार ही नहीं हैं कि भाजपा ने उनकी ही चौपड़ पर उन्हें मात दे दी है। उसने भी वही चाल चली जो कभी कांग्रेस और उनके वामपंथी सहयोगी चलते रहे हैं। जाहिर है आज कांग्रेस यदि भाजपा की राजनीतिक शैली की आलोचना करती है तो ये उसकी खीज के अलावा कुछ नहीं है।

    मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान जबसे सत्ता पर काबिज हुए हैं तभी से कांग्रेस और उसके सहयोगी खुसर पुसर करते रहे हैं कि शिवराज जी की कुर्सी तो बस कुछ दिनों की ही है। उनकी कनबतियों पर गौर करके कुछ पत्रकार बंधु भी शिवराज जी की विदाई की खबरें बनाते रहते हैं। अमित शाह ने सबसे पहले इसी चर्चा पर ये कहते हुए विराम लगा दिया कि अगला चुनाव तो मध्यप्रदेश में शिवराज जी के नेतृत्व में ही लड़ा जाएगा। उनके इस बयान से शिवराज जी के प्रतिद्वंदियों में खलबली मच गई है। उन्हें अपनी आशाओं और मनोकामनाओं पर तुषारापात होता नजर आ रहा है। दरअसल उनके कई प्रतिद्वंदियों की चापलूसों की फौज बार बार माहौल बनाती रहती है कि बस अगले मुख्यमंत्री आप बनने जा रहे हैं।

    भारत की भाग्यविधाता बन चुकी भारतीय जनता पार्टी इन दिनों कुछ खास फार्मूलों पर चल रही है। कांग्रेस के परिवारवादी नेतृत्व ने व्यक्तिवाद की जो लहर चलाई उसने कांग्रेस के सार्वजनिक मंच को खेमों में बदल दिया है। परिवार सर्वोपरि की अवधारणा ने कांग्रेस में इतना ठहराव ला दिया कि उसकी राजनीति बदलाव को नकारने वाली बनकर रह गई है। इसके विपरीत भारतीय जनता पार्टी राष्ट्र्रवाद की अवधारणा पर चल रही है। उसने चेहरों का गणित भी नहीं छोड़ा है लेकिन वह एक कार्पोरेट कल्चर में भी काम कर रही है। जाहिर है कि इस प्रक्रिया में चेहरों का ज्यादा महत्व नहीं बचा है। इसलिए मध्यप्रदेश में शिवराज जी सत्ता का चेहरा रहें या नरोत्तम मिश्रा, कैलाश विजयवर्गीय या नरेन्द्र सिंह तोमर को सत्ता सौंप दी जाए कोई फर्क पड़ने वाला नहीं है।
    फिर सबसे बड़ी बात तो ये भी है कि सत्ता पर बार बार फेरबदल राजनीतिक दल के सहयोगियों के लिए भी असुविधाजनक होता है। शिवराज जी के नेतृत्व में भाजपा की यात्रा समतावादी नजरिए से चल रही है। इसमें हर वो व्यक्ति लाभान्वित हो रहा है जिसने लाभ पाने का प्रयास किया। फिर चाहे वो भाजपा से जुड़ा हो या कांग्रेस से या किसी और अन्य दल से कोई फर्क नहीं पड़ता। यही वजह है कि प्रदेश में राजनीतिक बदलाव की आवाज बुलंद नहीं हो सकी है। कांग्रेस के दिग्गज नेता कमलनाथ हों या दिग्विजय सिंह, अजय सिंह हों या मुकेश नायक सभी सत्ता की सुराही का मयपान कर रहे हैं। हालत ये है कि इनकी राह में आने वाले कट्टर भाजपाई भी राह से हटा दिए जाते हैं। अब इन हालात में शिवराज जी का विरोध केवल दिखावा ही बनकर रह गया है। शिवराज जी ने अपने सलाहकार के रूप में प्रमोटी आईएएस अधिकारी एस.के.मिश्रा को तैनात कर रखा है। वे मुकेश नायक जी के रिश्तेदार हैं। अब हालत ये है कि किसी प्राचार्य की नियुक्ति के लिए भी जब मुकेश नायक अनुरोध करते हैं तो विभाग के मंत्री न केवल उनके आदेश का पालन करते हैं बल्कि फोन करके उन्हें जताते भी हैं। इसी तरह नर्मदा विकास प्राधिकरण में उपाध्यक्ष पद पर पिछले सत्रह सालों से पदस्थ आईएएस रजनीश वैश को सत्ता और विपक्ष सभी के नेता अपना संरक्षक मानते रहे हैं। नर्मदा आंदोलन की नेत्री मेधा पाटकर भी सतही विरोधों से आगे नहीं बढ़ सकी हैं। जाहिर है कि संतुलन की राजनीति के चलते मध्यप्रदेश में बदलाव की बड़ी बयार अब तक जन्म नहीं ले सकी है।

    इस सबसे ऊपर वो राजनीतिक लाबी है जो देश के बड़े औद्योगिक घरानों के इशारों पर काम करती है। मध्यप्रदेश में रिलायंस ने अपना टेलीकाम नेटवर्क फैलाने का जो बड़ा अभियान चला रखा है उसे भाजपा और कांग्रेस दोनों के नेताओं का समर्थन प्राप्त है। यदि मध्यप्रदेश के राजनेता इन घरानों से पूरा शुल्क वसूली करना ठान लें तो उसके समेत अन्य टेलीकाम कंपनियों के बोरिया बिस्तर बंध जाएं। ये जानते बूझते सरकार चुप है और कंपनी के साथ साथ सत्ता पक्ष और विपक्ष के नेताओं को मनमानी की छूट दे रही है। इसी तरह बिजली कंपनियों, सड़क कंपनियों, पानी(सिंचाई और पेयजल योजनाओं) से जुड़ी कंपनियों के लिए भी मध्यप्रदेश स्वर्ग के समान राज्य बन चुका है। जनता के नाम कर्ज लेना और आधारभूत ढांचे के विकास के नाम पर बड़े बजट के कार्य कराने में मध्यप्रदेश का कोई सानी नहीं है। जो भी राजनेता इस यथा स्थिति को तोड़ने की कोशिश करता है उसके खिलाफ मीडिया के सहारे दुष्प्रचार अभियान छेड़ा जाता है और उसे धराशायी होने में देर नहीं लगती है।

    जाहिर है कि मध्यप्रदेश की भाजपा सरकार फिलहाल चुनौती विहीन नजर आ रही है। नगरीय निकायों के हालिया चुनावों ने भी इस अवधारणा को मजबूती दी है। इसके बावजूद अमित शाह की भाजपा को कई मूलभूत मुद्दों पर विचार करना जरूरी होगा। बर्मा के तेल भंडारों की ओर बढ़ते चीन की चुनौती और भारत की बेरोजगारी ने भाजपा सरकारों की मुसीबतें बढ़ाई हैं। इन सरकारों पर आर्थिक हितों के लिए जो दबाव डाले जा रहे हैं उसने उसके सुशासन के दावों को धूल धूसरित कर दिया है। मध्यप्रदेश में तो शिवराज सिंह चौहान की सरकार इस अराजकता को रोकने में बार बार असफल साबित हो रही है। सत्ता को निचोड़ने के उसके अभियानों से प्रेरित होकर माफिया ताकतें बार बार नियमों और कानूनों की धज्जियां उड़ाती रहती हैं। चाहे वो खदान माफिया हो या शराब माफिया, अनाज माफिया हो या तेल माफिया सभी संसाधनों का दोहन मनमर्जी से कर रहे हैं। इन हालात में नतीजे देने का लक्ष्य पाने में भाजपा सरकार की गति बहुत धीमी है।
    प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जिन लक्ष्यों का सुनहरा कल दिखाकर देश को आगे बढ़ाने का प्रयास कर रहे हैं उनकी पूर्ति में शिवराज सिंह चौहान सरकार कई बार ना नुकुर करती दिखाई पड़ जाती है। जाहिर है कि वो उन नीतियों के अनुकूल गति पकड़ने में पीछे छूट गई है। नौकरशाही की मनमानी और भाजपा के नेताओं की उथली समझ सभी इसके लिए जिम्मेदार हैं। भाजपा का संगठन इतना विशाल आकार ग्रहण कर चुका है कि उसे चुनाव जीतने में ज्यादा मेहनत नहीं करनी पड़ती है। लोकप्रियता के पांसे फेंकने में शिवराज सिंह सरकार को महारथ हासिल है लेकिन इक्कीसवीं सदी के भारत के निर्माण में ये फार्मूले किसी भी तरह सहयोगी साबित नहीं हो सकते हैं। भाजपा के सामने भविष्य में चुनाव जीतने की चुनौती तो है ही लेकिन उसे बदलाव लाने वाले प्रयास भी करना होंगे। उसके तेरह सालों के कार्यकाल के बाद जनता का धैर्य जवाब देने लगा है। इसलिए भाजपा को अब अपने प्रयास ठोस धरातल पर लाने के प्रयासों पर जोर देना होगा। अमित शाह यदि अपने मध्यप्रदेश दौरे के बाद पार्टी की नीति में ये कुछ मामूली फेरबदल कर सके तो उनका दौरा सार्थक कहा जा सकेगा।

