Month: June 2017

  • जीएसटी से सस्ती होंगी सेवाएं

    जीएसटी से सस्ती होंगी सेवाएं

    भोपाल,एस न्यूज इंडिया(अक्षांश चतुर्वेदी)। जी एस टी के विरोध व समर्थन में नेता बनने की फिराक में अपने-अपने तरीके से अफवाहें फैला रहे हैं जी एस टी की सही पड़ताल करने के लिए हमारे संवाददाता ने कर सलाहकारों से जीएसटी के संबंध में बातचीत की जिसके मुख्य अंश इस प्रकार है !

    *GST* सरल रूप में जानिए:
    नमो सरकार 1 जुलाई को गुड्स ऐंड सर्विसेज टैक्स (जीएसटी) लागू करने जा रही है। सभी वस्तुओं एवं सेवाओं के लिए टैक्स की दरें तय हो गईं और करीब-करीब सभी नियमों को भी हरी झंडी मिल गई। लॉन्चिंग के लिहाज से अब जो थोड़ी-बहुत कमियां बच गई होंगी, उन्हें दूर करने के लिए 30 जून को जीएसटी काउंसिल की एक और मीटिंग होगी। आइये सब जानते हैं जीएसटी के बारे में सबकुछ…

    *1. क्या है जीएसटी?*
    वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) एकीकृत कर प्रणाली है। इसमें सभी अप्रत्यक्ष कर को मिला दिया गया है। अब हर राज्य में अलग-अलग कर नहीं लगेगा बल्कि देशभर के लिए एक जीएसटी होगा।

    *2. क्या जीएसटी उपभोक्ता को भी देना होगा?*
    इसमें सेवा कर भी शामिल है। इसलिए एसी रेस्त्रां में खाने, ट्रेन-हवाई यात्रा और अन्य सेवाओं पर उपभोक्ता को भी जीएसटी चुकाना होगा। लेकिन इसे संबंधित सेवा प्रदाता वसूलेंगे और जमा करेंगे।

    *3. क्या जीएसटी में सबको रिटर्न भरना होगा?*
    नहीं। केवल 20 लाख रुपये से अधिक का कारोबार करने वाले व्यक्ति या संस्थाएं ही जीएसटी चुकाएंगी।

    *4. आम आदमी को जीएसटी से कैसे फायदा होगा?*
    एक कर होने से कर के ऊपर कर नहीं चुकाना पड़ेगा। इससे वस्तु एवं सेवाएं सस्ती होंगी।

    *5. क्या जीएसटी में सभी तरह की वस्तुओं और सेवाओं पर कर की दर समान है?*
    नहीं। इसके तहत कर की चार श्रेणी है। इसमें 5 फीसदी,12 फीसदी, 18 फीसदी और 28 फीसदी है।
    *6. खाने-पीने के समान पर कितना कर लगेगा?*
    जीएसटी के तहत खाने-पीने के ज्यादातर सामान पर कोई कर नहीं है। जबकि कुछ वस्तुओं पर सबसे निचली दर पांच फीसदी की श्रेणी में रखा गया है।

    *7. क्या दूध और घी पर जीएसटी लगेगा?*
    दूध को जीएसटी से बाहर रखा गया है। जबकि घी पर जीएसटी लगेगा

    *8. काजू पर जीएसटी की दर क्या है?*
    इसपर पांच फीसदी जीएसटी लगेगा। पहले इसपर 12 फीसदी जीएसटी लगाने का प्रस्ताव था जिसे बाद में घटा दिया गया।

    *9. क्या बिक्री कर और वैट अलग से चुकाना होगा?*
    नहीं। जीएसटी में बिक्री कर, उत्पाद शुल्क, और मूल्यवर्द्धित कर (वैट) सबको मिल दिया गया है। इसलिए इन्हें अलग से चुकाने की जरूरत नहीं होगी।

    *10. क्या जीएसटी से चुंगी कर खत्म हो जाएगा?*
    हां। अब राज्यों में प्रवेश कर (चुंगी) खत्म हो जाएगा। इसे भी जीएसटी में मिला दिया गया है।

    *11. क्या जीएसटी से आयकर का बोझ घटेगा?*
    आयकर का जीएसटी से सीधे कोई संबंध नहीं है। लेकिन जीएसटी की वजह से कर वसूली बढ़ेगी तो भविष्य में इससे आयकर की दरों में राहत की उम्मीद कर सकते हैं।

    *12. जीएसटी से मकान के दाम बढ़ेंगे या कम होंगे?*
    इससे मकान के दाम घटेंगे। वर्तमान में निर्माणाधीन मकान पर 4.5 फीसदी का सेवा कर लगता है जो जीएसटी में बढ़कर 12 फीसदी हो जाएगा। इसके बावजूद मकान के दाम घटेंगे क्योंकि अभी निर्माण सामग्री पर उत्पाद शल्क, वैट और चुंगी कर है। लेकिन वतर्मान समय में इनका कोई इनपुट क्रेडिट (रिफंड) नहीं मिलता है। जबकि जीएसटी में पूरा क्रेडिट मिलेगा और बिल्डर इन सब चीजों पर जो कर चुकाएगा वह उसे वापस मिल जाएगा।

    *13. जीएसटी से कैसा सस्ता होगा मकान?*
    यदि ठेकेदार दो हजार रुपये प्रति वर्गफुट के हिसाब से बिल्डर से 18 फीसदी सेवा कर 360 रुपये प्रति वगर्फुट वसलूता है। इसके बाद बिल्डर फ्लैट का दाम तीन हजार रुपये प्रति वगर्फुट रखता है तो 12 फीसदी जीएसटी की दर 360 रुपये प्रति वगर्फुट कर बनेगा। 360 रुपयेप्रति वगर्फुट जीएसटी ठेकेदार पहले ही दे चुका है तो इस स्थिति मेंबिल्डर को कोई कर नहीं चुकाना होगा। इस स्थिति में खरीदार से भी वह सेवा कर नहीं वसूल सकता है।

    *14. हर माह की बिक्री का रिटर्न भरने की तारीख क्या होगी?*
    जीएसटी कानून के तहत एक महीने में की गई सभी प्रकार की बिक्री या कारोबार के लिए रिटर्न अगले महीने की 10 तारीख तक भरनी है। इसीलिए अगर जीएसटी 1 जुलाई से लागू होता है, तो बिक्री का आंकड़ा 10 अगस्त तक अपलोड करना है।

    *15. क्या रिटर्न के लिए कोई प्रारूप है जिसे देखकर रिटर्न भरा जा सकेगा?*
    25 जून तक जीएसटीएन पोर्टल पर एक्सेल शीट जारी की जाएगी। इससे करदाताओं को उस प्रारूप के बारे में पता चलेगा जिसमें सूचना देनी है।

    *16. रिटर्न का ब्योरा भरने का तरीका क्या होगा?*
    एक्सेल शीट में कंपनियों को रसीद (इनवायस) संख्या, खरीदार का जीएसटीआईएन, बेचे गये सामान या सेवाएं, वस्तुओं का मूल्य या बिक्रीकी गई सेवाएं, कर प्रभाव तथा भुगतान किए गये कर जैसे लेन-देन का ब्योरा देना होगा।

    *17. रिटर्न फॉर्म कब से मिलना शुरू होगा?*
    जीएसटी रिटर्न फार्म जुलाई के मध्य में उपलब्ध कराया जाएगा

    *18. किराने की दुकान में ग्राहक पांच-10 रुपए का भी सामान खरीदते हैं। क्या उनका भी बिल बनाना पड़ेगा?*
    खरीदार बिल मांगता है तो उसे देना पड़ेगा। नहीं चाहिए तो 200 रुपए से कम के सभी लेन-देन के बदले पूरे दिन में एक बिल बना सकते हैं। इनके खरीदार आम ग्राहक यानी अनरजिस्टर्ड होने चाहिए।

    *19. क्या सबको एक जैसा बिल बनाना है?*
    नहीं। जीएसटी करदाता इसका डिजाइन तैयार करने के लिए स्वतंत्र हैं।हालांकि, बिल बनाने के नियम के मुताबिक कुछ जरूरी जानकारियां उस परहोनी चाहिए।

    *20. जीएसटीएन पर पंजीकरण दोबारा कब शुरू होगा?*
    25 जून से जीएसटीएन पर पंजीकरण शुरू होगा।

    *21. क्या जीएसटी के लिए हमेशा इंटरनेट की जरूरत?*
    नहीं। केवल जीएसटी रिटर्न के लिए महीने में एक बार इंटरनेट की जरूरत होगी। हर रोज कंप्यूटर पर ब्योरा दर्ज करने की भी जरूरत नहींहै।

    *22. बिल ऑफ सप्लाई क्या है? कौन जारी करेगा?*
    कर से छूट वाली वस्तुएं एवं सेवाओं के लिए जो बिल बनेगा उसे बिल ऑफ सप्लाई कहा जाएगा। पंजीकृत व्यक्ति बिल की जगह इसे जारी करेगा। इसमें भी आम ग्राहक (अनरजिस्टर्ड ) व्यक्ति को 200 रुपए से कम की आपूर्ति के लिए बिल जरूरी नहीं है।

    *23. रिसीट और रिफंड वाउचर क्या है?*
    पंजीकृत कारोबारी को किसी वस्तु एवं सेवा के लिए अग्रिम (एडवांस) भुगतान मिलता है तो उसके बदले उसे रिसीट वाउचर बनाना पड़ेगा। बाद में वस्तु एवं सेवा की आपूर्ति नहीं हुई तो पैसे लौटाते वक्त रिफंडवाउचर बनेगा।

    *24. क्रेडिट और डेबिट नोट कब जारी होंगे?*
    आपूर्तिकर्ता ने जिस कीमत का कर का बिल बनाया और बाद में पता चला किकीमत कम है। तब वह क्रेडिट नोट जारी करेगा। इसी तरह यदि बाद में पताचलता है कि कीमत ज्यादा है तो डेबिट नोट जारी होगा। इसी तरह खरीदार ने सामान लौटाया या सामान की मात्रा कम निकली तब भी आपूर्तिकर्ता क्रेडिट नोट जारी करेगा।

    *25. क्या छोटे कारोबारियों के लिए बिल पर प्रोडक्ट कोड नंबर (एचएसएन) लिखना जरूरी है?*
    नहीं। जिनका सालाना कारोबार 1.5 करोड़ रुपए तक है उन्हें बिल पर एचएसएन कोड लिखने की जरूरत नहीं है।

    *26. टैक्स की रसीद या बिल कौन और कब जारी करेगा?*
    इसे जीएसटी के दायरे में आने वाले उत्पाद की आपूर्ति करने वाला पंजीकृत व्यक्ति जारी करेगा। सामान के लिए बिल उसे भेजने से पहले या भेजते वक्त जारी होगा। सेवाओं का बिल या रसीद आपूर्ति के 30 दिनबाद तक जारी किया जा सकता है।

    *27. क्या जीएसटी से महंगाई बढ़ने की आशंका है?*
    नहीं। सरकार का आकलन है कि जीएसटी से खुदरा महंगाई दो फीसदी तक घट सकती है।

  • कांग्रेस को तमाचे में चमके सिंधिया

    कांग्रेस को तमाचे में चमके सिंधिया

    -आलोक सिंघई-
    सागर में कलेक्ट्रेट का घेराव कर रहे उद्दंड कार्यकर्ताओं को नसीहत देने के बहाने नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह राहुल भैया ने एक कार्यकर्ता के गाल पर थप्पड़ रसीद कर दिया। कांग्रेस के इस प्रदर्शन को नेतृत्व देने के लिए प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अरुण यादव भी पहुंचे थे। ज्योतिरादित्य सिंधिया खेमे के प्रतिनिधि कहे जाने वाले गोविंद सिंह भी घटना स्थल पर मौजूद थे। अचानक घटित इस घटनाक्रम से सभी भौंचक्के रह गए। सत्ता से बेदखली के बरसों बाद किसान आंदोलन के सहारे सक्रिय कांग्रेस इन दिनों बदली बदली नजर आ रही है। हर एक कार्यकर्ता का अभिनंदन किया जा रहा है। सारे नेतागण उन्हें लाड़ प्यार से सहेज रहे हैं क्योंकि भाजपा के लंबे शासनकाल के बाद कार्यकर्ताओं को सहेजना एक चुनौती हो गया है। ऐसे माहौल में जब आज कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी का जन्मदिन है तब सागर में कार्यकर्ता को पड़ा नेता प्रतिपक्ष का तमाचा कई संकेत दे रहा है। कांग्रेस हाईकमान को इसका आशय समझना होगा। राजनीतिक हलकों में ये तमाचा कांग्रेस की मौजूदा हालत का पूरा सच बयान कर रहा है।

    कांग्रेस शुरु से संगठन विहीन राजनीतिक दल रहा है। कभी कांग्रेस को संगठित करने का प्रयास दिल से नहीं किया गया। जितने भी अधिवेशन हुए वे नेताओं के इर्द गिर्द हुए और उन्हीं के माध्यम से कांग्रेस सत्ता हासिल करती रही है। जब किसी नए नेता का उदय होता है तब कार्यकर्ताओं की आस्थाएं बदल जाती हैं। वे जुगाड़ जमाकर नेता के इनर सर्किल में पहुंचते हैं और अपने वाजिब गैर वाजिब काम करवाकर अपनी आस्था की फीस वसूलने का जतन करते हैं। जो इसमें सफल हो जाता है वो थोड़ा बड़ा कार्यकर्ता बन जाता है। जो असफल रहता है वो छुटभैया नेता के रूप में चंदा वसूली में जुट जाता है। कांग्रेस का यही संगठन देश में अराजकता और धींगामुश्ती का पर्याय रहा है। इन हालात को समझते हुए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने अपने पूर्णकालिक कार्यकर्ताओं को भारतीय जनता पार्टी में भेजा। प्रशिक्षण संवर्गों का आयोजन किया। कार्यकर्ताओं को संस्कारित करने का अभियान चलाया। उन्हें समाजसेवा का धर्म सिखाया। बोलना सिखाया। फिर उन्हें भाजपा में नेतृत्व दिलाने का प्रयास भी किया। ये बात अलग है कि उनमें से अधिकतर प्रशिक्षित कार्यकर्ताओं को बाद में सत्ता के मद ने गुमराह भी किया। इसके बावजूद भाजपा में आज बड़ी संख्या में ऐसे कार्यकर्ता भी हैं जो राजनीति या समाजसेवा को देश सेवा के धर्म से जोड़कर देखते हैं।

    ऐसा नहीं कि कांग्रेस में सारे के सारे चोर, मक्कार, अराजक, गुंडा तत्व हैं। कांग्रेस के कार्यकर्ता भी भारतीय परिवेश में ही पले बढ़े हैं। वे जानते हैं कि समाज को एकजुट रखने के लिए हमें अपना आचरण कैसा रखना चाहिए। हमारी भूमिका क्या और हमारे दायित्व क्या हैं, हमारी सीमाएं क्या हैं ये भी समय समय पर कांग्रेस के नेता अपने कार्यकर्ताओं को सिखाते रहते हैं। सागर में कांग्रेस कार्यकर्ता को पड़ा तमाचा भी कुछ इसी तरह का प्रशिक्षण संवर्ग का हिस्सा कहा जा सकता है। हाल ही में मंदसौर में कांग्रेस पर किसान आंदोलन में हिंसा भड़काने का आरोप लगा है। पूरे देश में कांग्रेस को किसान आंदोलन का खलनायक माना जा रहा है। इन हालात में कांग्रेस को फूंक फूंककर कदम रखने की जरूरत है। जाहिर है कि अजय सिंह अपनी मौजूदगी में किसी भी किस्म की अराजकता का लांछन नहीं झेलना चाहते हैं। उन्होंने कांग्रेस के नेता से माला पहिनने का आग्रह ठुकराया या एक कार्यकर्ता को थप्पड़ रसीद कर दिया इससे उनकी मनःस्थिति और कांग्रेस की अंतर्कलह की आहट को साफ तौर पर सुना जा सकता है।

    राहुल गांधी के जन्मदिन पर राहुल भैया अजय सिंह का ये थप्पड़ कांग्रेस को सबक सिखाने से ज्यादा खुद को पाक साफ रखना ज्यादा प्रतीत होता है। साथ में हाईकमान के लिए संकेत भी है कि वो अपने राजनैतिक विरोधियों के जाल में फंसने वाले नहीं हैं। सुरखी के पूर्व विधायक गोविंद सिंह ज्योतिरादित्य खेमे के प्रतिनिधि माने जाते हैं। कभी उन्होंने प्रदेश की ठाकुर लाबी से भी करीबी स्थापित करने की कोशिश की थी। बाद में उन्होंने सिधिया खेमा पकड़ लिया। हालांकि इसके बावजूद वे दिग्विजय सिंह खेमे के माध्यम से भी अपनी सत्ता का परचम फहराते रहे हैं। उनकी पिछली पराजय अर्जुनसिंह खेमे के खास सहयोगी संतोष साहू की बेटी के हाथों हुई थी। उनकी बेटी पारुल साहू केशरी ने भाजपा के प्रत्याशी के तौर पर 2013 का विधानसभा चुनाव लड़ा और टसल के बीच गोविंद राजपूत को हराकर विधानसभा पहुंची।पारुल साहू के भाजपा में जाने से कांग्रेस की शक्ति घट गई और तमाम राजनीतिक हथकंडे अपनाने के बाद भी गोविंद ये चुनाव हारे थे। भाजपा के पास लगातार सत्ता से पोषित हो चुके गोविंद सिंह को हराने लायक प्रत्याशी था भी नहीं इसलिए उसके सलाहकारों ने कांटे से कांटा निकालकर सुरखी सीट पर अपना परचम फहराया था।

    अब गोविंद राजपूत के सामने अपने बिखरी शक्ति एक बार फिर सहेजने की चुनौती है। इसलिए उन्होंने आज के प्रदर्शन में अजय सिंह को आमंत्रित किया था। अंदरूनी सूत्र बताते हैं कि अजय सिंह को खबर मिली थी कि इस प्रदर्शन को हिंसक बनाकर उन्हें कलंकित करने की तैयारी की जा रही है। उन्हें पता था कि उनके हर कदम की वीडियो ग्राफी भी होगी। इसके बावजूद उनकी भावनाएं उनकी गतिविधियों से साफ उजागर हो गईं। जब कांग्रेस के कार्यकर्ता सर्किट हाऊस में अजय सिंह का स्वागत कर रहे थे तब उन्होंने कार्यकर्ताओं से फूलों के गुलदस्ते तो स्वीकार कर लिए पर एक कांग्रेसी नेता संदीप सबलोक की माला ये कहते हुए पहिनने से इंकार कर दिया कि वे माला नहीं पहिनते। इस घटना का भी वीडियो जल्दी ही वायरल हो गया। इसी तरह जब वे आंदोलन कर रहे कार्यकर्ताओं को पुलिस बैरिकेड तोड़ने से रोक रहे थे तभी उन्होंने एक कार्यकर्ता को झांपड़ रसीद कर दिया। अजय सिंह फूंक फूंककर कदम रख रहे थे लेकिन कांग्रेस कार्यकर्ता को मारे गए थप्पड़ ने सारे किए धरे पर पानी फेर दिया। उनके विरोधियों का मकसद भी यही था जिसमें वे बहुत हद तक सफल भी हो गए।

    इस घटनाक्रम से कांग्रेस की अंदरूनी उथल पुथल की झलक साफ देखी जा सकती है। पहली बात तो ये है कि संगठित और प्रशिक्षित भारतीय जनता पार्टी से मुकाबला करने में आज भी कांग्रेस मीलों दूर खड़ी है। स्व. सुभाष यादव की विरासत पर काबिज उनके सुपुत्र अरुण यादव कांग्रेस के पुराने संगठन की कमान तो संभाल चुके हैं लेकिन वे नवागत कार्यकर्ताओं को प्रशिक्षण देने में बुरी तरह नाकामयाब साबित हुए हैं। वास्तव में ये उनके बस की बात भी नहीं है। कांग्रेस में जब किसी को कोई जवाबदारी दी जाती है तो पार्टी की तरफ से उसे रसद पानी उपलब्ध नहीं कराया जाता है। गुटों में बंटी कांग्रेस के नेतागण सत्ता की शक्तियां अपने गुटों तक ही समेटकर रखते हैं। जाहिर है अरुण यादव सफल हों ये कोई नहीं चाहता। कांग्रेस के आम कार्यकर्ताओं का मानना है कि सुभाष यादव ने अपने कार्यकाल में अपेक्स बैंक और सहकारिता आंदोलन के माध्यम से भरपूर संसाधन जुटा लिए थे। पार्टी आलाकमान भी ये अपेक्षा रखता है कि अब अरुण यादव उस विरासत को संभाल रहे हैं तो वे अपने हाथ खुले रखकर संगठन को संवारने का काम करेंगे। हाल ही में खलघाट पर कांग्रेस के प्रदर्शन ने भी पार्टी की आपसी सिर फुटौव्वल को बढ़ावा दिया। इस प्रदर्शन में किसान तो पहुंचे ही साथ में कमलनाथ, दिग्विजय सिंह,ज्योतिरादित्य सिंधिया,सुरेश पचौरी, भी पहुंचे। अरुण यादव के प्रचार तंत्र ने इस आंदोलन में से कथित तौर पर अजय सिंह को गायब करने की कोशिश की। जाहिर है कि अब सागर की घटना ने उनकी ही परीक्षा कापी में सवालिया निशान लगा दिया है। हाईकमान तक ये संकेत पहुंच चुका है कि अराजकता का आरोप झेल रही कांग्रेस को संगठित और प्रशिक्षित करने का काम अब तक सिफर ही है।

    राजनीति के इस दांव पेंच के बीच अजय सिंह से जुड़े सूत्र कह रहे हैं कि उन्होंने कार्यकर्ता को झांपड़ नहीं मारा। उनकी इस बचकानी सफाई पर भला कोई यकीन भी कैसे करे। जब इस घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया हो तब उनकी ओर से आई इस सफाई का कोई मतलब ही नहीं है। अजय सिंह को स्वीकारना ही पड़ेगा कि उन्होंने अराजक कार्यकर्ता को समझाने के लिए थप्पड़ की भाषा का इस्तेमाल किया था। अपने राजनैतिक प्रतिद्वंदियों के बिछाए जाल को काटने के फेर में अजय सिंह एक छोटी सी गलती कर गए हैं जो उनके राजनैतिक बायोडाटा में दर्ज भी हो गई है। ज्योतिरादित्य सिंधिया को अब तक कांग्रेस हाईकमान ने पार्टी की ओर से मुख्यमंत्री का अधिकृत चेहरा घोषित नहीं किया है। इसके बावजूद कांग्रेस के कार्यकर्ता सिंधिया की ओर आशा भरी निगाहों से देखने लगे थे। अजय सिंह के थप्पड़ ने कार्यकर्ताओं उस अभिलाषा को और हवा दे दी है।

  • शिवराज की पुंगी बजाने मैदान में उतरा सिंधिया राजघराना

    शिवराज की पुंगी बजाने मैदान में उतरा सिंधिया राजघराना

    -आलोक सिंघई-
    अटेर उपचुनाव में सिंधिया सल्तनत को चुनौती देना मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को मंहगा पड़ रहा है। किसानों की आड़ लेकर मुख्यमंत्री की हूटिंग शुरु होते ही उनके विरोधी जिस तरह लामबंद नजर आ रहे हैं उससे भाजपा हाईकमान चौंक गया है। सूत्र बताते हैं कि इस पूरे घटनाक्रम पर प्रधानमंत्री सचिवालय सीधे नजर रखे हुए है । अपने साम्राज्य के सबसे मजबूत किले को ढहने से बचाने के लिए उसने रणनीति बदलने का मन बना लिया है। चूके चौहान साबित होने जा रहे शिवराज जी के विरोध में फूटी कांग्रेस अपने सत्ता आग्रह का स्वप्न साकार होता देखने लगी है। हालांकि तमाम अंतर्विरोधों के बाद भी भाजपा के रणनीतिकार विरोध के इस दावानल को शांत करने में जुट गए हैं पर उनके हर पांसे इस बार उलटे पड़ते दिखाई दे रहे हैं।

    सत्ता के तीन साल का उत्सव मनाती केन्द्र की भाजपा सरकार को मध्यप्रदेश में असंतोष के भंवर का सामना करना पड़ रहा है। इसका जवाब हाईकमान के पास तो है लेकिन वह मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को हटाकर कोई नई मुसीबत मोल नहीं लेना चाहता। इसका मतलब ये भी नहीं कि शिवराज को केन्द्र की क्लीनचिट मिल चुकी है। फिलहाल तो राष्ट्रपति चुनाव की तैयारियों पर अपना ध्यान केन्द्रित करके मोदी सरकार अपने पांव मजबूत करने में जुट गई है। जबकि इधर शिवराज सरकार को संगठन की ओर से भरपूर संरक्षण दिया जा रहा है। इन सबके बीच भाजपा संगठन की राज्य इकाई भी निशाने पर आ गई है। भाजपा के भीतरी असंतोष ने संगठन की खिल्ली उड़ाना भी शुरु कर दिया है। जाहिर है कि निकट भविष्य में मुख्यमंत्री के साथ साथ प्रदेश भाजपा संगठन को भी अग्निपरीक्षा से गुजरना होगा।

    अटेर उपचुनाव में जब भाजपा प्रत्याशी अरविंद भदौरिया लगभग आठ सौ वोट के मामूली अंतर से पराजित हुए तब किसी ने ये नहीं समझा था कि मुख्यमंत्री की फिसली जुबान भाजपा का सुख चैन भी छीन सकती है। बंदूक से निकली हुई गोली कभी वापिस हुई है। संगठन की तमाम लीपापोती के बाद भी पार्टी के खांटी नेता इस टीस को नहीं भुला पा रहे हैं। श्री चौहान ने तब सिंधिया घराने पर तंज कसते हुए कहा था कि स्वाधीनता संग्राम के दौर में सिंधिया राजघराने के लोगों ने अंग्रेजों के साथ मिलकर अटेर के आसपास के उन लोगों को काफी सताया जो वीरांगना महारानी लक्ष्मीबाई का साथ दे रहे थे। इतिहास बदला नहीं जा सकता पर उस पर चिंतन मनन तो जरूर किया जा सकता है। शिवराज जी को भी चिंतन मनन का उतना ही अधिकार है जितना कि हर देश भक्त को है। प्रयास चिंतन का नहीं बल्कि लांछन का था। शिवराज जी और उनके सलाहकारों का सोचना था कि ऐसा बोलकर वे महारानी लक्ष्मीबाई की लोकप्रियता को सहलाकर अपने पक्ष में भुना पाएंगे। इसका असर ठीक उलटा हुआ। मनोविज्ञान को समझे बगैर किताबी अंदाज में की गई इस टिप्पणी ने न केवल कांग्रेस के ज्योतिरादित्य सिंधिया को भड़का दिया बल्कि भाजपा की जन्मदात्री लाबी को भी आहत कर दिया। बताते हैं कि इस बयान की पृष्ठभूमि में कई समीकरण बनते बिगड़ते रहे।

    सत्ता केन्द्र से लगातार बेदखली झेल रही कांग्रेस इस अवसर को भुनाने के लिए झट से ज्योतिरादित्य सिंधिया के साथ आ खड़ी हुई । सिंधिया किसानों के न्याय का झंडा लेकर अपने घराने के अपमान का बदला लेने निकल पड़े हैं जबकि सत्ता की सामूहिक लूट करके भाग निकले कांग्रेसी अपनी ऐशगाहों से निकलकर सिंधिया के बगलगीर होने लगे हैं। ऐसा नहीं कि कांग्रेसियों ने ज्योतिरादित्य सिंधिया को अपना नेता मान लिया है बल्कि वे उस जहाज पर सवार होकर सत्ता संधान का स्वप्न देख रहे हैं जिसका ईंधन भाजपा के असंतोष के कुएं से निकला है। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और उनके कैलाशवासी सलाहकार सुंदरलाल पटवा की एकांगी राजनीति ने भाजपा के कई दिग्गजों को घायल कर रखा है। इनमें केन्द्रीय मंत्री नरेन्द्र सिंह तोमर, पंचायत मंत्री गोपाल भार्गव, श्रीमंत यशोधरा राजे सिंधिया, श्रीमती माया सिंह,विजय शाह, पूर्व मंत्री कैलाश विजयवर्गीय, बाबूलाल गौर, प्रभात झा, कमल पटेल,लक्ष्मीकांत शर्मा जैसे और भी कई दिग्गज इनमें शामिल हैं। इनमें पूर्व वित्तमंत्री राघवजी भाई का प्रत्यक्ष हस्तक्षेप भले ही न दिखाई दे रहा हो पर विद्रोह को भड़काने में सुंदरलाल पटवा के विरोधियों की नाराजगी की भी बड़ी भूमिका है। श्री राघवजी भाई जैसे सफल वित्तमंत्री के मार्गदर्शन में भाजपा सरकार ने सत्ता शीर्ष के बड़े सोपान पार किए थे लेकिन व्यक्तिगत रंजिश के चलते स्व. सुंदरलाल पटवा ने कथित तौर पर शिवराज सिंह चौहान के माध्यम से राघवजी भाई का राजनीतिक वध कर डाला था।पटवा स्व. अर्जुनसिंह खेमे के नजदीक माने जाते थे और राघवजी सिंधिया राजघराने के साथ खड़े होते थे। इस कदम ने भी सिंधिया सल्तनत की गौरवगाथा को कलंकित किया था। मामला चूंकि कथित तौर पर चरित्रहीनता से जुड़ा था इसलिए तब राघवजी भाई का साथ देने कोई आगे नहीं आया।