  • जलने वाले भी देखें आसियान देशों की दोस्ती:अनुपम खेर

    जलने वाले भी देखें आसियान देशों की दोस्ती:अनुपम खेर

    भोपाल,14 अगस्त(पीआईसीएमपीडॉटकॉम)। फिल्म अभिनेता अनुपम खेर का कहना है कि आसियान संगठन से जुड़े देश भारत की परस्परोपग्रहो जीवानाम वाली संस्कृति की मिसाल हैं। इन देशों के बीच पिछले हजार सालों से सह अस्तित्व का भाव रहा है। ये सभी देश आपस में मिलजुलकर आगे बढ़ने का प्रयास करते हैं। इसके बावजूद कुछ देशों को भारत की प्रगति से ईर्ष्या होती है। वे आतंकवाद, युद्ध और दुष्प्रचार से अपना भी समय और संसाधन बर्बाद करते हैं और हमारी प्रगति की राह में भी रोड़े खड़े करते रहते हैं। इसके बावजूद भारत आगे बढ़ता रहेगा और अपने पड़ौसियों की प्रगति के लिए भी प्रयास करता रहेगा।

    राजधानी में छह दिनों तक चलने वाले आसियान देशों के सम्मेलन में शामिल प्रतिभागियों से प्रेरक संवाद करने पहुंचे फिल्म अभिनेता अनुपम खेर ने आज समाज, देश और दुनिया के सभी मुद्दों पर खुलकर बातचीत की। उन्होंने कहा कि विकासशील देशों के सामने अपने नागरिकों को अच्छी जिंदगी देने की चुनौतियां हैं। भारत लगातार इस लक्ष्य की ओर बढ़ रहा है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और उनकी सरकार शौचालय जैसी मूलभूत जरूरतों को पूरा करने से लेकर देश को मंगल ग्रह तक की ऊंचाईयों पर पहुंचाने का प्रयास कर रही है। हिंदुस्तान और पड़ौस के देशों को भी इस अभियान में शरीक होना चाहिए और इस बेहतरीन माहौल का लाभ उठाना चाहिए। चीन और पाकिस्तान के रवैये पर पूछे गए सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि इन देशों से जुड़ी विघटनकारी ताकतें भारत के खिलाफ दुष्प्रचार कर रहीं हैं। इन देशों के युवाओं को भी आसियान देशों के युवाओं की तरह करीब लाया जाए तो पड़ौसी मुल्कों के साझा प्रयास दुनिया को सफल बनाने में बड़ी भूमिका निभाएंगे।

    देश के लोगों को सत्तरवें स्वाधीनता दिवस की शुभकामनाएं देते हुए उन्होंने कहा कि ये देश मुझसे आठ साल बड़ा है। इसे मैं अपना बड़ा भाई, पिता, मां और बहन सभी मानता हूं। इस देश ने मुझ जैसे आम परिवार में जन्म लिए व्यक्ति के लिए भरपूर सम्मान दिया है और मैं इसके प्रति आजीवन कृतज्ञ रहूंगा। पूर्व राष्ट्रपति हामिद अंसारी के मुस्लिमों के बारे में दिए गए वक्तव्य के बारे में उन्होंने कहा कि इस देश में सभी जातियों के लोग बहुत प्रेम और सद्भाव से रहते हैं। इतने बड़े पद पर आसीन रहने वालों को हल्की टिप्पणियां नहीं करनी चाहिए। इससे देश के सद्भाव को ठेस पहुंचती है। देश को सभी जातियों के लोगों ने मिलजुलकर संवारा है और हमें इस देश के सभी नागरिकों पर गर्व है।

    उत्तरप्रदेश में मदरसों में स्वाधीनता दिवस पर आयोजित समारोहों की वीडियोग्राफी कराए जाने के फरमान पर उन्होंने कहा कि इस तरह का दबाव किसी पर नहीं है। यदि कोई झंडा नहीं फहराएगा तो क्या उसे दंडित नहीं किया जा सकता। उन्होंने कहा कि हमें स्वाधीनता की वर्षगांठ पर गर्व है और इसके बारे में सभी को अपने अपने तरीकों से अभिव्यक्ति करने की आजादी भी है। सबके प्रेम करने का ढंग अलग अलग होता है। ये नहीं कहा जा सकता कि अमुक व्यक्ति के प्रेम करने का ढंग सबसे अच्छा है या बुरा है। हम सभी देश से प्रेम करते हैं इसलिए स्वाधीनता दिवस भी हम उत्साह से मनाते हैं।

    कश्मीर में धारा 370 और अनुच्छेद 35 ए पर पूछे गए सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि कुछ चंद लोग ये तय नहीं कर सकते कि उन्हें कोई विशेष अधिकार मिलें। पूरे देश में धारा 370 हटाने पर सहमति है। कश्मीर से विस्थापित पंडितों को दुबारा वहां बसाने को लेकर भी लोग एकमत हैं। वक्त बदल गया है इसलिए संविधान की धारा 370 को हटा दिया जाना चाहिए। जिससे कश्मीर और देश के अन्य राज्यों के बीच बराबरी के संबंध बन सकेंगे।

    फिल्म सेंसर बोर्ड में लेखक प्रसून जोशी की नियुक्ति पर सवाल पूछे जाने पर उन्होंने कहा कि वे जाने माने लेखक हैं। वे विचारों के प्रवाह को और उनके महत्व को अच्छी तरह समझते हैं। फिल्म सेंसर बोर्ड में उनकी नियुक्ति निश्चित रूप से भारतीय फिल्मों को ज्यादा सफल बनाने में सहयोगी साबित होगी। निवृत्तमान फिल्म सेंसर बोर्ड के निदेशक पहलाज निहलानी के बारे में उन्होंने कहा कि उनका कार्यकाल समाप्त हो गया था। इसी तरह मैं भी कभी फिल्म सेंसर बोर्ड में रहा हूं ।

    टायलेट एक प्रेमकथा फिल्म के बारे में उन्होंने कहा कि इस फिल्म की कहानी बरसों से हमारे बीच थी। बालीवुड की प्रचलित कहानियों से हटकर कोई भी इस फिल्म को बनाने का जोखिम लेने तैयार नहीं था। इस फिल्म की कहानी जन जन से जुड़ी है और जनता इस फिल्म से अपना जुड़ाव महसूस करेगी। अक्षय कुमार और फिल्म के सभी बड़े बड़े कलाकारों ने पूरी तन्मयता से इस फिल्म का निर्माण किया है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने जिस तरह परंपराओं से हटकर पहली बार लाल किले से देश की शौचालय समस्या का उल्लेख किया था उसे पूरे देश ने गंभीरता से सुना। इसी तरह ये फिल्म भी देश से बेहतर संवाद का माध्यम बनेगी।