    विदेशी निवेश को आमंत्रित करने में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने जिन इन्वेस्टर समिटों की श्रंखला चलाई उन्हें सफल बनाने में तत्कालीन उद्योगमंत्री श्रीमती यशोधरा राजे सिंधिया की भी बड़ी भूमिका थी। विदेशों में बसे उद्योगपतियों को राजी करके मध्यप्रदेश में लाने के लिए सिंधिया घराने ने अपनी पुरानी साख का इस्तेमाल किया लेकिन बाद में श्री चौहान ने कथित तौर पर उन उद्योगपतियों पर पार्टी के नियम लाद दिए जिससे यशोधरा जी और शिवराज जी के बीच दूरियां बढ़ गईं। नतीजतन यशोधरा जी को प्रदेश का वैभव संवारने की इस मुहिम से किनारे कर दिया गया।

    श्री चौहान ने अपनी खीज मिटाने के लिए जिस तरह अटेर में सिंधिया के पूर्वजों पर हमला बोला उससे तो ये दूरियां खाई में बदल गईं। कांग्रेस की लूट और प्रताड़ना से तंग होकर भाजपा को सींचने वाली राजमाता स्व. विजयाराजे सिंधिया से जुड़े भाजपा के दिग्गज रणनीतिकारों ने भी इस बयान को उचित नहीं माना। उनका कहना था कि पूर्वजों ने यदि कोई गलती की भी थी तो उसके लिए क्या वर्तमान के समर्पित जनसेवकों को लांछित किया जाना चाहिए। जबकि राजमाता के त्याग और समर्पण ने भाजपा को आज इस मुकाम तक पहुंचाने में बड़ी भूमिका निभाई हो। गौरतलब है कि गुलाम भारत में अंग्रेजों से सरेआम लोहा लेकर कोई भी सल्तनत अपने नागरिकों को सुरक्षित नहीं रख सकती थी। तात्याटोपे और लक्ष्मीबाई के साथ सिंधिया राजघराना भी अंग्रेजों से पिंड छुड़ाना चाहता था। इसकी रणनीति भी बनाई गई पर लक्ष्मीबाई की बैचेनी और एकला चलो की रणनीति ने इसे घाटे का सौदा बना दिया। लक्ष्मीबाई तो शहीद हो गईं पर उनकी रियाया को अंग्रेजों ने बहुत प्रताड़ित किया। ये बात सच है , लेकिन कांग्रेस के नेताओं ने जिस तरह इसके लिए सिंधिया राजघराने को दोषी ठहराया उसके चलते आज तक सिंधिया के वारिसों को कलंक का सामना करना पड़ रहा है।

    एक समय तो वो भी आया जब श्रीमती इंदिरा गांधी ने सिंधिया राजघराने को मटियामेट करने के लिए अपने खास सिपहसालार अयोध्यानाथ पाठक को ग्वालियर भेजा था। पाठक ने पुलिस अफसर रहते हुए सिंधिया घराने के प्रमुख दीवानों और मालगुजारों की हत्याएं करने का अभियान चला दिया। उन पर आपराधिक मुकदमे बनाए गए। उनके खजाने लूटे गए और सरेआम हत्याएं कर दीं गईं।पाठक को श्रीमती गांधी ने सात सात गैलेन्ट्री अवार्डों से सम्मानित किया। इस लूट से बैचेन होकर स्व. विजयाराजे सिंधिया ने अपने संसाधनों का इस्तेमाल करके भाजपा को कांग्रेस की चुनौती के रूप में तैयार किया था। वे खुद जगह जगह दौरे करतीं और भाजपा के संगठन की नींव मजबूत करती थीं। आज उसी भाजपा के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के खिलाफ सिंधिया घराने को विद्रोह का शंखनाद करना पड़ रहा है। मजेदार बात तो ये है कि शिवराज सिंह को विरोध के लिए तैयार करने में षड़यंत्रकारी दिग्विजय सिंह ने बड़ी भूमिका निभाई है। दिग्विजय सिंह का परिवार कभी सिंधिया सल्तनत का कारिंदा रहा है। शिवराज सिंह चौहान के सलाहकारों में अपने भेदियों की घुसपैठ कराकर दिग्विजय सिंह ने कथित तौर पर अयोध्यानाथ पाठक के बेटे विकास पाठक को पुलिस मुख्यालय में एआईजी एकाऊंट के पद पर पदस्थ करवा दिया। पुलिस की पुरानी फाईलें खोलकर सिंधिया सल्तनत के प्रमुख सूत्रधारों पर लगाम कसी जाने लगी। जाहिर है एक बार फिर सिंधिया राजघराने को एकजुट होकर मैदान में लामबंद होना पड़ा है। इस फैसले में सिंधिया राजघराने के सभी दिग्गज शामिल हैं। फिर चाहे वे कांग्रेस में हों या भाजपा में।

    किसान आंदोलन के नाम पर कर्ज माफी की आवाज उठाने वाले उद्योगपति हों या फिर जीएसटी के कारण काली कमाई बंद होने से भयाक्रांत व्यापारी, सभी सिंधिया के इस संग्राम में साथ आ जुटे हैं। वे ज्योतिरादित्य सिंधिया को भले अपना नेता न मानें लेकिन वे शिवराज सिंह चौहान को उखाड़कर अपना शक्तिप्रदर्शन जरूर करना चाहते हैं। शिवराज सिंह चौहान की घोषणाओं के बावजूद रोजगार और लाभ से वंचित आम जनता भी इस अभियान में दर्शक के रूप में जुटने लगी है। कांग्रेसियों को इससे अपना भविष्य उज्जवल होता नजर आ रहा है। दिग्विजय सिंह की नाकाम सरकार से नाराज प्रदेश की जनता आज भी कांग्रेस को नेतृत्व देने तैयार नहीं है पर ज्योतिरादित्य सिंधिया की भूमिका से भाजपा को बड़ी क्षति पहुंचने की संभावना जरूर बनती नजर आ रही है।

  • कानून से बने राममंदिर और रुके गौहत्याः  जन न्याय दल

    कानून से बने राममंदिर और रुके गौहत्याः जन न्याय दल

    सागर/ 13 जून/बहुसंख्यक हिन्दुओं की आस्था के प्रतीक भगवान राम की विवादित जन्म स्थली अयोध्या में भव्य राम मंदिर बनाने और देष में गौ-हत्या रोकने के लिये केन्द्र की भाजपानीत एन.डी.ए. सरकार संसद से कानून बनाने का मार्ग प्रषस्त करे।

    उक्ताषय के प्रस्ताव आज राजनैतिक पार्टी जन-न्याय दल राष्ट्रीय कार्य समिति ने सर्वसम्मति से पारित किये। श्री देवरहा- काम्पलेक्स स्थित पार्टी के मुख्यालय पर संपन्न हुई इस बैठक की अध्यक्षता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष एडवोकेट बृजबिहारी चैरसिया ने की। पार्टी के प्रवक्ता आलोक सिंघई ने बताया कि बैठक में पार्टी के द्वारा कई महत्वपूर्ण नीतिगत निर्णय लिये गये हैं।
    निर्णयों की जानकारी देते हुये उन्होंने बताया कि राम मंदिर का निर्माण और गौ-हत्या को रोकना हिन्दुओं की आस्था और श्रद्धा का प्रष्न है। राम मंदिर निर्माण विवाद का हल अब बातचीत से और न्यायालय से निकलना बहुत मुष्किल लग रहा है। अतः इसके लिये काननू बनाया जाना आवष्यक है। पार्टी का मानना है कि जरूरत पढ़ने पर सरकार को लोकसभा व राज्यसभा का संयुक्त अधिवेषन बुलाकर कानून बनाना चाहिये।

    उन्होंने बताया कि उनकी पार्टी में व्यापक विमर्ष के बाद यह सहमति बनी है कि जहाॅ राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की वैचारिक सोच-देष की एकता और अखण्डता के लिये आवष्यक है वहीं राष्ट्रवादी हिन्दुत्व की विचारधारा ही सषक्त राष्ट्र का निर्माण कर सकती है और इसके लिये अब हिन्दु चेतना राष्ट्रीय आवष्यकता है।

    उन्होंनें कहा कि उनकी पार्टी जन-न्याय दल का मानना है कि आर.एस.एस., विहिप, राम भक्तो, गौ-भक्तों संत-समाज सहित हिन्दुवादी संगठनों की प्रेरणा और सहयोग से बहुसंख्यक हिन्दुओं की वोटों के सहारे प्रचण्ड बहुमत पाकर केन्द्र में सरकार बनाने वाली भाजपा अब अपनी घोषित राष्ट्रवादी-हिन्दुत्व की नीतियों के विपरही जाकर कांग्रेस की ही नीतियों को स्वीकार करने में ज्यादा रूचि दिखा रही है। यह अल्पसंख्यक- तुष्टीकरण में डूबी कांग्रेस को देष की सत्ता से उखाड़ फेकने में सहयोग करनेवाली जनता के साथ धोखा है। उनकी पार्टी ने भाजपा से सवाल किया है कि वह हिन्दुओं के सामने यह स्पष्ट करे कि उसकी राष्ट्रवादी सोच देष के लिये आवष्यक है या कांग्रेस की नीतियां ।

    उन्होंने बताया कि उनकी पार्टी जम्मू-कष्मीर समस्या के स्थायी निदान के लिये चाहती है कि केन्द्र की भाजपा सरकार वहां की साझा-सरकार को तत्काल खत्म करके जम्मू-कष्मीर के चरित्र को बदलने का फैसला करे। जम्मू-कष्मीर की भौगोलिक सीमाओं को तीन हिस्सों में बांटते हुये वहाॅ धारा-370 खत्म करे और शेष भारत से जम्मू कष्मीर मंे लोगों को ले जाकर वहां बसाये अथवा बसने दे। भाजपा अपनी मूल-सोच ‘‘एक देष में दो संविधान नहीं चलेंगे ?’’

    उन्होंने कहा कि देष में आंदोलित किसानों की समस्याओं के लिये उनकी पार्टी आर्थिक- असमानता की नीतियों की पोषक कांग्रेस और भाजपा को समान रूप से जिम्मेदार मानती है। सरकारी आर्थिक- सर्वे 2016 से इस बात की पुष्टि होती है कि जहाॅ 45 वर्षो में सरकारी नौकरों की आमदनी 300 गुना तक बढी है वहीं इसी अवधि में किसानों की आमदनी महज 19 गुना ही बढ़ी है। साथ ही नोट बंदी के दुष्प्रभाव भी अब किसानों को रूला रहे हैं।

    उन्होंने बताया कि उनकी पाटी राममंदिर बनाने और गौ-हत्या रोकने के लिये केन्द्र सरकार संसद में कानून बनाये जाने वाले प्रस्ताव के पक्ष- समर्थन में जनता के बीच जोयगी और जनमत तैयार करने के लिए विहिप, संत समाज, राम-भक्तो, गौ-भक्ता, व हिन्दु संगठनों से सहयोग मांगेगी।

    उन्होंने बताया कि उनकी पार्टी ने निर्णय लिया है कि इन दोनों प्रस्तावों के साथ ही पार्टी के शराबबंदी आंदोलन को समाहित करके मध्यप्रदेष में ‘‘संकल्प-अभियान’’ प्रारंभ किया जा रहा है जिसके माध्यम से जनता को संकल्पित किया जावेगा एवं संकल्प पत्र भरनेक वालांे को उनकी पार्टी सम्मान पत्र देकर सम्मानित करेगी।

    उन्होंने बताया कि उनकी पार्टी वर्ष 2018 में होने वाले मध्यप्रदेष विधानसभा के चुनावों में सभी विधानसभा क्षेत्रों में अपने प्रत्याषी खड़े करेगी। चुनाव संचालन के लिये प्रदेष स्तर पर और विधानसभा स्तर पर दो स्तरीय क्रमषः प्रबंधन समिति व संचालन समिति का गठन किया जावेगा। बैठक में सदस्य रमेष कुमार बौद्ध, गोपाल सिंह कुषवाहा, सीताराम चैरसिया, एडवोकेट, जे.पी. सोनी, जगदीष विष्वकर्मा, षिरीष यादव, संदीप कोरी, अनूप चैकसे, श्रीमति अनीता सेन, शोभा सोनी, हीराबाई बौद्व सहित राष्ट्रीय कार्य समिति सदस्य उपस्थित थे।

  • किसान आंदोलन ने राजनीतिक सर्जरी की राह सुझाई

    किसान आंदोलन ने राजनीतिक सर्जरी की राह सुझाई

    -आलोक सिंघई-
    देश को प्रखर राष्ट्रवाद की बुलंदियों पर ले जाने का संकल्प करने वाली भारतीय जनता पार्टी की शिवराज सिंह चौहान सरकार अपने प्राण बचाने के लिए गांधीवाद की बैसाखियां तलाश रही है। प्रदेश में भड़के किसान आंदोलन को शांत करने के लिए मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान राजधानी के भेल दशहरा मैदान पर अनशन कर रहे हैं। हर जिले से लाए गए किसानों के प्रतिनिधिमंडल उनसे मुलाकात कर रहे हैं और कृषि विस्तार की दिशा में किए गए भारतीय जनता पार्टी सरकार के कार्यों से अपनी सहमति जता रहे हैं। जो किसान कल तक कथित तौर पर अपनी मांगों को लेकर आगजनी कर रहे थे वे इस टैंट में आकर अपनी भूल सुधार करने का संकल्प दोहरा रहे हैं। हालांकि आंदोलन का व्यापक आव्हान करने वाले राष्ट्रीय किसान मजदूर संघ ने अनशन पर बैठे शिवराज को जेल भरो आंदोलन से करारा जवाब देने का फैसला लिया है पर फिलहाल प्रदेश में हिंसा का दौर जरूर थमता नजर आने लगा है।

    मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान से अनशन स्थल पर चार बजे तक लगभग 15 बड़े और 234 छोटे किसान संगठनों ने मुलाकात की। हर संगठन ने एक मिनिट में अपनी समस्या मुख्यमंत्री को बता दी और उनसे समाधान का आश्वासन भी प्राप्त कर लिया। इस दौरान मुख्यमंत्री के मंत्रीमंडलीय सहयोगी भी वहीं मौजूद थे जिन्होंने विधायकों के साथ आए किसान प्रतिनिधियों का स्वागत किया। किसी भी हिंसक आंदोलन का इतना तेज समाधान आजादी की लड़ाई के दौरान खुद गांधीजी भी नहीं कर सके थे। मुख्यमंत्री का ये प्रयास निश्चित तौर पर भाजपा के प्रखर राष्ट्रवाद के लिए एक गहरा सबक साबित होने जा रहा है।

    मुख्यमंत्री श्री चौहान अपने राजनीतिक आका लालकृष्ण आडवाणी से करीबी के लिए जाने जाते हैं। स्व. प्रमोद महाजन ने श्री आडवाणी की इच्छा को देखते हुए ही श्री चौहान को मध्यप्रदेश की सत्ता पर आरूढ़ करवाया था। जाहिर है कि ये सरकार श्री आडवाणी के प्रखर राष्ट्रवाद को साकार करने के लिए ही भेजी गई थी। प्रदेश की जनता ने कांग्रेस के निष्कासन के जनादेश के बाद सत्ता भाजपा को सौंपी थी , भाजपा को पूरा अवसर भी मिला कि वह अपने राष्ट्रीय नेता की विचारधारा को सफल बनाए पर लगभग बारह सालों के शासन के बाद भी राष्ट्रवाद की ये परिभाषा गांधीवाद के वेंटीलेटर पर जीवन संघर्ष कर रही है। प्रदेश की जनता जानना चाहती है कि किसान आंदोलन की असली वजह क्या थी और अनशन ने उसे शांत करने में कैसे बडी भूमिका निभाई।
    विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष और कांग्रेस के विधायक अजय सिंह ने आज पत्रकार वार्ता बुलाकर सरकार को भंग करने और राष्ट्रपति शासन लगाने की मांग की है। उनका कहना है कि सरकार को किसानों की समस्याओं का समाधान करना चाहिए। इसमें यदि कांग्रेस की कोई भूमिका हो तो वे उसे भी निभाने तैयार हैं। उनका कहना था कि इस मामले पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी खामोश हैं। जाहिर है कि ये आंदोलन भारतीय जनता पार्टी के अंदरूनी सत्ता संघर्ष की उपज है।

    बात बहुत हद तक सही भी है। किसानों के इस आंदोलन को भाजपा के भीतर से भी बल मिलता रहा है। राष्ट्रीय किसान मजदूर संघ के अध्यक्ष पं. शिवकुमार शर्मा उर्फ कक्काजी खुद भाजपा के सहयोगी भारतीय किसान संघ के सदस्य रहे हैं। खासतौर से पंचायत एवं ग्रामीण मंत्री पं. गोपाल भार्गव से उनकी करीबी रही है। इस आंदोलन में सबसे बड़ी भूमिका तो ग्रामीण पृष्ठभूमि में राजनीति करने वाले नेताओं ने निभाई है।भाजपा के पूर्व संगठन महामंत्री और वर्तमान में राज्यपाल कप्तानसिंह सोलंकी ने कांग्रेस के अपदस्थ किए गए पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के साथ एक गुप्त अनुबंध किया था। जिसके चलते दिग्विजय सिंह के तमाम समर्थकों को भाजपा में जगह दी गई थी। ये पूरी फौज गांवों से ही आती थी और पंचायती राज व्यवस्था के दौरान दिग्विजय सिंह के लिए कार्य करती थी। श्री सोलंकी ने इसे भाजपा का जनाधार बढ़ाने वाला कदम बताया और उनका पंचायती राज नई सरकार में भी कायम रहा। इस समझौते के चलते ही पंचायतों को सत्कार फंड दिया जाने लगा जो बाद में पंचायतों के नेताओं का जेबखर्च बन गया। तमाम सरकारी योजनाओं को लागू करने में भी इन्हीं जन प्रतिनिधियों को प्राथमिकता दी गई। गांवों की राजनीति में सिद्धहस्त इन नेताओं ने भाजपा के कार्यकर्ताओं को भी अपने साथ मिला लिया और सरकारी योजनाओं को डकारने की मुहिम शुरु हो गई।

    सत्ता के तीसरे कार्यकाल मेंजब हाईकमान ने अनापशनाप फंड देने की परंपरा बंद कर दी तब मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को ये गड़बड़ झाला समझ में आ चुका था। उन्होंने खुर्राट आईएएस अफसर आर.एस.जुलानिया के माध्यम से पंचायतों को दिए जाने वाले तमाम फंड रोक दिए। सबसे पहले तो सत्कार भत्ता रोका गया जिससे पंचायतों के बड़े दिग्गजों का जेबखर्च बंद हो गया। पंचायत सचिवों के माध्यम से हितग्राहियों का इतना सख्त परीक्षण कराया गया कि किसी भी योजना के लिए पात्र होना टेढ़ी खीर हो गया। भारी भ्रष्टाचार का सबब बनी प्रधानमंत्री रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) को बंद कर दिया गया। इस बजट से दूसरे जमीनी काम काज कराए जाने लगे। हालांकि पंचायत मंत्री गोपाल भार्गव भी इससे बहुत खफा हुए क्योंकि यही योजना उनकी अवैध कमाई का बड़ा आधार बन चुकी थी। कुछ समय पहले पंचायत सचिवों और उनके सहयोगियों ने राजधानी भोपाल में आकर प्रदर्शन भी किया था लेकिन सरकार ने उसे सख्ती से दबा दिया। श्री जुलानिया ने तो पंचायत मंत्री के सामने ही मांगों की फाईल फेंककर अपनी नाराजगी भी जताई थी। इसके बाद श्री भार्गव और उनके समर्थकों ने सोचा कि पुरानी कमाई की योजनाओं को जारी रखने के लिए मुख्यमंत्री को झुकाया जाना जरूरी है। यही वजह थी कि किसान नेता कक्काजी के हाथ मजबूत कर दिए गए। तय किया गया कि आंदोलन तय समय पर पूरे प्रदेश में होगा। जैसे ही इस गुप्त समझौते की सूचना अफीम माफिया से जुड़े कम्युनिष्ट नेता अनिल यादव को मिली उन्होंने सरकार के खिलाफ विद्रोह का ऐलान कर दिया। उनके साथ मैदान में उतरे नशा तस्करों ने मोर्चा संभाला और नतीजा गोलीकांड के रूप में सामने आया। मंदसौर के तत्कालीन कलेक्टर स्वतंत्र कुमार ने गंभीरता को समझते हुए एसएएफ की जगह सीआरपीएफ को भेजकर दंगे पर त्वरित काबू पाने का प्रयास किया लेकिन जब हिंसा पर उतारू कथित किसानों ने उन पर ही हिंसक हमला कर दिया तो मैदानी अधिकारियों को गोलीकांड का सहारा लेना पड़ा। इसका कलंक झेल रही शिवराज सिंह चौहान सरकार को इंतजार है कि मामले की जांच रिपोर्ट सामने आ जाए ताकि वो अपना दाग धो सके। अनशन इसी श्रंखला से उपजा कदम है।

    कथित किसान आंदोलन की दूसरी सबसे बड़ी वजह बिजली सुधार थी। गांव का किसान सिंचाई के सीजन में तीन महीने के लिए बिजली का अस्थायी कनेक्शन लेता था जिसके लिए उसे लगभग बारह हजार रुपए का बिजली बिल चुकाना पड़ता था। अब नए हालात में मुख्यमंत्री स्थायी कृषि पंप योजना प्रारंभ कर दी गई। जिसमें प्रति हार्सपावर 1400 रुपए का बिल चुकाना पड़ता है। यदि किसान का पंप पांच हार्सपावर का है तो उसके लिए उसे चौदह हजार रुपए का बिल देना पड़ेगा। ये बिल उन्हें वर्ष के दौरान दो किस्तों में चुकाना था। किसानों को ये बढ़ी रकम देना मंजूर नहीं था और वे इस आंदोलन में कूद पड़े। फीडर विभक्तीकरण के बाद रहवासी इलाकों में बिजली की चोरी नहीं रोकी जा सकी है। इसलिए बिजली वितरण कंपनियों ने वहां स्थायी और अस्थायी कनेक्शन देना लगभग बंद कर दिया। जिनके घरों पर कनेक्शन लगे हैं उनके लिए हजारों रुपयों के बिजली बिल भेजे गए । उन ग्रामीणों का तर्क था कि जब हम बिजली का बिल ईमानदारी से देने के लिए तैयार हैं तो हमसे चोरी की गई बिजली का दाम क्यों वसूला जा रहा है। मांग वाजिब थी जिसने किसानों को भड़काने में बड़ी भूमिका निभाई। ये बात बिजली वितरण कंपनियों की बैठकों में पहले ही रखी जा चुकी थी। सरकार के दोनों अपर मुख्य सचिवों इकबाल सिंह बैंस और राधेश्याम जुलानिया ने जब चोरी गई बिजली के दाम सरकार की ओर से चुकाए जाने का प्रस्ताव खारिज कर दिया तो बिजली कंपनियों ने किसानों को खुली छूट दी कि वे जाकर सरकार से बात करें। बिजली चोर किसानों और ग्रामीणों को भड़काने में तीनों बिजली वितरण कंपनियों के प्रबंध संचालकों ने बड़ी भूमिका निभाई। पश्चिम क्षेत्र विद्युत वितरण कंपनी के प्रबंध संचालक आकाश त्रिपाठी ने इंदौर और इसके आसपास के किसानों को आंदोलन के लिए उकसाया जिसका नतीजा पूरे मालवांचल में देखने मिला। पूर्व क्षेत्र विद्युत वितरण कंपनी के प्रबंध संचालक और मध्य क्षेत्र विद्युत वितरण कंपनी ने भी किसानों को उकसाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। हालांकि मध्य क्षेत्र विद्युत वितरण कंपनी के नवागत प्रबंध संचालक एम सेलवेन्द्रम तो अभी अपनी कंपनी की अंदरूनी कहानी समझने का प्रयास ही कर रहे हैं। पर इतना जरूर कहा जा सकता है कि बिजली सुधारों की नई व्यवस्था ने सब्सिडी के आदी हो चुके किसानों को भड़कने के लिए पर्याप्त चिंगारी सुलगाई।

    इस पूरे एपीसोड में मध्यप्रदेश पुलिस के खुफिया तंत्र की पोल भी खुल गई। पुलिस की ये विंग आज भी जन चर्चा के पुराने तरीकों को ही अपने अनुसंधान का केन्द्र बनाती है। उसके अफसर तेज बढ़ते मध्यप्रदेश और यहां की अर्थव्यवस्था के अनुरूप वैज्ञानिक अनुसंधान करने में फिसड्डी साबित हो रहे हैं। यही वजह है कि दंगों की चिंगारी पिछले तीन महीनों से सुलगते रहने की भनक भी पुलिस को नहीं मिल सकी। पुलिस की एसएएफ इकाईयां आपातकाल के लिए तैयार नहीं थीं इसलिए मंहगी कीमत चुकाकर रतलाम कलेक्टर को सीआरपीएफ की सेवाएं लेनी पड़ीं।

    यही हाल एक लाख पचासी हजार करोड़ के बजट वाले प्रदेश के सूचना संवाद तंत्र का रहा है। साढ़े सात करोड़ लोगों से संवाद करने के लिए जनसंपर्क विभाग के माध्यम से पांच हजार से अधिक पत्रकारों को अधिमान्यता दी गई है। दिग्विजय सिंह की सरकार पत्रकारों पर चालीस करोड़ रुपए खर्च करती थी ये बजट बढ़ाकर लगभग चार सौ करोड़ रुपए कर दिया गया है। फिजूलखर्ची और भ्रष्टाचार का आलम ये है कि ये राशी चैनलों, फिल्म निर्माण और ढेरों समाचार पत्रों के नाम पर खर्च की जाती है। हकीकत में इस राशि से सरकार के कामकाज लायक फीडबैक तंत्र आज तक तैयार नहीं हो सका है। जनसंपर्क विभाग संविदा नियुक्ति वाले एक रिटायर्ड अफसर के भरोसे है जिसे कुछ भ्रष्ट अफसरों के काकस के माध्यम से चलाया जा रहा है। मुख्यमंत्री के सचिव एस के मिश्रा के सीधे दखल और आयुक्त अनुपम राजन की उदासीनता ने फीडबैक की रही सही प्रणाली भी ध्वस्त कर दी है। खुद मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की लचर और अनिर्णय से भरी शैली ने जनता से संवाद का पूरा तंत्र ही फेल कर दिया है। जनता को ये तस्वीर दिख रही है पर सरकार इसे समझने तैयार नहीं है। यही वजह है कि आंदोलित किसानों ने फील्ड पर मौजूद पत्रकारों को खदेड़ने और पीटने में कोई गुरेज नहीं किया।