  • राष्ट्रवादी साज पर मेहबूबा का बेसुरा राग

    राष्ट्रवादी साज पर मेहबूबा का बेसुरा राग

    – भरतचन्द्र नायक
    क्षेत्रीय दल यदि आज की सियासत में अपनी प्रासंगिकता खो रहे है और उनकी क्षरित विश्वसनीयता से जनता में अलोकप्रियता के चरम पर पहुंच रहे है तो इसके लिए उनकी वैचारिक संकीर्णता और अवसरवादिता को ही खोट दिया जा सकता है। सीमावर्ती राज्य जम्मू कश्मीर में हुए विधानसभा चुनाव में जब किसी भी दल को बहुमत नहीं मिला भारतीय जनता पार्टी ने व्यापक राष्ट्रीय हित में तत्कालीन पीडीपी अध्यक्ष मुफ्ती मोहम्मद सईद से गठबंधन स्वीकार कर लिया। दो विपरीत ध्रुवों के मिलन पर सियासतदार हैरत में तो पड़ गए लेकिन उम्मीद थी कि मुफ्ती के नेतृत्व में पीडीपी संस्कारित होगी। पीडीपी के कार्यकर्ताओं पर लगाम भी कसी गयी लेकिन फिर भी उनकी अलगाववादियों से मोहब्बत तो जारी रही। अकस्मात मुफ्ती मोहम्मद सईद खुदा को प्यारे होने पर फिर भाजपा पीडीपी सरकार पर संकट आया लेकिन उनकी पुत्री मेहबूबा ने अपने वालिद की गद्दी संभाली और मुख्यमंत्री पद से गठबंधन की सियासत जारी रखी। भाजपा जैसे कट्टर राष्ट्रवादी दल का पीडीपी से साथ केर बेर का मिलन था लेकिन आजादी के बाद से ही जिस तरह सूबे में अलगाववाद को शेख अब्दुल्ला के समय से समय समय पर हवा दी गयी उस प्रभाव को डायलूट करने का प्रयास, जम्मू के साथ हो रहे पक्षपात को समाप्त करने, विस्थापित कश्मीरी पंडितों की पुनर्वास को ध्यान में रखकर भारतीय जनता पार्टी ने कड़वी दवा स्वीकार की। गंभीर मर्ज में अक्सर कड़वी दवा को सेवन करना कभी कभी अपरिहार्य हो जाता है। जम्मू कश्मीर में पाकिस्तान पोषित आतंकवाद का दौर जारी रहने पर भी जम्मू कश्मीर की मुख्यमंत्री मेहबूबा ने कई अवसरों पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की प्रशास्ति में कहा कि देश को नरेन्द्र मोदी का नेतृत्व दुर्लभ अवसर है और वे जम्मू कश्मीर समस्या का समाधान करने में कामयाब होंगे। इसी दरम्यान मोस्ट वांटेड आतंकवादी बुरहानवानी को मुठभेड़ में समाप्त कर सुरक्षा बलों ने कामयाबी हासिल की और पाकिस्तान की शह और हुर्रियत नेताओं के संरक्षण में बुरहानवानी का महिमा मंडन शुरू हो गया। सुरक्षा बलों को पत्थरबाजी का निशाना बनाना आरंभ हो गया। अलगाववाद की गूंज का नेशनल कांफ्रेस के नेता उमर अब्दुल्ला ने अलगाववादियों के सुर में सुर मिलाकर एक मुख्यमंत्री जैसे संवैधानिक पद की शपथ के बाद भी भारतीय अखण्डता को दरकिनार रखा और पाकिस्तान के सुर में सुर मिलाकर बेहयायी से वतन परस्ती को लज्जित कर दिया। दरअसल अब्दुल्ला परिवार की इससे बड़ी अहसान फरामोशी भी दूसरी नहीं हो सकती। फिर उमर अब्दुल्ला को दोष देना इसलिए फिजूल है क्योंकि उनके वालिद डाॅ. फारूख अब्दुल्ला तो पाकिस्तान की भाषा बोलने लगे। वे भूल गए कि उन्होंने केन्द्रीय मुख्यमंत्री के रूप में भी संविधान की शपथ ली है। इतने चुनावों में जम्मू कश्मीर की जनता संविधान को सर्वोच्च रखा है और जम्मू कश्मीर के अंतिम रूप से भारत में विलय को स्वीकार किया है लेकिन ताज्जुब की बात यह हुई कि अलगाव और आतंक में जूझ रहे भारत की बुद्धिजीवी जनता ने जब 370 के अनुच्छेद 35 ए की प्रासंगिकता पर सवाल उठाया तो मेहबूबा मुफ्ती ने भी वही राग अलापाते हुए कह दिया कि इस अनुच्छेद 35 ए को हटाने पर सूबे में तिरंगा झंडा साधने वाला नहीं मिलेगा। वे भूल गयी कि कभी शेख अब्दुल्ला ने इससे कम लेकिन मिलते जुलते अलफाज बोलने की खता की थी और उन्हें जेल की हवा खाना पडी थी। इसके पीछे का मनोविज्ञान समझना कठिन नहीं है। वास्तविकता यही है कि पीडीपी के कार्यकर्ता शुरू से ही अलगाववाद की रस्मों में रचे पचे थे। मुफ्ती मोहम्मद सईद की जानते थे लेकिन वे उन्हें सुधरने का मौका देते थे और उनकी गुस्ताखी गंवारा करते थे। आज उन्हीं कार्यकर्ताओं को राष्ट्रवाद से जुडा आदर्श बेमानी है क्योंकि वे इसे वोटों की दृष्टि से पीडीपी के हित में घातक मानते है। उनके रिश्ते पहले भी अलगाववादियों के साथ थे और आज भी उन्हें अलगाववादियों के विरूद्ध की जा रही केन्द्र सरकार की कार्यवाही रास नहीं आ रही है। उनका न तो राष्ट्रवाद से कोई प्रेम है और न गठबंधन में साथ भाजपा के प्रति मोहब्बत का रिश्ता है। अलबत्ता उन्होंने मुफ्ती मोहम्मद सईद भी जीते जी साथ दिया और खुली बगावत नहीं की लेकिन अब उनका हौसला बढा है। इसी का नतीजा है कि मुख्यमंत्री मेहबूबा के सुर बदल गए और उन्हें अलगाववादियों के समर्थन की चिंता सताने लगी।

    राजनैतिक अवसरवादिता इसी को कहते है कि जिसका सबूत पीडीपी और उसकी नेत्री मेहबूबा ने दे दिया है। अब उन्हें भरोसा हो गया है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जम्मू कश्मीर में यथास्थितिवाद ज्यादा दिन बर्दाश्त नहीं करेंगे। यदि राष्ट्रवाद के ज्वार ने जोर पकड़ा तो पीडीपी का वोट बैंक तहस नहस हो जायेगा। वे भूलती है कि देश में आतंकवाद का विस्मिल्ला पहली बार उनकी बहन के अपहरण के रूप में मुफ्ती परिवार ने ही भुगता है, लेकिन कुर्सी की बलिहारी समय बदला और मुफ्ती परिवार की बेटी मेहबूबा के तेवर और तासीर बदल गयी।
    राजनैतिक विश्लेषकों का मानना है कि नरेन्द्र मोदी सरकार ने सूबों के साथ इंसाफी दिखाते हुए उम्मीद जतायी है कि विकास के लिए मिलने वाली सहायता राशि विकास में लगे। इस प्रयास का असर यह हुआ कि सरकार और बिचैलियों के गठजोड़ पर आंच आयी है। केन्द्र की पूर्ववर्ती सरकारे जम्मू कश्मीर की सल्तनत की मंुह मांगी मुराद पूरी करती रही है और कभी हिसाब किताब नहीं पूछा गया। नतीजा सूबे में जनता की बदहाली, बिचैलियों ने विदेशों में जागीरे खड़ी कर ली। लोकधन बर्बादी पर मोदी सरकार की कड़ाई जम्मू कश्मीर के राजनैतिक दलों और सियासतदारों पर भारी पडी है। अलगावादी नेताओं को जिस तरह सीधे सीधे पाक परस्त साबित किया गया और उनकी अवाम के शोषण की कहानियां बाहर आयी है जम्मू कश्मीर की सियासत में भूकंप के झटके आ रहे है। अलगाववादियों की दुकाने उठना और विकास के धन की जांच पड़ताल सूबे की सियासत को ऐसा दंश है कि वे सहन नहीं कर पा रहे है। जिस पर नरेन्द्र मोदी को अवाम की बधाई मिलना थी उसको सियासतदार उल्टा प्रचारित कर अलगाववाद को हवा पानी परोस रहे है। हाल के दिनों में वित्तीय प्रबंधन की लगाम कसी जाने पर सियासी ठेकेदारों और नेताओं पर अचूकवार होने से तिलमिला गए है। उन्हें अपनी गांठ खाली होने की फिक्र है। मुल्क, सूबे की खुशहाली की नहीं।
    नरेन्द्र मोदी को भारत और पाकिस्तान के बीच दोस्ताना ताल्लुक बढ़ने की कितनी अभिलाषा है इसका संकेत इसी बात से मिलता है कि प्रधानमंत्री मोदी विदेशी दौरा के अंतिम पड़ाव में पाकिस्तान पहुंचे और नवाज शरीफ के मेहमान बने। उनकी माताजी को साड़ी भेंट दी और पाकिस्तान को मोहब्बत का पैगाम दिया। लेकिन पाकिस्तान ने रोग नेशन का सबूत दिया। बातचीत के चलते सीमा का उल्लंघन भी किया और आतंकवाद को विदेश नीति बनाकर सारी दुनिया में जग हंसाई करायी। ऐसे में मोदी ने स्पष्ट कहा कि आतंकवाद और दोस्ती, भारत को दहशत का दंश और सियासी चर्चा साथ साथ नहीं चल सकती है लेकिन उमर अब्दुल्ला और मेहबूबा मुफ्ती को चिंता राष्ट्र की नहीं चंद वोटों और कुसी की है। ये अलगावाद परस्ती दिखाकर राष्ट्रीय सुरक्षा में छेदकर रहे है और जो बात पाकिस्तान कहने का साहस नहीं कर सकता उसके स्वर भी निकाल रहे है। मोदी का यह स्टेंड एक दम सही है। द्विपक्षीय मामले में न तो कोई बिचैलिया होगा और न तीसरा पक्ष होगा। आतंकवाद को समाप्त करने के लिए पहली बार एनडीए सरकार ने सुरक्षा बलों को छूट दी। अलगाववादियों को मिलने वाली सहायता के स्त्रोत बंद कर दिए है। यह एक सुनामी है जिससे विदेशी धन पर गुलछर्रे उड़ाने वाले बिचैलिया और राजनेता अचेत होकर प्रलाप कर रहे है। गिलानी परिवार पर कसी गयी मुस्कें बहुतों को नागवार गुजरी है। इसके बाद मेहबूबा मुफ्ती ने जिस तरह अपने डूबते सियासी जहाज के भविष्य से आहत होकर टिप्पणी की है उससे केन्द्र सरकार को भी समझ लेनी चाहिए कि मेहबूबा मुफ्ती और उनके साथ गठबंधन का भविष्य का द्वार बंद हो चुका है। पीडीपी की डगर कठिन है। मोदी का बहुआयामी अजेंडा स्थाई समाधान सिद्ध होगा।