    गांवों में किसान को उसकी उपज का उचित मूल्य आजादी के बाद से अब तक कभी नहीं मिल पाया। पहले कांग्रेस की सरकारें मूल्य देने के बजाए किसानों को चोरी के लिए उकसाती रहीं हैं। बिजली पानी की चोरी के सहारे किसान खेती करता था पर उत्पादन बढ़ाने की कोई पहल कभी नहीं की गई। आज शिवराज सिंह सरकार आधे अधूरे सुधार कार्यों के कारण निशाने पर है। वह पुरातन परंपराओं को अब तक बंद नहीं कर पाई है। किसानों की आय बढ़ाने लायक तंत्र भी अब तक विकसित नहीं कर पाई है जिससे कि किसान को निश्चिंतता हो सके। जिस सुशासन के वादे पर जनता ने भाजपा को सत्ता सौंपी थी वह किसानों को आज नजर नहीं आ रहा है। देश में चल रहे आर्थिक सुधारों की आंधी के साथ कदमताल कर पाने में असफल प्रदेश सरकार की ऊहापोह का असर किसानों पर भी पड़ा है। इससे उपजी चिंता ने किसानों के विद्रोह को दावानल का रूप दे दिया। जाहिर है कि इन हालात में बड़ी राजनीतिक और प्रशासनिक सर्जरी समय की मांग बन गई है जिसका फैसला भाजपा हाईकमान को लेना है।

  • ठेका खेती के आगे घुटना टेकती शिवराज सरकार

    ठेका खेती के आगे घुटना टेकती शिवराज सरकार


    -आलोक सिंघई-
    मध्यप्रदेश में पुलिस की गोली से किसानों के नरसंहार का कलंक भाजपा सरकार के माथे लगा है। इसे धोने के लिए मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान उपवास पर बैठने जा रहे हैं। उनके सलाहकारों ने समझाया है कि किसी भी जनांदोलन पर नियंत्रण पाने के लिए आपको गांधीवादी तरीका ही अपनाना होगा। गांधी जी के उपवास में बड़ी ताकत रही है। आजादी के संग्राम को नियंत्रित करने के लिए गांधीजी ने वही तरीका अपनाया था इसलिए भड़के हुए किसानों का दिल जीतने के लिए आपको भी उपवास पर बैठ जाना चाहिए। प्रदेश में मौजूदा किसान आंदोलन शिवराज जी के धूर्त सलाहकारों की चालबाजियों के कारण ही भड़का है। इससे निपटने के लिए वे एक और प्रहसन दुहराने जा रहे हैं। गांधीजी जब ये प्रहसन खेलते थे तब देश गुलाम था और आजादी देश के लोगों का सपना था। आज सत्तर सालों तक देश की आजादी का उत्सव मनाने के बाद जनमन का ये विश्वास जम चुका है कि वे आजाद मुल्क के वासी हैं। जाहिर है अब उनकी प्राथमिकताएं बदल गईं हैं। आजादी का अहसास देश के लोगों में भरने के लिए बाद की सरकारों ने बेलगाम छूटें दीं। जिसका लाभ चतुर लोगों ने तो उठाया पर खेतिहर मजदूर और किसान इससे वंचित रहे।

    शिवराज सिंह चौहान के शासनकाल में किसानों के हित की ढेरों योजनाएं चलाई गईं। खेती को मुनाफे के धंधे में बदलने का उनका अभियान कई सोपान पार कर चुका है। किसानों की अपेक्षाएं बहुत बढ़ चुकी हैं ।इसलिए किसानों को भड़काना भी सरल हो गया है। मौजूदा आंदोलन इन्हीं किसानों की आड़ लेकर भड़काया जा रहा है। इसके पीछे कौन है यह यक्ष प्रश्न सभी के दिमाग को मथ रहा है।शिवराज जी कह रहे हैं कि इसके पीछे कांग्रेस के गुंडे हैं। राष्ट्रीय किसान मजदूर संघ के अध्यक्ष पं. शिवकुमार शर्मा कह रहे हैं कि उनके आंदोलन को बदनाम करने के लिए साजिशन हिंसा कराई जा रही है। लोग कह रहे हैं कि जींस टीशर्ट पहिनकर गुंडों ने सार्वजनिक संपत्तियों को नुक्सान पहुंचाया है। उनके ही कारण आम नागरिकों को परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। मगर ये सभी बातें केवल अर्धसत्य हैं। इसका आधा सच खेती की ठेका पद्धति में छुपा हुआ है।

    कुछ सालों पहले भारत में ठेका पद्धति पर खेती करने का असफल प्रयोग किया गया था। बाद में कारगिल, ई चौपाल जैसी जिन कंपनियों ने बाजार में पूंजीकरण किया उन्होंने अपना कारोबार सीमित कर लिया। इसकी वजह थी कि उन्हें सब्सिडी पर आधारित कृषि व्यवसाय का सामना करना पड़ रहा था। अब स्थितियां बदल गईं हैं। ठेका खेती में पैसा लगाने के लिए भी कई कंपनियां सार्वजनिक धन का ही उपयोग करने की तैयारी कर रहीं हैं। रिलायंस जैसी कंपनी ने प्रदेश के कई सहकारी बैंकों को गोद लेने की लाबिंग शुरु कर दी है। कुछ सहकारी बैंकों के बोर्ड में तो कथित तौर पर उनके समर्थित किसानों का बहुमत हो चुका है। अब वे सरकार पर दबाव बना रहीं हैं कि इन बैंकों के पूंजीकरण के लिए उन्हें विश्व बैंक, एडीबी जैसे अंतर्राष्ट्रीय सूदखोरों से पैसा लेने की छूट दें। इसके लिए गारंटी सरकार को देनी है। यदि सरकार गारंटी देती है तो वे कंपनियां किसानों के नाम पर ये रकम आसानी से निकाल सकेंगे और अधिक मुनाफे वाले कारोबारों में लगा सकेंगे। इसके साथ साथ डूबने वाली रकम चुकाने की जवाबदारी सरकार की होगी।

    इन कंपनियों की अगुआई रिलायंस जैसी बड़ी कंपनी कर रही है। उसके मोबाईल जियो ने जिस तरह बाजार पर कब्जा जमाया है उससे अन्य कंपनियों के कारोबार बुरी तरह प्रभावित हुए हैं। अपने कारोबार के विस्तार के लिए रिलायंस शुरु से सरकार पर दबाव बनाता रहा है। जियो के टावर पुलिस थानों की जमीनों पर फोकट में लगाने के षड़यंत्र से इसी शुरुआत हुई थी। जब इस मामले को अदालतों में घसीटा जाने लगा तो कंपनी ने नाम मात्र का किराया देकर अपना कारोबार बढ़ा लिया। अब इसी तरह का हस्तक्षेप वह कृषि में करने जा रहा है।

    भूमि सुधारों के नाम पर किए जा रहे डिजिटलाईजेशन ने भी किसानों की जमीनों पर कब्जा जमाना शुरु कर दिया है। खेती को ठेके पर लेने वाली कंपनियां किसानों की जमीनें हड़पने की तैयारी कर रहीं हैं।इन जमीनों पर खेती करने से उन्हें किसानों के मंहगा किराया नहीं देना पड़ेगा। खेती को उद्योग का दर्जा दिए जाने की तैयारी ने उनका उत्साह बढ़ा दिया है। इसलिए यही कंपनियां सरकार पर दबाव बना रहीं हैं कि किसान की फसलों का मूल्य बढ़ाया जाए। अब तक सब्सिडी पर चलने वाले कृषि व्यवसाय के कारण खाद्यान्नों का मूल्य नियंत्रण में रहा है। बाजार की ताकतें अब चाहती हैं कि उन्हें खेती पर तो सब्सिडी मिले पर उनके उत्पाद को नियंत्रण के दबाव से मुक्त कर दिया जाए।इससे वे मनमानी कीमतों को अपना लागत मूल्य ज्यादा बताकर बढ़ा सकेंगी।

    इस अर्थ शास्त्र को समझे बगैर मौजूदा किसान आंदोलन की दशा और दिशा नहीं समझी जा सकती है। बेशक देश और प्रदेश का किसान नाराज है। न केवल किसान बल्कि व्यापारी, कर्मचारी और सभी तबकों के लोग नाराज हैं। नोटबंदी ने उनकी संपत्तियों को उजागर कर दिया है। उन्हें अब हर सेवा का अधिक मूल्य चुकाना पड़ रहा है। ये एक सामान्य कदम साबित होता यदि आम लोगों और किसानों की खरीद क्षमता बढ़ाने के प्रयास पहले किये जाते। लोगों की जेबें यदि भरती रहतीं तो वे कतई नाराज न होते पर दुहरी व्यवस्था ने उन पर खर्च का बोझ बढ़ा दिया है। आज किसानों का गेहूं तो समर्थन मूल्य पर खरीदा जा रहा है पर बाजार में उसी गेहूं से तैयार आटा बहुत मंहगे दामों पर बिक रहा है।बिस्कुट जैसे अन्य उत्पादों के कई ब्रांड तो दस गुना ज्यादा दामों पर बिक रहे हैं। इस विपणन शास्त्र का मुनाफा किसानों को नहीं मिल पा रहा है इसलिए उसका आक्रोश सड़कों पर आ कर फट रहा है। उसे हवा देने वाले कंपनियों के प्रमोटर इस नाराजगी को हिंसक बनाने से भी नहीं चूक रहे हैं।

    अब इन हालात में शिवराज जी कल से अनशन पर बैठकर गांधी वादी प्रयोगों को दुहराने जा रही हैं। जब अंग्रेजों ने जान लिया था कि हिंदुस्तान को अधिक समय तक प्रत्यक्ष गुलामी में नहीं रखा जा सकता तो उन्होंने गांधी जी के नेतृत्व में कांग्रेस की मांगों के सामने समर्पण शुरु कर दिया था। गांधी जी सत्याग्रह करते और थोड़ी हीला हवाली के बाद अंग्रेज अपने हथियार डाल देते। कमोबेश यही इतिहास कल से एक बार फिर दुहराया जाने वाला है। किसान आंदोलन का समय 10 जून निर्धारित किया गया था। इसके बाद जेल भरो आंदोलन चलाया जाना है। अब इसके समानांतर मुख्यमंत्री जी धरने पर बैठने जा रहे हैं।किसानों का आव्हान किया जा रहा है कि वे उनसे मिलकर अपनी बात उन्हें बता सकते हैं। जाहिर है किसानों की इन्हीं सलाहों के नाम पर सरकार ठेका खेती करने वाली कंपनियों की कई मांगों को मंजूर करने का मन बना रही है। कहा जा सकता है कि किसान आंदोलन की आड़ में की गई गुंडागर्दी ने सरकार के घुटने लगभग टिका दिए हैं। अब तक सरकार ने जो मांगे स्वीकार की हैं उनसे किसानों की जीत तो पहले ही हो चुकी है। अब सरकार उनके नाम पर जो फैसले लेगी उनसे ठेका खेती के मैदान में उतरीं कंपनियों के हित भी संरक्षित किए जा सकेंगे। इसके साथ मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की कुर्सी भी एक बार फिर सुरक्षित हो जाएगी।

  • शिवराज सिंह पाखंडी :शिवकुमार शर्मा

    शिवराज सिंह पाखंडी :शिवकुमार शर्मा

    -रमण रावल

    मालवा में 1 जून से किसानों के सडक़ पर आकर सब्जी, अनाज, दूध की गांव से3 निकासी रोक देने की पूरजोर कोशिश भले ही अचानक लिया गया फैसला लगे, लेकिन हकीकत यह है कि इसकी तैयारी अरसे से की जा रही थी। यह काम राष्ट्रीय स्वयं संघ की शैली से गुपचुप यदि हुआ तो इसके पीछे संघ के पुराने तपे हुए नेता शिवकुमार शर्मा की रणनीति है। यह और बात है कि वे अब संघ की छवि से मुक्त अपनी पहचान बन चुके हैं और म.प्र. की भाजपा सरकार को लोहे के चने चबवा रहे हैं। किसान आंदोलन की बागडोर थामे राष्ट्रीय किसान मजदूर संघ के अध्यक्ष शिवकुमार शर्मा याने कक्काजी दो टूक कहते हैं कि प्रदेश के हालात यदि बिगड़े हैं तो इसके पीछे एकमेव शिवराजसिंह चौहान की अदूरदृष्टि है। साथ ही वे यह भी कहने से परहेज नहीं करते कि शिवराजसिंह चौहान पूरी तरह से धोखेबाज , फर्जी राष्ट्रवादी , नौटंकीबाज , भ्रष्ट व विफल मुख्यमंत्री हैं।

    कक्काजी मंगवलार को शहर में थे और 6 जून को मंदसौर में आंदोलन करते हुए हुई 8 किसानों की हत्या(पुलिस गोलीबारी में मृत किसानों की हत्या करना ही वे निरुपित करते हैं) के संदर्भ में आगे की रणनीति को अंजाम देने इंदौर-उज्जैन के दौरे पर आये थए। जब उनसे पूछा गया कि किसान अचानक 1 जून से इतने उग्र प्रदर्शन पर कैसे उतारू हो गये तो वे बोले कि यह अचानक नहीं, सुनियोजित है। पहले की खामोशी तूफान का संकेत थी, जिसे प्रदेश सरकार समझ नहीं पायी तो यह उसकी विफलता है। देश के किसान को आजादी के बाद से ही लूटा जा रहा है, पहली बार वह चीख पड़ा तो सबको सुनाई दे रहा है।

    म.प्र. के किसानों के संदर्भ में वे साफ तौर पर भाजपा सरकार को कठघरे में खड़ा करते हैं। वे कहते हैं कि प्रदेश में जब 2003 में भाजपा की सरकार आयी तब कितान किसान क्रेडिट कार्ड योजना के तहत करीब 2 हजार करोड़ रुपये के कर्ज में था , जो अब 45 हजार करोड़ के कर्ज में डूब चुका है। यह ब्याज पर ब्याज वसूलने और हर साल फसल खराब होने के चलते लिये जा रहे नये कर्ज की वजह से हुआ है। वे बताते हैं कि 1880 में अंग्रेजों ने क्रूर शासक होते हुए भी बंगाल में दाम दुपट कानून बनाया था जिसके तहत कोई भी व्यक्ति मूलधन से दुगना ब्याज नहीं वसूल सकता है। जबकि अब सरकारें और राष्ट्रीयकृत बैंकें चक्रवृद्धि ब्याज की तरह वसूली कर रही है, जिससे किसान पीस रहा है।

    कक्काजी कहतेे हैं कि किसान की खेत जोतने की लागत बढ़ती जा रही है, महंगाई तेज गति से बढ़ रही है, लेकिन उसकी उपज का मूल्य लगातार गिरता जा रहा है। उदाहरण के जरिये वे बताते हैं कि 1970 में 2 क्विंटल गेहूं मेें एक तौला सोना आ जाता था, जबकि अब 20 क्विंटल गेहूं में एक तौला सोना आता है। जबकि व्यापारिक हिसाब से 20 क्विंटल गेहूं में 10 तौला सोना आना चाहिये। इस असमानता के लिये पूर्ववर्ती व मौजूदा सरकारें दोषी हैं। जो भाजपा सरकार कृषि कर्मण अवार्ड लेती है, जिसके नेता रात-दिन खेती को मुनाफे का धंधा बना देने की दुहाई देते हैं, उनके राज में किसान को लागत मूल्य से कम पर उपज बेचने की विवशता क्यों है?