    – भरतचन्द्र नायक
    एलआईजी ए 58, ई 6 अरेरा कालोनी, भोपाल

  • आजादी की कहानियों में आसरा तलाशती कांग्रेस

    आजादी की कहानियों में आसरा तलाशती कांग्रेस

    सल्तनत चली गई है लेकिन लोग अभी भी खुद को सुल्तान समझ रहे हैं। यह कहकर जयराम रमेश ने आज की कांग्रेस को नसीहत देने की कोशिश की है। गुजरात में अहमद पटेल का राज्यसभा चुनाव में जीत जाने पर जश्न मना रहे कांग्रेसी ये सोचने तैयार नहीं हैं कि उनकी नाव में छेद हो चुका है। इस जीत को भाजपा अध्यक्ष अमित शाह की असफलता बता रहे समाचार माध्यम भी घटना का केवल एक पक्ष देख रहे हैं। जो मारे सो मीर के सोच में ढले चैनलों के सूत्रधार कांग्रेस की आतिशबाजी की चमक में अहमद पटेल के दरकते किले की झिरी नहीं देख पा रहे हैं। कांग्रेस के पास अपने 57 विधायक थे। एक राकांपा, एक जदयू और निर्दलीय समर्थन के साथ उसके पास 61 मतों का समर्थन था। इसके बावजूद पटेल को मात्र 44 वोट मिले। लगभग डेढ़ मतों से उनकी नाक बची। अहमद पटेल ने जब नामांकन भरा तो छह विधायकों ने इस्तीफा दे दिया था। गुजरात में कांग्रेस 33 सालों से सत्ता से बाहर है। अंतिम बार 1985 में उसकी सरकार बनी थी। इस बार अहमद पटेल की मनमानी के चलते ही गुजरात के दिग्गज नेता शंकर सिंह वाघेला ने पार्टी छोड़कर तटस्थ रुख अपना लिया था। जाहिर है कि पटेल ने सीट जरूर बचा ली है पर उनकी कुर्सी के पाए दरक गए हैं। इसलिए ये नहीं कहा जा सकता कि अमित शाह के प्रयास निष्फल हो गए हैं।गुजरात के मुख्यमंत्री विजय रूपाणी ने तो कहा भी है कि कांग्रेस भले ही जीत गई हो पर उसकी जीत नमक की तरह खारी है।अमित शाह को फर्जी मुठभेड़ कांड में फंसाने का षड़यंत्र अहमद पटेल का ही था जाहिर है कि इस चुनाव ने उनकी सत्ता की चूलें हिला दी हैं।इससे अहमद पटेल का काले धन का साम्राज्य धराशायी होने की भी शुरुआत हो गई है। इस चुनाव को भी भाजपा सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने जा रही है। कांग्रेस के नेतागण आज भी हिंदुस्तान के बादशाह की तरह बर्ताव कर रहे हैं। वे भ्रष्टाचार और परिवारवाद के दागों से मुक्त होने का जतन नहीं कर रहे हैं। कांग्रेस के धर्मनिरपेक्षता और सामाजिक न्याय के फार्मूले आऊटडेटेड साबित हो चुके हैं। डॉ.मनमोहन सिंह के उदारीकरण लागू करने के पूंजीवादी सिद्धांत ने पार्टी के पुराने ढांचे को धराशायी कर दिया है। यही वजह है कि उसके नेतागण अपने अतीत को मुकुट बनाकर जीत का ख्वाब देखने लगे हैं।

    मध्यप्रदेश में नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह ये हिसाब बताने तैयार नहीं कि उन्होंने भाजपा की सरकार को किस तरह कहां कहां घेरा और क्या सफलता पाई। इसकी तुलना में वे आजादी के संग्राम की शान बघार रहे हैं।कांग्रेस के नेतागण बार बार कहते नहीं अघाते कि उनकी पार्टी और महात्मा गांधी ने आजादी दिलाई है। जबकि हकीकत ये है कि द्वितीय विश्व युद्ध के बाद उपनिवेश वादी व्यवस्था भंग होनी शुरु हो चुकी थी,और आर्थिक साम्राज्यवाद का दौर शुरू हो गया था। इसी हवा में भारत के साथ म्यांमार को भी आजादी मिली। जबकि चीन तो दो साल बाद पीपुल्स रिपब्लिक आफ चाईना बना। लेकिन आज भारत की अर्थव्यवस्था दो ट्रिलियन डालर की है और चीन की नौ ट्रिलियन डालर की । चीन ने 1981 से 2013 के बीच 63 करोड़ लोगों को गरीबी से बाहर निकाल लिया था। जबकि भारत में आज भी जन विद्रोह रोकने के लिए सब्सिडी आधारित हितग्राही मूलक योजनाएं चल रहीं हैं। जो कांग्रेसी बार बार अहसान जताते फिरते हैं कि आजादी के वक्त सुई भी देश में नहीं बनती थी उन्हें गौर करना चाहिए कि राजीव गांधी के तकनीक आयात करने के फैसले ने देश को कर्ज के दलदल में धकेल दिया । तकनीक खरीदने की होड़ ने देश की आत्मनिर्भरता की प्रक्रिया को लकवाग्रस्त बना दिया।

    कांग्रेसी नीतियों के पाप की गठरी चीन से तुलना करते वक्त एक झटके में खुल जाती है। चीन के यीवु शहर में उत्पादन की ढेरों इकाईयां लगाईं गईं हैं। यीवु शहर की इन इकाईयों में 2013 तक तीन लाख साठ हजार भारतीय व्यवसायियों ने अपना पूंजी निवेश किया और वहां माल बनाकर भारत भिजवाया। मोदी सरकार तो इसके बाद 26 मई 2014 को सत्ता में आई।इसके बावजूद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के मेक इन इंडिया नारे ने इन उद्योगपतियों की नींद उड़ा दी है। यही वजह है कि चीन का मीडिया डोकलाम के बहाने नरेन्द्र मोदी पर निशाना साध रहा है। आज यीवु दुनिया का सबसे बड़ा थोक बाजार है। यहां करीब आठ लाख दूकानें हैं। चीनी कोई भी सौदा नहीं छोड़ते। वे सस्ता भी माल बनाते हैं और मंहगा भी। चीन ने पहले माल बनाया फिर उसकी मार्केटिंग की भी व्यवस्था की। आज वहां इंपोर्टरों और फैक्टरी मालिकों को खरीदार ढूंढने का काम बहुत सरल है। चीन ने जो स्पेशल इकानामिक जोन बनाए वे उसके विकास में मील का पत्थर बन गए। विकास के प्रस्ताव न तो भारत की संसद की तरह अटके न ही भूमि अधिग्रहण की समस्या आड़े आई। वहां उजाड़े गए लोगों के पुनर्वास की भी चिंता नहीं की जाती है। विकास की राह में विरोध और बहस की कोई गुंजाईश नहीं है। आर्थिक निवेश को विचारधारा और राजनीति के चश्मे से नहीं देखा जाता है। चीन ने अपने सबसे बड़े बांध का निर्माण मात्र अठारह साल में पूरा कर लिया और उससे बिजली भी बनाने लगा। जबकि भारत में नर्मदा बांध परियोजना 27 साल बाद पूरी हुई पर अभी तक उसे पुनर्वास के नाम पर अड़ंगों का सामना करना पड़ रहा है। जो लागत बढ़ी और घाटा सहना पड़ा उसका तो कोई हिसाब ही नहीं।

    चीन के विकास में महिलाओं की भागीदारी 75 फीसदी है जबकि भारत में केवल 34 फीसदी महिलाओं को हम काम दे पाए हैं। पुरुष युवाओं की बेरोजगारी ही हमारे लिए बड़ा सिरदर्द बनी हुई है। ये सब कांग्रेस की नीतियों की असफलता की कहानियां कहते हैं। मोदी सरकार के पहले तक भाजपा की सरकारें भी कांग्रेस की इन्हीं नीतियों की पिछलग्गू बनी रहीं हैं। मध्यप्रदेश की कांग्रेस यहां की भाजपा को इसलिए कोस रही है कि उसने 9 अगस्त को आयोजित ….. युवा संवाद… कार्यक्रम के पोस्टरों में भारत छोड़ो का नारा देने वाले महात्मा गांधी की तस्वीर नहीं छपवाई। जबकि ये आयोजन मध्यप्रदेश सरकार का था भारतीय जनता पार्टी का नहीं। ये बात सही है कि जब द्वितीय विश्व युद्ध के बाद इंग्लैंड भारत से अपने हाथ खींच रहा था तब उसने अपने मन माफिक सहयोगियों को कांग्रेस में तलाशा था। कांग्रेस के नेताओं की दरियादिली की वजह से ही अंग्रेजों ने यहां के कमाऊ उद्योगों में निवेश किया और आज तक बहुराष्ट्रीय कंपनियों की आड़ में यहां से दौलत उलीच रहे हैं।

    राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ तो आजादी के समय शैशव अवस्था में था और देश के लोगों के बीच अपना जनाधार तलाश रहा था। कांग्रेस की मौकापरस्त राजनीति के जूझते हुए आरएसएस के समर्थन वाली भाजपा को लगभग सत्तर साल लग गए और आज भी वह कांग्रेस के नेताओं की ओर से लगाए जाने वाले लांछनों का सामना कर रही है।ये बात सही है कि भाजपा के भीतर एक बड़ा धड़ा कांग्रेस परस्त नीतियों की पूंछ पकड़कर चल रहा है।इसके बावजूद देश के स्तर पर भाजपा ने राजनीतिक दिशा बदलने में बड़ी भूमिका निभाई है और संतोष की बात ये है कि देश का युवा उसके साथ खड़ा है। कांग्रेस के नेता यदि वर्तमान में जीने के बजाए यूं ही अतीत को टटोलते रहेंगे तो जाहिर है वे अपनी पार्टी को अजायबघर ले जाएंगे। इन हालात में भाजपा विकास की नई दिशा का कितना लक्ष्य पा सकेगी कहा नहीं जा सकता।

  • जेबी लोकतंत्र की विरासत अब धराशायी

    जेबी लोकतंत्र की विरासत अब धराशायी


    - भरतचन्द्र नायक
    भारतीय लोकतंत्र की महिमा निराली है। यहां दशकों तक एक राजनैतिक दल ने आजादी के जंग में कामयाबी का श्रेय भी लूटा और राजनैतिक एकाधिकार भी जमाया। तब निर्वाचित सरकारे लोकतंत्र के नाम पर भंग भी की जाती रही और समय आने पर आया राम गया राम का खेल भी गुजरात और हरियाणा में खेलते हुए राजनैतिक कुशलता का ढोल भी पीटा गया। दिवंगत नेता भजनलाल का उल्लेख खूब हुआ और एक शब्दावली भी गढ़ी गयी लेकिन बलिहारी देश के मतदाताओं की जिन्होंने मुफलिस और मजलूम माने जाने पर भी करिश्मा कर दिखाया। उक्त पार्टी के एकाधिकार का दंभ खंडित किया। विकल्प भी पैदा किया। लोकशाही का मर्म सिखाते हुए फकीरों को बादशाह का रूतबा बख्श दिया। अब वही एकाधिकार वाले बादशाह तोहमत लगा रहे कि उनकी विरासत छीन कर बेइन्साफी की गयी है। जिस निजाम पर पक्षधरता का इल्जाम चस्पा होता रहा। वे ही अब चीख रहे है। उनका आरोप है कि लोकतंत्र को सरेआम लूटा जा रहा है।

    चारों तरफ नरेन्द्र मोदी और अमित शाह की जुगलबंदी के चर्चे है। राज्यसभा के चुनाव की सरगर्मी जारी है। उसके 6 माह बाद गुजरात के चुनाव है। इसी दरम्यान बिहार में जनता दल यू के राष्ट्रीय अध्यक्ष नीतिश कुमार ने महागठबंधन से दूरी बनाकर एनडीए का साथ पकड़ लिया। चारों तरफ कोहराम मचा। राहुल गांधी ने इसे महागठबंधन के साथ विश्वासघात बताया वहीं लालूप्रसाद यादव ने कहा कि यह जनता दल यू और कांग्रेस को मिले जनादेश का अपमान है। उपरी तौर पर उनकी आपत्ति सही भी लगती है, लेकिन नीतिश कुमार समर्थकों का यह कहना कि जनादेश जरूर जनता दल यू और कांग्रेस को ही मिला था और इस पर कायम रहना नैतिक जिम्मेदारी बनती थी लेकिन जनादेश के साथ बिहार के अवाम में यह भावना भी थी कि नीतिश कुमार की सरकार साफ सुथरा प्रशासन देगी और उनकी गठबंधन सरकार भ्रष्टाचार के प्रति जीरो टाॅलरेंस की प्रतिबद्धता पर खरी उतरेगी। लिहाजा जब नीतिश बाबू ने देखा कि न तो लालू परिवार भ्रष्टाचार का स्पष्टीकरण देना चाहता है और न भ्रष्टाचार पर प्रायश्चित करने का साहस दिखा रहा है तो वे भ्रष्टचारी शासन को ढोते रहकर कलंक के भागी क्यों बनतें लेकिन लालू प्रसाद यादव ने सत्ता पलट बर्दाश्त करने के बजाए नीतिश कुमार के खिलाफ अभिलेखागार से एक आरोप भी खोद निकाला और लेकर घूमते फिर रहे है।

    बात यही समाप्त नहीं होती बौखलाहट में नित नए आरोप लगाकर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह को घेरने की जुर्रत की जा रही है लेकिन राहुल बाबा और गुलाम नवी आजाद इस बात को गंवारा करने को तैयार नही है कि यदि राज्यसभा चुनाव की बेला में विधायक पाला बदल रहे है तो पूरी सरकार के दल बदल करने का शिल्प तो कांग्रेस की ही देन है जिसने आया राम गया राम को शह देकर सरकारे पलटी और एकाधिकार को मजबूत किया। फिर आमजन चुनाव की आहट में विधायक आ जा रहे है तो स्यापा की क्या बात है। विधायकों के इस्तीफा देकर दूसरे दल में शामिल होने के पीछे पार्षदों द्वारा अपनी विफलता, संगठन की अप्रासंगिकता पर ध्यान नहीं दिया जा रहा है। मां बेटा की पार्टी ने तो राज्यों के संगठन पर गौर करना छोड़ दिया। वरिष्ठ नेता बेकद्री से संगठन से विरक्त हो गए। जो डूबते जहाज से निकलकर राजनैतिक वैतरणी पार करना चाहते है वे ठौर देख रहे है। इसमें प्रधानमंत्री को लपेटना अमित शाह को घसीटने के बजाए कांग्रेस का श्रेष्ठ वर्ग आत्म परीक्षण करने का साहस क्यों नहीं दिखाता। चूक सरासर कांग्रेस की है जो प्रांतीय संगठनों को कबीलाई जंग में जाता देखकर भी तटस्थ दर्शक बनकर रह गया है। इसी तरह उत्तर प्रदेश में यदि राजनैतिक दलों से पलायन हो रहा है तो दलीय विफलता के अलावा क्या कहा जा सकता है, लेकिन मजे की बात है कि किं कत्र्तव्यं विमूढ़ समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव इस पलायन को भाजपा का राजनैतिक भ्रष्टाचार और बहुजन समाज पार्टी की प्रमुख वहन मायावती इसे सत्ता की भूख बताकर हकीकत से मुंह मोड़ रही है।

    आज हकीकत को अवसरवादिता के पैमाने पर देखना राजनैतिक दलों की फितरत बन गयी है। यदि ऐसा न होता तो कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी पं. बंगाल में हो रही जातीय हिंसा और केरल की वामपंथी सरकार की शह पर राष्ट्रवादी कार्यकर्ताओं के कत्ल के मामलों पर गौर करते और निंदा करते लेकिन उनका नजरिया वास्तविकता से भिन्न है और वे मोदी सरकार पर असहिष्णुता का इल्जाम लगा रहे है। आखिर वे जनता की आंखों में धूल झौंककर दलीय समर्थन खोने पर क्यों आमादा बने हुए है। ऐसे में एक विद्वान का यह कथन मौंजू है कि कल्पना शक्ति नाॅलेज से अधिक महत्वपूर्ण है, क्योंकि नालेज की तो सीमा होती है लेकिन कल्पना असीम है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष इसके धनी है और राजनीति की घिसी पिटी फितरते छोड़कर कल्पनाशीलता से जनता का मन मोह रहे है। कल्पना में विश्व समाया हुआ है। इसी के बल पर नरेन्द्र मोदी ने हताश मुल्क में सकारात्मक पर्यावरण रचा, उसे अमली जामा पहनाने का प्रयास किया। जनता का भरोसा जीता और भगवा परचम लहराया है। विपक्ष अरण्यरोदन करता फिर रहा है।

    इस परिप्रेक्ष्य में जनता दल यू के पूर्व अध्यक्ष और वरिष्ठ नेता शरद यादव भी नीतिश कुमार से अप्रसन्न चल रहे है। वास्तव में उनकी नाराजगी के चर्चा उनकी प्रासंगिकता को नया रूप देने में सहायक हो सकती है और पुनर्वास का सिलसिला आगे बढ़ सकता है। राजनीति में तनिक भी रूचि लेने वालें इस बात पर अकस्मात दांतों तले अंगुली तो दबा लेते है कि एक जहाज का पंछी असुरक्षा के कारण दूसरे जहाज पर जा रहा है इसमें कोई अनुचित अवैध गोरखधंधा हो सकता है लेकिन जब वह याद करता है कि यह गोरखधंधा न तो नया और न इसकी अवैधता से आज विपक्ष अछूता है। उन्होंने सत्ता में रहकर कभी गौर नहीं किया है। अलबत्ता पूरी सरकार के पाला बदल लेने पर अपनी पीठ थपथपायी है। घोड़ा की मंडी का रिवाज तो उन्होंने ही आरंभ किया जो आज इस पर टीका टिप्पणी करते हुए यथार्थ से मुंह चुरा रहे है।