    शिवकुमार शर्मा बताते हैं कि पंप में लगने वाला डीजल 15 पैसे लीटर से 60 रुपये लीटर हो गया, जो खाद की बोरी 60 रुपये में आती थी, वह 12सौ रुपये में मिल रही है, ट्रेक्टर के दाम 10 साल में दोगुने से अधिक हो गये, बीज, बिजली, मजदूरी , बैल की कीमत तक सबमें बेतहाशा वृद्धि हुई तो उपज के दाम भी आनुपातिक रूप से बढऩे चाहिये, लेकिन किसान के जागरुक नहीं होने, अपढ़, असंगठित होने से वह अपनी आवाज सही तरीके से सही जगह पहुंचा नहीं पाया और हर तरफ से लुटता रहा । जबकि उसकी फसल की बदौलत शहर का व्यापारी , खुदरा दुकानदार, बिचौलिया तक सब निहाल हो गये।

    कक्काजी कहते हैं कि इसमें भी सबसे बुरी स्थिति म.प्र. के किसानों की है। उनका कहना है कि आंध्र, तमिलनाडू , कर्नाटक, तेलंगाना , केरल, पंजाब , हरियाणा में किसानों को मुफ्त बिजली मिलती है, केवल 30 रुपये प्रतिमाह सर्विस चार्ज देना होता है, जबकि म.प्र. में 12 सौ रुपये प्रति हॉर्स पॉवर, प्रतिवर्ष के हिसाब से शु्ल्क वसूला जाता है। फिर किसान की फसल किसी एक वर्ष बिगड़ जाये तो उसकी भरपायी में 4-5 साल लग जाते हैं। इसके लिये अमेरिका की तरह व्यवस्था की जाना चाहिये। वहां चार तरह की प्रोत्साहन योजना है। ब्लू बॉक्स , रेड बॉक्स , यलो बॉक्स व एक्सपोर्ट सब्सिडी। इसके तहत शिक्षा, बीमारी, आकस्मिक संकट के समय सरकार किसान व उसके परिवार का पूरा खर्च वहन करती है। साथ ही निर्यात से विदेशी मुद्रा कमाने पर उपज के दाम के अलावा एक निश्चित रकम बोनस के रूप में भी मिलती है। इसलिये वहां किसान अपनी उपज का मूल्य तय करने में भी सक्षम है। जबकि हमारे यहां जो थोड़ी बहुत सब्सिडी सरकार देती भी है तो उसका अधिकांश हिस्सा भ्रष्ट अधिकारी हड़प लेते हैं।

    एक सवाल के जवाब मेें कक्काजी बताते हैं कि हमारे देश में भी राष्ट्रीय कृषि निर्धारण आयोग है, लेकिन यह अस्तित्वहीन हो चुका है। वे खुद भी कभी इसके सदस्य थे, किंतु जब देखा कि वह किसानों के हितों का पोषण करने में सक्षम नहीं है तो सदस्यता छोड़ दी। वे बताते हैं कि इस आयोग को किसानों का फायदा कराने में कतई दिलचस्पी नहीं है, बल्कि उसके अधिकारी कहते हैं कि वे तो यह देखते हैं कि लोगों को सस्ता अनाज कैसे मिल सके?

    कक्काजी ने आरोप लगाया कि प्रदेश भाजपा सरकार ने अपने लोगों के फायदे के लिये दिग्विजयसिंह के कृषिमंत्रित्व काल में बने मंडी अधिनियम को बदल कर किसान विरोधी कर दिया , जिसका एकमात्र उद्देश्य भाजपा के नेताओं को मंडी बोर्ड में काबिज कराना है, ताकि वे करोड़ो कमा सकें। इसके लिये पहले किसान के सीधे मंडी अध्यक्ष चुनने की व्यवस्था खत्म कर वार्डवार प्रतिनिधि चुनने का तरीका लाद दिया और वे अध्यक्ष चुनते हैं। इन प्रतिनिधियों को अध्यक्ष पद का प्रत्याशी करोड़ों रुपये खर्च कर खरीद लेता है , फिर मंडी अध्यक्ष बनकर करोड़ों कमाता है। तो जाहिर है कि वह किसानों का भला कैसे कर सकता है?

    मौजूदा किसान आंदोलन के संबंध में उनका कहना है कि किसानों की स्पष्ट मांग है कि किसानों को अन्य राज्यों की तरह बिजली मुफ्त दी जाये, खाद, ट्रेक्टर, बीज , कृषि उपकरण, दवा के दाम घटायें जायें , तभी उपज की लागत घटेगी और किसान सस्ते दाम पर उपज बेचकर भी मुनाफा कमा सकेगा। केवल वादे करने से किसानों की समस्या का निदान नहीं निकल सकता। शिवराजसिंह चौहान ने करीब 6500 वादे तो कर दिये हैं, लेकिन पूरे एक भी नहीं हुए । मालवा के बाद महाकौशल के किसान भी आंदोलन की राह पर जाने वाले हैं, लेकिन मौजूदा हालातों के मद्देनजर इस पर पुनर्विचार किया जायेगा। कक्काजी ने शिवराजसिंह चौहान के इस्तीफे व म.प्र. की भाजपा सरकार को बर्खास्त करने की मांग भी राष्ट्रपति से की है। उन्होंने कहा कि जो सरकार मंदसौर के निहत्थे किसानों पर गोली चलाकर 8 निर्दोष लोगों की जान ले सकती है , वह कभी-भी किसानों के हक में फैसले नहीं ले सकती।

    उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि भारतीय किसान यूनियन, राष्ट्रीय किसान मजदूर संघ व आम किसान यूनियन के बीच पूरी तरह से एकता व समन्वय है और इनमें से किसी ने भी किसानों की हड़ताल वापस लेने की अपील या समझौता नहीं किया है। सरकार अपने पिट्ठू संगठनों से अपील जारी करवाकर भ्रम फैला रही है, जिससे किसान अधिक आहत व उग्र महसूस कर रहा है।

  • जमीनें छिनने के भय ने खड़ा किया किसानों का बखेड़ा

    जमीनें छिनने के भय ने खड़ा किया किसानों का बखेड़ा

    -आलोक सिंघई-
    चौदह सालों बाद भारतीय जनता पार्टी की शिवराज सिंह सरकार किसानों को उनकी उपज का सही मूल्य दिलाने के लिए कृषि लागत और विपणन आयोग गठित करने का फैसला करने जा रही है। पूरे कार्यकाल में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान दौड़ दौड़कर किसानों से मुलाकात करने जाते रहे। इसके बावजूद उन्हें पता नहीं चल सका कि अन्नदाता की परेशानियां क्या हैं। पिछले दिनों उनके आत्मविश्वास का फुगावा इतने ऊंचे मगरे पर चढ़कर बोल रहा था कि कोई भी सलाह उन्हें आलोचना नजर आने लगी थी। कई दफे वे पत्रकारों से कहते रहे कि प्रेस के फीडबैक से ज्यादा लोगों की बातें तो वे सीधे मुलाकात में मालूम कर लेते हैं। सारी पारंपरिक चैनलों को लांघकर सीधे जनता से जुड़ने की ये मुहिम शिवराज जी ने अपने सलाहकारों के निर्देश पर चलाई थी। अब किसान आंदोलन से सबसे ज्यादा परेशान उनके वे सलाहकार हैं जो रात दिन तरह तरह की योजनाओं और विज्ञापनों से भाजपा के सुशासन की तस्वीर उकेरने में जुटे रहे हैं। कर्ज पर कर्ज लेकर चलाई जाने वाली इन योजनाओं की आड़ में भरपूर भ्रष्टाचार भी किया जा रहा है। उनका फीडबैक तंत्र बार बार इस भ्रष्टाचार जानकारियां दे रहा है लेकिन शिवराज जी कह रहे हैं कि किसानों को कांग्रेस ने बरगलाया है और उसकी आड़ में ही कुछ असामाजिक तत्वों ने किसान आंदोलन को हिंसक बना दिया है।

    शिवराज जी की ये बात बहुत हद तक सही बोल रहे है कि कांग्रेस ने रणनीति पूर्वक भाजपा के गुब्बारे में पिन चुभाई है। भाजपा कृषि कर्मण अवार्ड के नाम पर सीना ठोकते फिर रही थी लेकिन उत्साह के अतिरेक में उसका ये कदम भस्मासुरी साबित हो रहा है। मध्यप्रदेश में सुशासन का ढोल कितना पोला है इसकी असलियत किसान आंदोलन से उजागर हो गई है। सरकार के पास फीडबैक है कि इस आंदोलन को कांग्रेस के नेता हवा दे रहे हैं। कई वीडियो मौजूद हैं जिनमें कांग्रेस के नेता खुलकर किसानों को उकसा रहे हैं। शिवराज जी कांग्रेस को खलनायक बनाकर खुद को पाक साफ बताने की कोशिश कर रहे हैं। ये शैतान पर पत्थर फेंकने वाली कांग्रेसी सोच की ही नकल है। जब शिवराज सिंह को मध्यप्रदेश की कमान सौंपी गई थी तब तो ये युक्ति कारगर हो गई थी पर अब उनके कार्यकाल का पूरा रिपोर्ट कार्ड जनता के सामने है। इसलिए कांग्रेस खलनायक होते हुए भी नाराजगी के निशाने पर नहीं है। जब जहाज भंवर में फंसता है तो उसके यात्री जो पकड़ में आता है उसका सहारा लेकर बचने का प्रयास करने लगते हैं। यही हाल शिवराज जी का हो रहा है। जब किसान आंदोलन भड़का तो उन्होंने जन संवाद की राह छोड़कर अपने विश्वस्त सहयोगियों पर ज्यादा भरोसा किया। कृषि मंत्री को मोर्चे पर न लगाकर उन्होंने गृहमंत्री ठाकुर भूपेन्द्र सिंह दांगी को मोर्चा सौंपा। गृहमंत्री पहले ही बयान में फंस गए। उन्होंने कह डाला कि पुलिस ने गोली नहीं चलाई। जबकि मंदसौर कलेक्टर स्वतंत्र कुमार ने बाद में कहा कि प्रशासन ने गोली चलाने के आदेश नहीं दिए बल्कि टीआई ने मौके की नजाकत देखकर गोली चलवाई। इससे साबित हो गया कि सरकार झूठ बोल रही है।

    फिर जिस तरह गोलीकांड में मारे गए किसानों को मुआवजा देने की जल्दबाजी की गई उसने भी उलटा असर दिखाया। गोलीकांड में मारे गए किसानों को एक करोड़ रुपयों का मुआवजा पहली बार सुना गया। युद्ध में सीमा पर मारे गए शहीदों को भी एक करोड़ रुपयों का मुआवजा नहीं दिया जाता है। शिवराज जी जिन किसानों को असामाजिक तत्व बता चुके हैं वे उनके लिए आखिर इतना मुआवजा क्यों दे रहे हैं ये आम जनता की समझ के परे है। इससे ये संकेत भी साफ मिल गया कि सरकार दबाव में है। राष्ट्रीय किसान मजदूर संघ ने मुख्यमंत्री के इन बयानों के बाद अपनी रणनीति और ज्यादा आक्रामक कर ली। संघ के अध्यक्ष पं. शिवकुमार शर्मा कक्काजी ने 7 जून के बंद के आव्हान को पूरे उत्साह के साथ सफल बनाया। मंदसौर और आसपास के जिन जिलों में इन बयानों ने बंद को सफल बनाने में मदद की। भाग शिवराज भाग की तर्ज पर किसान आंदोलन सरकार को धमका रहा है और सरकार झुक झुककर कोर्निश बजा रही है।

    विशाल जनसमर्थन से सत्ता में आई भाजपा की ये हालत आखिर क्यों हुई इस पर भाजपा विचार करने भी तैयार नहीं है। घमंड से चूर भाजपा के नेता आखिर कर क्या रहे हैं इस पर भी चिंतन करने तैयार नहीं है। उसके नेताओं की दौलत विदेशों में ठिकाने लगाने में जुटे सलाहकार चपरासी बनकर ढुलाई में जुटे हैं पर भाजपा अपने कार्यकर्ताओं को आदर्शवाद के उपदेशों की घुट्टी पिला रही है। शिवराज सिंह के वित्तमंत्री किन किन सहेलियों को फ्लैट दिला रहे हैं ये बात सत्ता शीर्ष के कोई पदाधिकारी नहीं देखना चाहते। परिवहन मंत्री ने कांग्रेस की परंपराओं को कितनी कुशलता से आत्मसात किया इस पर चर्चा करना तो संभव नहीं है क्योंकि हाईकमान की सप्लाई लाईन थोड़ी बंद की जा सकती है। पंचायत मंत्री ने ग्रामीणों के नाम पर जारी योजनाओं में कैसे पलीता लगाया इस पर खुलकर बात करने की हिम्मत सत्ता शीर्ष ने कभी नहीं जुटाई। महिला और बाल विकास की योजनाएं जमीन पर नहीं तो कहां चलाई गईं इस पर सवाल पूछने की हिम्मत भाजपा ने तो कभी दिखाई ही नहीं बल्कि समाज के एकीकरण में जुटे संघ के पदाधिकारियों ने भी कभी इस दिशा में झांकने की कोशिश नहीं की।