    जिस तरह से उत्तर प्रदेश में विधान परिषद के सदस्यों ने पलायन किया और गुजरात में विधायकों ने कांग्रेस से किनारा किया है उससे अगस्त में होने जा रहे राज्यसभा के चुनाव के परिणाम अप्रत्याशित हो सकते है और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता अहमद पटेल की राज्यसभा पहंुचने का रास्ता कंटकाकीर्ण बन सकता है। जहां तक राज्यसभा में एनडीए के वर्चस्व बढ़ने का सवाल है उसे 123 सदस्यों की गिनती पूरी करना है जिसके समीप पहंुचकर उसने अल्पमत की लक्ष्मण रेखा को पार करने का कौशल दिखा दिया है। बुजुर्गो का कहना है कि संकट अकेला नहीं आता उसके साथ कई परेशानियां भी आती है। कमोवेश यही हालात देश में सबसे बड़े राजनैतिक दल कांग्रेस और उन क्षेत्रीय दलों की है जो वंश परंपरा और अपनी पारिवारिक विरासत के मत से नहीं उबर पाए है। इसमें कोई शक नहीं कि गुजरात जहां विधानसभा चुनाव सन्निकट है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह का गृह प्रदेश है, इसलिए गुजरात के चुनाव उनकी प्रतिष्ठा से जुड़े है। कांग्रेस में कद्दावर नेता रहे और वरिष्ठता का दर्जा हासिल करने वाले शंकर सिंह वाघेला का कांग्रेस से इस्तीफा और प्रदेश कांग्रेस संगठन में बिखराव कांग्रेस की विफलता है वही भाजपा के लिए वरदान साबित भी है। हर विफलता के पीछे सबब खोजना जरूरी समझा जाता है लेकिन सियासी दलों को यह मंजूर नहीं कि साहसपूर्वक कहे कि जनता ने उन्हें ठुकरा दिया। इसलिए वह ठीकरा तो फोड़ता है और जनता क्षणिक भ्रमित हो जाती है।

  • चीन से विवाद में कांग्रेसी दलालों की भूमिका

    चीन से विवाद में कांग्रेसी दलालों की भूमिका

    डोकलाम विवाद: भारत ने नहीं हटाई सेना तो दो हफ्तों में हमला कर सकता है चीन- ग्लोबल टाइम्स

    नईदिल्ली। चीनी मीडिया लगातार भारत और खासतौर पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को निशाना करके हमले की चेतावनी दे रहा है। चीनी अखबार ग्लोबल टाइम्स ने चीनी सैन्य विशेषज्ञों के हवाले से लिखा है कि अगर नरेन्द्र मोदी सरकार का इस मुद्दे पर अड़ियल रवैया कायम रहता है तो जंग होना तय है। चीन के सैन्य विशेषज्ञों के मुताबिक चीन की पीपुल्स लिब्रेशन आर्मी दो हफ्तों के अंदर डोकलाम में भारतीय सेना पर सीमित कार्रवाई कर सकती है।

    शंघाई एकेडमी ऑफ सोशल साइसेंज के इंस्टीट्यूट ऑफ इंटरनेशनल रिलेशंस में रिसर्च फेल हु ज़ियोंग ने कहा, ‘पिछले दो दिनों में चीन की ओर से की गई टिप्पणियां दिखाती हैं कि चीन भारतीय सेना को विवादित क्षेत्र में लंबे समय तक बर्दाश्त नहीं करेगा।’ ग्लोबल टाइम्स ने हु जियोंग के हवाले से लिखा है कि चीन की सैन्य कार्रवाई का मकसद डोकलाम में मौजूद भारतीय सैनिकों को कैद करना या फिर उन्हें पीछे धकेलना शामिल होगा, साथ ही चीन का विदेश मंत्रालय ऐसी किसी भी कार्रवाई से पहले भारत के विदेश मंत्रालय को अपने फैसले की सूचना देगा।’

    चीन के विदेश मंत्रालय, रक्षा मंत्रालय, भारत में चीन के दूतावास और पीपुल्स डेली की ओर से भारत को धमकी दी जा चुकी है कि भारत डोकलाम से अपनी सेना हटाए। बता दें कि डोकलाम में पिछले दो महीनों से भारत चीन की सेना आमने-सामने है। चीन के सरकारी टीवी ने शुक्रवार को बताया कि चीन की सेना ने तिब्बत मिलिट्री क्षेत्र में युद्धाभ्यास किया है, ये युद्धाभ्यास सुबह 4 से शुरू हुआ था और इसमें दुश्मन के ठिकानों पर कब्जे का अभ्यास किया गया था।

    शंघाई इंस्टीट्यूट फॉर इंटरनेशनल स्टडीज में सेन्टर फॉर एशिया-पैसिफिक स्टडीज के निदेशक जाओ गेनचेंग ने ग्लोबल टाइम्स को बताया कि चीनी सेना का ये अभ्यास दिखाता है कि डोकलाम में चीन सैन्य संसाधनों का इस्तेमाल कर सकता है और ऐसा करने की संभावनाएं बढ़ती जा रही है क्योंकि भारत कह कुछ रहा है और कर कुछ रहा है। विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने गुरुवार को संसद में बयान दिया था कि युद्ध से समस्या का समाधान नहीं हो सकता है इसके लिए बात चीत और बौद्धिक विमर्श की जरूरत है। हालांकि सुषमा स्वराज ने ये भी कहा था कि भारत की सेना किसी भी स्थिति का सामना करने को तैयार है।

    डोकलाम में सड़क बना रहे चीनी अमले को रोकने के लिए जबसे भारत की सेना ने हस्तक्षेप किया है तभी से ये विवाद गरमाया है। भारत में अपना कारोबार लगातार बढ़ाने के लिए चीन ने इन सड़कों का विस्तार किया है। सामरिक महत्व से भी चीन लगातार भारत को घेरने में लगा हुआ है। पड़ौसी मुल्कों से लगातार संबंध बिगाड़ने वाली कांग्रेस पार्टी के नेता राहुल गांधी ने इस बीच चीनी दूतावास जाकर वहां के राजनयिकों से मुलाकात की थी। इस गोपनीय मुलाकात की जानकारी लीक हो गई और सत्तारूढ़ भाजपा के नेताओं ने राहुल गांधी के इस तरह गुपचुप मिलने पर सवाल उठाए थे। तभी से ये सवाल लगातार उठाए जा रहे हैं कि मौजूदा तनाव के पीछे कहीं कांग्रेस के रणनीतिकारों की तो भूमिका नहीं है। जनता की चुनी हुई सरकार के सामने लगातार लाचार नजर आती कांग्रेस जिस तरह देश के साथ षड़यंत्र करती रही है उसे देखकर तो शंकाएं उठना लाजिमी हैं। भारत सरकार को कांग्रेस से जुड़े दलालों और तस्करों की भूमिका की छानबीन भी करनी चाहिए जिससे इस विवाद का समाधान हो सके। (एजेंसियां)

  • लोअर क्लास की चोटी

    लोअर क्लास की चोटी

    रजनीश जैन

    चोटी कटवा घूम रहा है। स्त्रियों से उनकी अमूल्य निधि छीनने। लटें, गेसू, ज़ुल्फें, केश, घटाऐं ही तो हैं जो पुरुषों की कल्पना में असल स्त्रीधन है।…इसीलिए इसे केशराशि भी कहा गया। यही एक ऐसी राशि है जो सरकार के सारे प्रतिबंधात्मक कदमों के बाद बढ़ने से नहीं रुकती। विभिन्न वित्तवर्गों की स्त्रियों के पास केशराशि अलग अलग मात्रा में मौजूद होती है। ऐसी इकलौती राशि भी है जो विलोम प्रकृति रखती है। जो स्त्री जितनी विपन्न होगी उसके पास केशराशि की अधिक मात्रा होगी।स्त्री के अमीर होते जाने का एक संकेत यह भी है कि उनकी केशराशि उसी तदात्म्य में सीमित होती जाती है। अमीरी में केशराशि को छोटा किंतु सुघढ़ बगीचे की तरहा कृत्रिम विन्यास दिये जाने के प्रयास होते हैं।
    गरीब स्त्रियों के पास प्रचुर मात्रा में केशराशि होती है लेकिन गाजरघास की तरह अस्त व्यस्त और बेतरतीब। ‘बिनु पानी साबुन बिना’ सुभाव तो निर्मल हो सकता है। लेकिन जल और साबुन के अभाव में निम्न मध्यमवर्गीय केशराशियों में इससे एक जैवविविधता से भरा वनप्रदेश निर्मित होता है। बिल्कुल सतपुड़ा के घने जंगलों की तरहा। ‘घुस सको तो घुसो इनमें, धँस सको तो धँसो इनमें,घुस न पाती हवा जिनमें…ऊंघते अनमने जंगल’। इस वन में कंघी कभी घुसाई या धँसाई नहीं जाती।उपलब्धता के आधार पर तेल की तहें चढ़ाई जाती हैं। इतना तगड़ा बंदोबस्त होता है कि बारिश का पानी भी तहों को न भेद पाये।
    इस वनीकृत केशराशि में विचरण करने वाला प्रमुख प्राणी जूँ नामक कीट होता है जो अपनी असीमित प्रजनन क्षमता से इन वनों को व्यापक रूप से खसखस के दानों सदृश्य अपनी भावी संततियों की असंख्य मात्रा से आच्छादित कर देता है। इस प्राणी की एक मात्र प्राकृतिक शत्रु वनप्रांत की स्वामिनी की माता, भगिनी, सखी , पुत्रियां ही होती हैं जो एक दूसरे के वनों में अपने तीक्ष्ण नखों से इन प्राणियों का शिकार करने एक के पीछे एक बैठ जाती हैं। शिकार की खोज में कटार जैसी निगाहें और पैनी होकर अभियान चलाती हैं। सूक्ष्म पगडंडियों की अभ्यस्त होते ही जूँ मिलने लगते हैं जिन्हें एहतियात से खींच कर पहले हथेली पर रखकर साईज इत्यादि का मुआयना किया जाता है। फिर दोनों अंगूठों के मध्य दबाकर ‘पिट्ट’ की ध्वनि का श्रवण किया जाता है। स्त्रीस्वभाव में हिंसात्मक तत्व का सर्वोत्तम दर्शन ‘जूँ आखेट’ में ही होते हैं। इस पर शोध होना आवश्यक है कि नाखूनों के बीच दबाकर जूँ को पिचलते वक्त उनके दिमाग में किसका प्रतिबिंब होता है। पति , समाज , व्यवस्था या अपने सपनों में से किसकी हत्या इतनी निर्दयता से कर रही होती हैं वे उस वक्त! जूँ को प्राणदंड देने की इस सुखद और अनंत संतुष्टि देने वाली इस प्रकिया में इतना आनंद होता है कि इसे बहुधा घंटों तक तल्लीनता से किया जाता है। इस प्रक्रिया को यदि पड़ोसिनों की निंदाचर्चा के साथ संपन्न किया जाये तो समय का भान नहीं होता। आईंस्टीन का सापेक्षता के सिद्धांत के आदर्श उदाहरण की तरह। …हालांकि जूँ के निरंतर शिकार की इस परंपरा का सबसे नायाब पहलू यह है कि प्रतिदिन शिकार किए जाने पर भी जूँ की तादाद कभी घटती नहीं और आनंदप्राप्ति का स्रोत शाश्वत अजस्र बना रहता है।
    यह पूरा शिरोधार्य पारिस्थितिकी तंत्र हरेक वन की तरह ही अर्से में इकट्ठा हो गयी अवशिष्ट सामग्री के सड़ने से दुर्गंध युक्त भी हो जाता है लेकिन केशरमणी इस दुर्गंध की इतनी अभ्यस्त होती है कि उसे यह सुगंध ही प्रतीत होती है। कभी कोई प्रेमातुर केशराशि की तैलीय चमक के आकर्षण में निकट आकर गेसुओं की खुशबू से मदहोश होने के फेर में बेहोश होने लगे तब रमणी अपने केशतेल पर शक करती है और गांव के बनिए से भृंगराज की जगह इसबार डाबर आँवला केशतेल की डिमांड करती है।आखिर ब्रांड की बात ही और होती है। बढ़ी हुई कीमत का बोझ या तो ‘वे’ भुगतें या दूकानदार।
    मितरों, …ऊपर यह पर्यावरणीय जानकारियां इस वजह से समझना जरूरी थीं कि इन्हीं में ‘चोटी कटवा ‘ का रहस्य छुपा है। यह कृत्य न अंधविश्वास है न अपराध। यह उक्त पारिस्थितिकी तंत्र के असंतुलन से उपजा उपचार है। बरसाती पानी केशराशि में अतिक्रमण कर चिकट,गंदगी वगैरह से मिलकर दुर्गंध और खुजली पैदा करता है। अमीरों में इसे फंगल इंफेक्शन या रूसी कहा जाता है। जब यह असहनीय हो जाती है तो रमणियों को अपने केश त्यागने की तीव्र इच्छा होती होगी। खुली हवा में सांस लेने की प्राकृतिक इच्छा सासें और समाज नहीं रोक सकतीं। नाई से बाल कटाने की परंपरा बनाई नहीं, ब्यूटीपार्लर का कांसेप्ट पिछड़े इलाकों में पहुंचा नहीं, पहुंच गया है तो मुफ्त में ऊगे बाल कटाने के दो सौ रुपया कौन दे। इसलिए चोटीकाटने का यह कार्य लुकछिप कर किये गये कई घरेलू कार्यों में से ही एक है।
    …दक्षिण में तिरुपति के मंदिर की परंपरा को देखिए। वहां दान में बाल अर्पित करके सफाचट निकल कर भक्तजन आते हैं। इनमें बड़ी तादाद में नारियां भी होती हैं जो धर्म के ही प्रताप से सिर पर खुली हवा के प्रछन्न झोंकों का लुत्फ लेती हैं। बुंदेली में कहावत है ‘जुंआ लगे न लीख मुंडा सबसे ठीक।’ समाज की लादी परंपरा की दवा उन्होंने धार्मिक कर्मकांड में ही ढूंढ़ ली। लोहे को लोहे से काट लिया। पर उत्तर भारत में तिरुपतिबालाजी नहीं हैं। बाल प्रचुरता से हैं। बाल चोटियां बनते हैं और चोटियां कट रही हैं। हल साबुन, शैंपू,कंघी, स्नान , वस्त्रों की सफाई, स्वच्छता में छिपा है पर गरीब की अर्थव्यवस्था आड़े आ जाती है।…घरों में कैद लोअर क्लास महिला क्या करे?…परिवार पाले या बाल संवारे। तो बाल और चोटी लोअर क्लास की ही समस्या है वहीं कटेगी। सदियों से कट रही है, दिख आज रही है।
    (रजनीश जैन, सागर)

  • शिवलिंग के बहाने लड़कियों की सोच पर कुठाराघात

    शिवलिंग के बहाने लड़कियों की सोच पर कुठाराघात

    भारतीय जनता पार्टी राष्ट्रवादी सोच को लेकर सत्ता में पहुंची है। इसके बावजूद पार्टी के कई पुरातनपंथी आज भी राजनीति में धर्म की मिलावट करने से बाज नहीं आ रहे हैं। उन्हें लगता है कि यदि उन्होंने जनता को धर्म की अफीम नहीं चटाई तो शायद वह दुबारा कांग्रेस की ओर मुड़ जाए और भाजपा को फिर निर्वासन झेलना पड़े। शायद यही कारण है कि सत्ता के गलियारों में यदा कदा धार्मिकता का बुखार महामारी बनकर उभरता रहता है। इसका लाभ लेने के लिए तैयार अवसरवादी कोई मौका नहीं छोड़ना चाहते और वे धर्म में आस्थाएं दर्शाकर खुद को सरकार का हनुमान बताने में जुट जाते हैं। कुछ इसी तरह की पहल भोपाल में लड़कियों के एक सरकारी स्कूल की प्रिंसिपल ने कर डाली। मध्यप्रदेश के स्कूल शिक्षा विभाग की धींगामुश्ती के बीच भोपाल के इस सरकारी स्कूल में पोस्टिंग करवा लेने में सफल प्राचार्या निशा कामरानी को अपनी उपयोगिता सिद्ध करने की जल्दी पड़ी थी। सत्ताधारी दल के कतिपय बड़े नेताओं की कृपा से इस स्कूल में पदस्थ हुईं प्राचार्या ने अपनी स्वामिभक्ति दिखाने के चक्कर में सरकार की सोच की पोल खोल दी। उसने बालसभा कार्यक्रम के अंतर्गत मिट्टी के शिवलिंग बनाने की पूजा आयोजित कर डाली। बाकायदा पंडितजी बुलाए गए। हवन हुआ। लाऊडस्पीकर पर विधिविधान से हुई पूजा छह घंटे चली। इस दौरान छात्राएं और शिक्षिकाएं पूजा में शामिल हुईं। हालांकि स्कूल की मुस्लिम शिक्षिका और छात्राओं ने पूजा में शामिल होने से साफ इंकार कर दिया। इस पर उन्हें एक अलग कमरे में बिठा दिया गया।

    पूजा संचालन का माईक प्राचार्या महोदया ने संभाल रखा था। उन्होंने लड़कियों से कहा कि यदि वे विधि विधान से शिवलिंग बनाएंगी तो परीक्षा में पास हो जाएंगी और उन्हें जल्दी नौकरी मिल जाएगी।लड़कियों से कहा गया कि वे आम की पत्तियों को अंगूठी मानकर अपनी उंगली में धारण कर लें। छात्राओं से सूत के कलावे का स्पर्श करवाकर कहा गया कि भगवान ने उनकी भेंट स्वीकार कर ली है। अब पूजा में शामिल सभी छात्राएं आसानी से पास हो जाएंगी।उन्हें सुंदर जीवन भी मिल जाएगा।इस पूजन कार्यक्रम के लिए लड़कियों से चंदा जुटाया गया था। एक शिक्षिका के रिटायरमेंट का आयोजन भी पूजा के बाद किया गया। जिसमें भोज का चंदा भी छात्राओं ने जुटाया था। इसके लिए शिक्षा विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों और भाजपा के स्थानीय नेताओं को भी आमंत्रित किया गया था। प्राचार्या महोदया ने बाकायदा अपने मोबाईल फोन से मैसेज भेजकर ये आमंत्रण वितरित किए थे। हालांकि कई अधिकारियों ने बहाने बनाकर आयोजन से बच निकलने की जुगत भी भिड़ा ली।
    इस संबंध में जब प्राचार्या महोदया से पूछा गया कि हिंदू तुष्टिकरण करने वाले इस गैर संवैधानिक कार्य के लिए उन्होंने किससे अनुमति ली थी तो उन्होंने कहा कि मैंने तो सभी अधिकारियों और नेताओं को सूचित किया था। सभी ने सहमति जताई थी,लिखित अनुमति आने में समय लगता इसलिए मैंने शिक्षिकाओं के सहयोग से ये आयोजन कर लिया।हालांकि इस दौरान उन्होंने संवाददाता का मोबाईल कैमरा छीन लिया और कहा कि यदि उनकी ये बातें जनता के बीच आ जाएंगी तो दंगा हो जाएगा। स्वयं प्राचार्या निशा कामरानी ने कहा कि इस आयोजन से चमत्कार हुआ है और स्कूल में प्रेम का वातावरण निर्मित हो गया है। अब हम भविष्य में ईद मिलन समारोह भी आयोजित करेंगे। उनसे पूछा गया कि आप साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण फैलाकर आखिर छात्राओं को क्या शिक्षा देना चाहती हैं तो उन्होंने कहा कि हम तो प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी के बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ अभियान को बल देने के लिए उन्हें आध्यात्मिकता से जोड़ने का प्रयास कर रहे थे। इस दौरान लड़कियों ने जो शिवलिंग बनाए उनसे उनकी रचना धर्मिता सामने आई है।