    भाजपा के खिलाफ भड़कते जन आक्रोश की जरा सी झलक गांवों से ही मिल जाती है। भू राजस्व उगाही की बरसों पुरानी परंपरा को छोड़कर इस सरकार ने जो दस्तावेजों का डिजिटलाईजेशन किया वह नाराजगी की सबसे बड़ी वजह बन गया। किसानों के बीच ये बात फैल गई कि सरकार उनके खसरे खतौनी में हेरफेर करके उनकी जमीनें छीन रही है। सरकार के भ्रष्ट अधिकारियों ने जिन जमीनों को बेनामी बताकर खरीदना शुरु किया उससे इस अफवाह को बल मिला। पहले तो हाट बाजार के दिन पटवारी अपना बस्ता लेकर हाट में पहुंच जाता था और सौ पचास रुपए का सेवा शुल्क लेकर लोगों की जमीनों के रिकार्ड दुरुस्त कर देता था। ये सुविधा बहुत सस्ती और किसानों के लिए भरोसेमंद थी। इसमें तो उन जमीनों के रिकार्ड भी थे जो जमीनें वास्तव में थीं ही नहीं। या उन्हें विवादित जमीनों के बीच पट्टे देकर बांटा गया था। इसके बावजूद भुलावे के द्स्तावेज लेकर किसान खुश रहते थे। अब जब सैटेलाईट सर्वे के आधार पर जमीनों का दुरुस्तीकरण होने लगा है तब कई किसान अपनी कागजी जमीनों से भी बेदखल हो गए हैं। किसानों को वैकल्पिक जमीनें दिलाने का कोई प्रयास भाजपा के नेताओं ने नहीं किया है। अब वे सीमांत किसान मजदूर बनकर राष्ट्रीय किसान मजदूर संघ के हाथ मजबूत कर रहे हैं।

    राजस्व मंत्री उमाशंकर गुप्ता ने जब ये विभाग संभाला तब पार्टी ने उनके सामने कई टारगेट रखे थे। श्री गुप्ता ने हमेशा की तरह उन मुद्दों पर तेजी से अमल शुरु कर दिया। राजस्व अमले ने जब जमीनों के खसरे खतौनी पलटने शुरु किए तो किसानों को लगा कि सरकार भूमि सुधारों के नाम पर उनकी जमीनें छीनकर बड़ी कंपनियों को सौंपने जा रही है। सरकार के सख्ती के निर्देशों की आड़ में राजस्व अमले के कमाई पसंद अफसरों और कर्मचारियों ने धड़ाधड़ जमीनों के नामांतरण भी करवाने शुरु कर दिए।ज्यादातर जमीनें ठेका खेती करने वाली यही कंपनियां खरीद रहीं हैं। नर्मदा पट्टी में भी उपजाऊ भूमियों की बंदरबांट शुरु हो गई। सरकार की नर्मदा सेवा यात्रा ने उन बिखरे वंचितों को लामबंद करने का काम कर दिया। कई जगह कांग्रेस और भाजपा के खेमे वाले किसानों के बीच तनातनी भी नाराजगी की वजह बनी। यही कारण था कि भारतीय किसान संघ से करीबी रखने वाले कई किसान भी टूटकर राष्ट्रीय किसान मजदूर संघ के बैनर तले इकट्ठे होने लगे। सरकार को इस पूरी कवायद की जानकारी पहले से थी। इसके बावजूद उसे ये अनुमान नहीं था कि किसान आंदोलन इतना आक्रामक हो जाएगा। खदबदाते आक्रोश को पं.शिवकुमार शर्मा ने बड़ी कुशलता से सरकार के खिलाफ लामबंद कर दिया है। हालात इतने बेकाबू हो चले हैं कि बार बार झूठ बोलने में जुटी शिवराज सिंह सरकार अपने ही बुने जाल में उलझती जा रही है। सरकार जिन आईएएस अफसरों को अपना तारणहार मान रही है वे ही उसके खिलाफ नाराजगी भड़काने की वजह बन रहे हैं। भाजपा के नेताओं की पोल भी इस आंदोलन में खुलती जा रही है। बड़े बड़े पदों पर बैठने वाले नेतागण कितने आधारहीन हैं ये भी सामने आता जा रहा है। सबसे बड़ी भद तो भारतीय किसान संघ की पिटी है। वह किसानों का भाग्यविधाता होने का दावा करता रहा है पर किसानों ने उसके नेताओं को कितने स्थानों पर दौड़ा दौड़ा कर हकाला ये स्वीकारने में उसके नेता शर्म महसूस कर रहे हैं।

    भाजपा का मौजूदा नेतृत्व मध्यप्रदेश में प्याज भी खाएंगे और जूते भी खाएंगे की तर्ज पर काम कर रहा है। उसे मुगालता है कि अन्नदाता कहकर वो किसानों को अपने पक्ष में मना लेगी पर ये सोचना निरी भूल साबित होगी। किसान अपनी फसल का लागत मूल्य भी न मिल पाने के कारण तो परेशान है ही। वह अन्य सरकारी नौकरियों में धड़ाधड़ बढ़ते वेतनमानों से भी खफा है। किसानों के जो बच्चे उच्च शिक्षा के लिए मोटी मोटी फीसें चुकाने के बाद भी बेरोजगारी झेल रहे हैं वे भी इस आंदोलन में कूद पड़े हैं। सरकार के चापलूस कह रहे हैं कि जींस टीशर्ट पहने लोग किसान नहीं हैं बल्कि वे किसानों के बीच घुस आए असामाजिक तत्व हैं। इन नामुरादों को इतनी भी समझ नहीं कि किसान और उसके युवा बच्चों में पहनावे को लेकर कई बदलाव आ चुके हैं। पहनावे के आधार पर उन्हें किसान न मानना किसी षड़यंत्र का हिस्सा तो हो सकता है पर सच्चाई नहीं।

    किसानों को ये बात समझ में आ गई है कि टाटा अपना माल बनाता है तो उसके दाम फिक्स हो जाते हैं। बाजार में मिलने वाले हर सामान का मूल्य तय होता है पर वह रात दिन खटकर जो खाद्यान्न पैदा करता है उसके दाम नीलामी में तय होते हैं। समर्थन मूल्य की बैसाखियों पर टिके होते हैं। वे जो माल तैयार कर रहे हैं उसके बगैर लोगों का जीवन भी संभव नहीं इसके बावजूद उन्हें उनके माल का लागत मूल्य भी नहीं मिल पा रहा है। वे लगातार घाटे में जा रहे हैं और इससे उनके ऊपर कर्ज बढ़ता जा रहा है। हर किसान इतना कुशल नहीं है कि वह खेतों से सोना बटोर सके। सभी किसानों के पास जमीनें भी नहीं हैं । इसीलिए भारतीय किसान संघ जैसे पुरातन पंथी संगठन के सामने नया नवेला राष्ट्रीय किसान मजदूर संघ ज्यादा कारगर साबित हो रहा है। किसान को तो जमीन से बेदखल करने का भय दिखाकर डराया जा सकता है पर मजदूर के सामने खोने को कुछ नहीं है। भ्रष्टाचार करने वाली कांग्रेस की सरकारों की नकलपट्टी करके भाजपा ने अपने आप को अंधी गली में ला खड़ा किया है। उसे जो भूमि सुधार करने थे उसके लिए उसे किसी जादुई और प्रतिभाशाली नेता को मैदान में उतारना था। ये काम किसी घोषणा वीर या उसके सूदखोर मंत्री के बस का तो नहीं था।

  • कांग्रेस के गुलाम की फ्री स्पीच

    कांग्रेस के गुलाम की फ्री स्पीच


    कांग्रेस के शासनकाल में एनडीटीवी को जिस दरियादिली से बढ़ावा दिया गया उसके चलते यह चैनल खुलकर एकपक्षीय समाचारों का प्रवक्ता बन गया था। उस दिन तो हद हो गई जब उसकी एक बदतमीज टीवी एंकर ने आमंत्रित अतिथि के रूप में बुलाए गए भाजपा के प्रवक्ता के ऊपर टीवी स्क्रीन पर ही शो छोड़कर चले जाने का दबाव बनाया। बदतमीजी की इस पराकाष्ठा की रोकथाम को अभिव्यक्ति की आजादी पर हमला बताया जाने लगता इसलिए सरकार खामोश रही। वो तो भला हो सीबीआई का जिसने आर्थिक अनियमितता को उजागर करते हुए चैनल की असलियत जनता के सामने ला दी।अब चैनल के पत्रकार इसे मीडिया पर हमला बता रहे हैं । देश के खिलाफ गद्दारी करने वाले राजनेताओं और पत्रकारों को सावधान हो जाना चाहिए अब वे मुगालते में न रहें, उनकी आवारागर्दी पर भी अंकुश लगाया जा सकता है। प्रस्तुत है इण्डिया टीवी चैनल के पत्रकार अभिषेक उपाध्याय की रपट–

    लो हो गया फ्री स्पीच पर अब तक का सबसे बड़ा हमला।एनडीटीवी के खिलाफ सीबीआई ने एफआईआर दर्ज कर ली। हालांकि शिकायतकर्ता सरकार नही है। कोई सरकारी एजेंसी भी नही है। एनडीटीवी का ही एक शेयरहोल्डर है। एनडीटीवी ने आईसीआईसीआई बैंक से 350 करोड़ का लोन लिया था। उस वक़्त एनडीटीवी के पास महज 74 करोड़ की सम्पत्ति थी। मगर कांग्रेस राज में फ्री स्पीच के इस सबसे बड़े कथित मसीहा की धमक का आलम ये था कि 74 करोड़ की सम्पत्ति की कीमत पर 350 करोड़ का लोन हासिल कर लिया गया। वो भी तब जब एनडीटीवी के शेयर औंधे मुंह गिर चुके थे। उनका भाव 438 रुपया प्रति शेयर से गिरकर 156 रुपये प्रति शेयर पर आ चुका था। ऐसी कंपनी को इतना भारी भरकम लोन! फिर इस लोन का एक बड़ा हिस्सा प्रणव रॉय और राधिका रॉय के पर्सनल खातों में डाइवर्ट कर दिया गया। ये एक और बड़ा कारनामा किया इन फ्री स्पीच वालों ने। इस लोन के एवज में ब्याज की 48 करोड़ की रकम बनती थी। मामला इस बात का है कि एनडीटीवी इसे भी पी गया। इसी मामले में सीबीआई की बैंकिंग फ्रॉड डिवीज़न ने एनडीटीवी के मालिक प्रणव रॉय, उनकी पत्नी राधिका रॉय और होल्डिंग कंपनी आरआरपीआर प्राइवेट लिमिटेड के खिलाफ एफआईआर दर्ज कर ली है।

    हालांकि सीबीआई की बैंकिंग फ्रॉड डिवीज़न ने इसके पहले भी ब्याज की रकम हड़प कर जाने के न जाने कितने मामलों में एफआईआर दर्ज की है। मगर “फ्री स्पीच” पर कभी भी इस तरह का कोई हमला नही हुआ। यहां तक कि बैंकों के करोड़ों हड़प कर जाने वाले माल्या ने भी फ्री स्पीच पर हमले का आरोप नही लगाया। ट्विटर के प्लेटफार्म से ही सही, माल्या की फ्री स्पीच दनादन जारी है। दिक्कत ये है कि एनडीटीवी ने अपनी ईमानदारी का कथित सर्टिफिकेट खुद ही जारी किया हुआ है। और इसके चारों कोनों पर वामपंथ की गली हुई प्लास्टिक से बाइंडिंग भी कर दी है। इस सर्टिफिकेट के चारों ओर ‘सेकुलरिज्म’ के नंगे तार झूलते रहते हैं। छूने की सोचना भी मत। चेतावनी अलिखित है, मगर बिल्कुल स्पष्ट है। लालू यादव भी चारा घोटाले से लेकर हज़ार करोड़ की बेनामी सम्पत्ति के मामले में सेकुलरिज्म के ऐसे ही कवच का इस्तेमाल कर चुके हैं और करे जा रहे हैं।

    इसी एनडीटीवी के रवीश पांडेय (सिगरेट के पैकेट पर लिखी चेतावनी वाले रूल के मुताबिक-रवीश कुमार) के सगे बड़े भाई एक दलित लड़की को प्रताड़ित करने और सेक्स रैकेट चलाने के मामले में महीनों से फरार चल रहे हैं। मगर इस फ्री स्पीच और अभिव्यक्ति की आज़ादी को तब काठ मार गया था जब इसी चैनल पर ब्रजेश पांडेय की खबर बिना ताबूत के ही दफन कर दी गई। देश के तमाम चैनलों और अखबारों में बिहार कांग्रेस के उपाध्यक्ष रहे ब्रजेश पांडेय (रवीश पांडेय के भाई) की खबरें प्रमुखता से चलीं और छपीं मगर अभिव्यक्ति की आज़ादी के इस सबसे बड़े कथित झंडाबरदार ने उस पीड़ित दलित लड़की की आवाज़ कुचल दी। भाई का मामला जो था। दिल्ली की किस मार्किट में बिकते हैं, इतने मजबूत मुखौटे? टेंडर भर निकल जाए तो ठेकेदारों में होड़ लग जाएगी! रवीश पांडेय को शायद पता होगा इस मार्केट का?