    प्राचार्या निशा कामरानी से जब पूछा गया कि आप इस पूजा को जिस तरह परीक्षा पास करने और नौकरी पा लेने का फार्मूला बता रहीं थीं वो कैसे संभव है। इस पर उन्होंने जवाब दिया कि पूजा विधान की प्रक्रिया से लड़कियों को आत्महत्या की बढ़ती घटनाओं से दूर रखने का प्रयास किया गया है। आजकल लड़कियां असफलताओं के कारण आत्महत्याएं कर रहीं हैं इसलिए उन्हें पूजा के माध्यम से खुद को भगवान के सुपुर्द करने की शिक्षा दी गई है। यदि वे अपने कर्म का श्रेय भगवान के सुपुर्द करना सीख जाएंगी तो उन्हें बेवजह असफलता का तनाव नहीं झेलना पड़ेगा।

    भारतीय दर्शन में विद्या को मुक्तिदाता बताया गया है। संस्कृत में इसे …. या विद्या सा मुक्तये …..कहा गया है। बच्चों की तर्कशक्ति और सवाल पूछने की शक्ति को बढ़ाने के लिए ……..विज्ञान आओ करके सीखें ………के वाक्य तमाम स्कूलों में लगाए जाते हैं। प्रख्यात शिक्षाविद इवान इलिच ने तो शायद इसीलिए……. डी स्कूलिंग सोसायटी….. पुस्तक लिखकर ये जताने का प्रयास किया कि स्कूल विद्यार्थियों की मौलिकता को कुचल देते हैं इसलिए स्कूलों को भंग कर देना चाहिए। इसके बावजूद भोपाल के कमला नेहरू स्कूल में छात्राओं को …..जान लेने …..के बजाए …..मान लेने…. की शिक्षा दी जा रही है। ये बात तो इसलिए उजागर हो गई क्योंकि राजधानी में शिक्षा के कारोबार को जानने बूझने वाले लोग आसानी से उपलब्ध हैं। जाहिर है कि भक्तों की नाकारा फौज तैयार करने में जुटे प्रदेश के हजारों स्कूलों में क्या चल रहा है ये इस घटना से आसानी से समझा जा सकता है।

    जब प्राचार्या से कहा गया कि आपने स्कूल में पूजा और शिवलिंग निर्माण का आयोजन करके गैर संवैधानिक अपराध कर डाला है। संविधान में धर्म निरपेक्षता का प्रावधान इस उद्देश्य से डाला गया है कि उन्हें व्यक्तिगत रूप से धार्मिक मान्यताओं को मानने की तो आजादी है लेकिन सार्वजनिक तौर पर उन्हें सर्व धर्म समभाव रखना होगा। इसी कानूनी बाध्यता के कारण देश की सरकार सबका साथ सबका विकास का नारा लेकर चल रही है। इस पर प्राचार्या महोदया ने कहा कि कुछ लोग उनके खिलाफ षड़यंत्र कर रहे हैं। इसमें कुछ पत्रकार भी शामिल हैं । इनके बारे में वे सब जानती हैं और समय आने पर उनके नाम उजागर करेंगी।जब उनसे पूछा गया कि नाबालिग बच्चियों को वे संघर्ष के लिए तैयार करने के बजाए समर्पण की सीख क्यों दे रहीं हैं। तो उन्होंने कहा कि उन पर भगवान की विशेष कृपा है इसलिए वे विरोधियों के जाल से हमेशा बच जाती हैं।

    प्राचार्या निशा कामरानी शासकीय नौकरी में आने के बाद से लगातार विवादों में घिरी रहीं हैं। सिक्किम के नवोदय विद्यालय जाने और वापस आने की कहानी भी उनकी जुगाड़ गाथा को समृद्ध बनाती है। माननीय उच्च न्यायालय के न्यायाधीश जस्टिस राजेन्द्र मेनन ने अपने फैसले में उन्हें अयोग्य पाया था। इसके बावजूद उन्होंने एक बार फिर राजधानी के प्रमुख स्कूल के प्राचार्य को धकियाकर ये कुर्सी कबाड़ ली। स्कूल शिक्षा विभाग के लगभग बीस अधिकारियों कर्मचारियों के विरुद्ध वे शिकायतें कर चुकीं हैं। एक शिकायत को तो पुलिस ने प्राथमिक जांच के बाद न केवल नस्तीबद्ध किया बल्कि निशा कामरानी को फटकार भी लगाई कि वे शिकायतें करने से पहले अपने गिरेबान में झांककर जरूर देखें।

    बालीवुड की चर्चित फिल्म है ….चांदनी चौक टू चायना… इस फिल्म का हीरो सिद्धू (अक्षय कुमार) आलू को अपना भगवान मानकर उसकी पूजा करता है। जब कुछ चीनी गुंडे उसे पीटते हैं तो वह अपने उस आलू भगवान से विनती करता है कि वो उसे गुंडों से बचाए। तब भगवान तो प्रकट नहीं होते बल्कि एक चीनी नागरिक जो निर्वासन भोग रहा था वो आकर उसे बचाता है। इसके बाद वह हीरो को युद्धकला में इतना पारंगत बना देता है कि हीरो सिद्धू उस चीनी माफिया का नाश कर देता है।

    आज जब एक बार फिर चीनी सेनाएं सीमा पर खड़ीं हमें युद्ध के लिए ललकार रहीं हैं तब मध्यप्रदेश की शिवराज सिंह चौहान सरकार के स्कूल अपने विद्यार्थियों को ईश्वरवादी बनाकर चुनौतियों से भागना सिखा रहे हैं। हथियार डाल देने वाली ये सोच भला चीनी सेनाओं का मुकाबला कैसे कर पाएगी। सरकार की इस सोच के बारे में जब शिक्षा मंत्री विजय शाह की प्रतिक्रिया जानना चाही तो उन्होंने चुप्पी साध ली। स्कूल शिक्षा विभाग के आयुक्त नीरज दुबे से जब इस संबंध में पूछा गया तो उन्होंने ये कहकर पल्ला झाड़ लिया कि उन्हें इस घटना की जानकारी ही नहीं है। जिला शिक्षा अधिकारी ये कहकर बच निकले कि उन्हें क्यों झगड़े में फंसा रहे हो। दरअसल में शिवराज सिंह सरकार का पूरा शिक्षा तंत्र नई पीढ़ी को लाचार और असहाय बनाने पर तुला हुआ है। प्रदेश की नई पीढ़ी शिक्षा माफिया के हाथों लूटी जा रही है। डिग्रियां कबाड़ने में जुटे युवा बेरोजगारी झेलने के लिए अभिशप्त हैं। जबकि हर असफलता का ठीकरा कांग्रेस की पूर्ववर्ती भ्रष्ट सरकारों पर थोपने में सिद्धहस्त हो चुके भारतीय जनता पार्टी के नेतागण अपनी जवाबदारी स्वीकारने को तैयार ही नहीं हैं। प्रदेश को लगातार कर्ज के दलदल में धकेलने में जुटी ये सरकार सवाल खड़े करने वाले युवाओं से घबराती है ।शायद इसीलिए षड़यंत्र पूर्वक निशा कामरानी जैसी प्राचार्या को राजधानी के प्रमुख स्कूल में तैनात करके ये माडल वह प्रदेश के अन्य स्कूलों के लिए भी प्रस्तुत करने का प्रयास कर रही है। इस स्कूल से निकली छात्राएं जिन 1400 घरों में जाकर संघर्ष की जगह समर्पण का भाव जगाएंगी वहां एक लाचार समाज ही तो जन्म लेगा। सरकारी योजनाओं के लिए कर्ज का साम्राज्य चलाने वाले विदेशी सूदखोरों का भी शायद यही उद्देश्य है जिसे शिवराज सिंह सरकार बखूबी पूरा कर रही है।