    अब एनडीटीवी पर एक और मामला जांच में सामने आया है। विदेशों में 33 ‘पेपर कंपनियां’ बनाई। 1100 करोड़ रुपए उगाहे और फिर सारी कंपनियां dissolve कर दीं। पेपर कंपनियां यानि वे जो सिर्फ कागजों पर चलती हैं। ये 1100 करोड़ रुपए भी उन अज्ञात लोगों ने दिए जो ब्रिटिश वर्जिनिया आइलैंड और केमन आइलैंड जैसे टैक्स हैवेन देशों या यूं कह लें कि काली कमाई के अड्डों से तालुक रखते हैं। ये सारी जानकारी घरेलू एजेंसियों से छुपा ली गई। न इनकम टैक्स को खबर हुई और न ही कॉरपोरेट अफेयर्स मिनिस्ट्री को। हो गए चुपचाप करोड़ों पार।

    सिलसिला है ये। एक दो नही कई-कई मामले। हिंदुस्तान टाइम्स में छपी रिपोर्ट पर यकीन करें तो एयरसेल मैक्सिस डील से लेकर एयरइंडिया की प्लेन खरीद तक। हर जगह एनडीटीवी। मलाईदार कमाई के हर रास्ते पर। मुहर दर मुहर।

    मगर नही। मामला फ्री स्पीच का है। मामला कथित ईमानदार पत्रकारिता के इकलौते ठेकेदार का है। मामला सेक्युलर और वामपंथी सोच के झण्डाबरदार का है। सो सारे गुनाह माफ। सारी एजेंसियां “संघी”। खिलाफ आवाज़ उठाने वाले सारे लोग “कम्युनल”। देश का लोकतंत्र “खतरे” में। फ्री स्पीच “कोमा” में। उफ़, शाम के 7.30 हो गए। अब यहीं खत्म करता हूँ। कुछ ज़रूरी काम निपटा लूं। कुछ देर बाद “काली स्क्रीन” भी देखनी होगी 😊

    साभार पोस्ट अभिषेक उपाध्याय इण्डिया टीवी चैनल
    Abhishek Upadhyay

  • सरकार असामाजिक तत्वों के हाथों में बोले कक्का शर्मा

    सरकार असामाजिक तत्वों के हाथों में बोले कक्का शर्मा

    मध्यप्रदेश में किसान आंदोलन को कुचलने की तैयारी


    भोपाल,(पीआईसीएमपीडॉटकॉम )। मध्यप्रदेश में किसान आंदोलन के हिंसक रूप अख्तियार कर लेने के बाद सरकार अब इस आंदोलन को कुचलने की तैयारी कर रही है। अनुषांगिक संगठन भारतीय किसान संघ के हड़ताल वापस लेने के ऐलान के बावजूद जब कई स्थानों पर हिंसक प्रदर्शन जारी रहे तब सरकार ने आरपार की लड़ाई लड़ने का मन बनाया है। उधर देश के किसान आंदोलन में मध्यप्रदेश के किसानों की अगुआई करने वाले राष्ट्रीय किसान मजदूर संघ ने हड़ताल तोडने के सरकारी प्रयासों के खिलाफ नई जंग छेड़ दी है। जगह जगह गुपचुप समझौता करने वाले भारतीय किसान संघ के पुतले जलाए जा रहे हैं। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने आज भोपाल में पत्रकार वार्ता बुलाई और कहा कि मैं किसी का नाम तो नहीं लेना चाहता पर यह आंदोलन कुछ असामाजिक तत्वों के हाथों में चला गया है। सरकार हालात पर नजर रखे हुए है और जल्दी ही सख्त कार्रवाई भी की जाएगी। उधर इंदौर में पत्रकार वार्ता के बुलाकर राष्ट्रीय किसान मजदूर संघ ने सरकार को आड़े हाथों लिया। मुख्यमंत्री के आरोप के जवाब में संघ के अध्यक्ष शिवकुमार शर्मा ने कहा कि सरकार ही असामाजिक तत्वों के हाथों में आ गई है इसलिए उसे किसान भी दुश्मन नजर आने लगे हैं।

    मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि सरकार किसानों की सभी वाजिब मांगों को मानने के लिए तैयार है। हम अन्नदाता के साथ हैं और उन्हें हरसंभव सहयोग दिलाने की कोशिश कर रहे हैं। सरकार ने अरहर की दाल के मूल्यों की गिरावट को देखकर समर्थन मूल्य पर दाल खरीदने का फैसला लिया है। प्याज की खरीदी जल्दी ही शुरु की जाएगी। उन्होंने कहा कि बार बार की इस समस्या से किसानों को निजात दिलाने के लिए हम जल्दी ही खेती के रकबे की जानकारी सार्वजनिक करेंगे। किसानों को सलाह दी जाएगी कि यदि उन्होंने मांग के अनुरूप फसलें न बोईं तो उन्हें उपज का लागत मूल्य नहीं मिल पाएगा। श्री चौहान ने कहा कि भारतीय किसान संघ के आव्हान के बाद प्रदेश की मंडियों में अनाज, फल, सब्जी और दूध की आवक सुधरने लगी है।

    उन्होंने कहा कि ये आंदोलन कुछ असामाजिक तत्वों ने हथिया लिया है। वे किसानों को उन काल्पनिक मांगों को लेकर गुमराह कर रहे हैं जिन्हें पूरा करना संभव नहीं हैं। कुछ असामाजिक तत्वों ने तोड़फोड़ करके पुलिस पर हमला करने का भी प्रयास किया है। एक पुलिस अधिकारी की तो आंख ही फूट गई है। उसे इलाज के लिए चेन्नई भेजा गया है। उन्होंने कहा कि सरकार उपद्रवियों से सख्ती से निपटेगी।

    राष्ट्रीय किसान मजदूर संघ के अध्यक्ष पं. शिवकुमार शर्मा उर्फ कक्काजी का कहना है कि सरकार अपने खुद के वायदे से मुकर रही है। सरकार के कुशासन के कारण ही आज किसान दुर्दशा के शिकार हैं और उनके सामने अपनी जीवन लीला समाप्त करने की स्थितियां बनती जा रहीं हैं। उन्होंने कहा कि मूल्य सूचकांक के आधार पर फसलों का मूल्य दिए जाने के बाद ही किसानों की स्थितियां सुधारी जा सकती हैं। उन्होंने कहा कि सरकार केवल बड़े किसानों को देखकर फैसले कर रही है जबकि बड़ी संख्या में सीमांत और लघु किसान भी हैं जिनके हालात बदतर होते जा रहे हैं। सरकार किसानों की स्थितियां सुधारने की बातें तो बड़ी बड़ी करती है पर उसने कभी किसान को सक्षम बनाने का प्रयास नहीं किया है। पिछली सरकारों ने जिस तरह उद्योगपतियों के हित में फैसले लिए उसी तरह मौजूदा सरकार भी किसानों के नाम पर उद्योगपतियों और सूदखोरों को बढ़ावा दे रही है। उन्होंने सरकार के दमन चक्र के फैसले के जवाब में कहा कि किसान अपनी हड़ताल जारी रखेंगे ।

    गौरतलब है कि भारतीय किसान संघ से अलग हुए इस नए संगठन में प्रमुख पदों पर मजदूरों को भी पदासीन किया गया है। आंदोलन में बढ़ चढ़कर भागीदारी न कर पाने के कारण किसान तो खामोश बैठने लगे हैं पर इस आंदोलन की कमान अब किसानों के बजाए मजदूरों ने संभाल ली है। जाहिर है इन खेतिहर मजदूरों में सरकार के दमनचक्र को झेलने की ताकत अधिक है।

  • किसान आंदोलन में फूट के बीच हड़ताल वापिसी का ऐलान

    किसान आंदोलन में फूट के बीच हड़ताल वापिसी का ऐलान

    भोपाल, पीआईसीएमपीडॉटकॉम। राष्ट्रीय किसान मजदूर संघ के आव्हान पर प्रदेश भर में चल रहे किसान आंदोलन में आज फूट पड़ गई। सरकार समर्थित भारतीय किसान संघ ने आज उज्जैन में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान से हुई चर्चा के बाद आंदोलन वापस लेने की घोषणा कर दी। संघ का कहना है कि सरकार ने किसानों की अधिकांश मांगें वापस ले लीं हैं इसलिए हम हड़ताल समाप्त कर रहे हैं। वहीं राष्ट्रीय किसान मजदूर संघ ने अपनी पूर्व घोषित रणनीति के अनुसार दस जून तक हड़ताल जारी रखने का फैसला लिया है।आज इसी श्रंखला में देवास में रैली भी निकाली गई।जन न्याय दल ने कहा है कि बगैर सोचे समझे किसान आंदोलन को समाप्त करने के लिए सरकार ने जो फैसले किए हैं उससे जनता की गाढ़ी कमाई बर्बाद होने का खतरा बढ़ गया है।

    राष्ट्रीय किसान मजदूर संघ के अध्यक्ष शिवकुमार शर्मा कक्काजी ने कहा कि किसानों को लेकर भारतीय जनता पार्टी की असलियत अब उजागर हो गई है इसलिए पूर्व घोषित कार्यक्रम के अनुसार किसानों का आंदोलन दस जून तक विधिवत चलता रहेगा। उन्होंने कहा हम खुशहाली के दो आयाम, ऋण मुक्ति और पूरा दाम का नारा लेकर इस आंदोलन में उतरें हैं। आंदोलन पर जाने का फैसला हमारा था। न तो हमने सरकार से कोई बात की है और न ही सरकार ने हमसे संपर्क करने की पहल की है। इसलिए हम किसानों की मूलभूत मांगों के लिए अपना संघर्ष जारी रखेंगे।

    उन्होंने कहा कि भारतीय जनता पार्टी ने अपने चुनावी घोषणा पत्र में वादा किया था कि वह सत्ता में आने पर किसानों के 44 हजार करोड़ के कर्जे माफ करेंगे। लागत के आधार पर किसानों को उनकी फसलों का पचास फीसदी लाभकारी मूल्य देंगे। सत्ता में आने के बाद वह अपने वायदों से मुकर रही है। शिव कुमार शर्मा ने कहा कि केन्द्र व राज्य की भाजपा सरकार किसान विरोधी सरकार है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने आते से ही धान और गेहूँ पर मिलने वाला बोनस समाप्त कर दिया, किसान विरोधी जमीन विधेयक लाये, किसान क्रेडिट कार्ड पर ब्याज बढ़ाया, 18 बार कपास निर्यात को रोका जिससे घरेलू कपास उत्पादक किसानों की कमर टूट गई। मोजाम्बिक से तुअर दाल, ऑस्ट्रेलिया से गेहूँ और आलू मंगवाकर देश के किसानों की मेहनत पर पानी फेर दिया है।

    प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने लाल किले की प्राचीर से गन्ना उत्पादक किसानों का बकाया न होने की बात कही जो पूरी तरह से झूठी सिद्ध हुई है।शिव कुमार शर्मा ने देश के सभी किसानों को कर्ज से मुक्त करने और लागत से डेढ़ गुना अधिक मूल्य पर समस्त कृषि उपजों को खरीदने की माँग की है।
    उन्होंने कहा कि जब देश के उद्योगपतियों के कर्ज माफ किये जा सकते हैं, विभिन्न प्रकार के करों में छूट दी जा सकती है, विभिन्न प्रकार की सुविधाएँ उपलब्ध करवाने के लिये बड़ी राशि खर्च की जा सकती हैं, तब सभी किसानों को कर्ज से मुक्ति क्यों नहीं दी जा सकती? उन्होंने प्रश्न किया कि उद्योगपतियों और किसानों के लिए यह दोहरा मापदण्ड क्यों?
    श्री शर्मा ने कहा कि आजादी के बाद से ही पूरे देश में सिर्फ किसान को ही उसके उत्पादन का मूल्य तय करने का अधिकार नहीं देकर केन्द्र सरकार ने किसानों को कर्ज में डुबोकर दिन-प्रतिदिन तिल-तिल करके मरने के लिये छोड़ दिया है। यही एकमात्र कारण है कि देश के किसान प्रतिदिन आत्महत्या करने पर मजबूर हैं।

    यदि केन्द्र सरकार किसानों के समस्त कर्जों से ऋण मुक्त करती है और लागत मूल्य से डेढ़ गुना अधिक लाभकारी मूल्य देती है तो किसानों की आत्महत्या का दौर समाप्त हो जायेगा।
    राष्ट्रीय किसान महासंघ के राष्ट्रीय संयोजक और राष्ट्रीय किसान मजदूर संघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष शिवकुमार शर्मा ‘कक्काजी ने बताया कि केन्द्र सरकार को समस्त कृषि और उद्यानिकी से सम्बन्धित उपजों का लाभकारी मूल्य किसानों को देना चाहिये। साथ ही केन्द्र सरकार इन्हें क्रय करने की गारंटी भी दे।
    श्री शर्मा ने कहा कि केन्द्र सरकार वर्ष 2006 में देश के प्रख्यात कृषि वैज्ञानिक पद्मविभूषण प्रो. एम.एस. स्वामीनाथन की अध्यक्षता में गठित राष्ट्रीय किसान आयोग द्वारा तैयार पाँचवी और अन्तिम संशोधित राष्ट्रीय किसान नीति की अनुशंसाओं को लागू करे।

    केन्द्र सरकार किसान पेंशन योजना लेकर आये जिसमें किसान परिवार के मुखिया को 55 वर्ष की आयु से पेंशन के रूप में प्रति माह एक निश्चित राशि मिलना प्रारम्भ हो सके। किसानों के हित में नया भू-अर्जन कानून बनाया जाये। किसानों की भूमि को आरक्षित करें। औद्योगिकीकरण, शहरीकरण तथा विशेष आर्थिक प्रक्षेत्र हेतु कृषि योग्य भूमि अधिग्रहित नहीं की जाये। इसके लिये गैर-कृषि भूमि और बंजर भूमि ही अधिग्रहित की जाये। भू-अधिग्रहण के साथ ही पुनर्वास और पुनःस्थापन को जोड़ा जाये।

    उधर भारतीय किसान संघ के शिवकांत दीक्षित ने घोषणा की है कि सरकार ने उनकी सभी बातें मान लीं हैं इसलिए इस आंदोलन को स्थगित कर दिया गया है। उन्होंने किसानों से अपील करते हुए कहा कि मध्यप्रदेश सरकार किसान हितैषी सरकार है। वह सदैव किसानों के कल्याण के लिए कार्य करती है इसलिए किसान अब आंदोलन वापस ले लें।

    उन्होंने कहा कि सरकार की पहल प र अब कृषि उपज मंडी में बेचे जाने वाले उत्पादों की पचास फीसदी रकम तत्काल किसानों के बैंक खातों में पहुंच जाएगी। गर्मी में होने वाली मूंग की फसल को सरकार समर्थन मूल्य पर खरीदेगी। किसानों से प्याज की खरीदी पिछले साल की तरह होगी। सरकार अगले तीन चार दिनों में किसानों से आठ रुपए मूल्य पर प्याज खरीदेगी। सब्जी मंडियों को मंडी अधिनियम के दायरे में लाया जाएगा ताकि किसानों को अधिक आढ़त न देना पड़े। किसानों के लिए फसल बीमा योजना की अनिवार्यता को अब ऐच्छिक बना दिया जाएगा। नगर एवं ग्राम निवेश एक्ट में जो भी किसान विरोधी प्रावधान होंगे उन्हें हटा दिया जाएगा। आंदोलन रत किसानों पर दर्ज प्रकरण समाप्त कर दिए जाएंगे। सरकार की ओर से मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के इन आश्वासनों के बाद आज भारतीय किसान संघ ने अपने पदाधिकारियों को आंदोलन शांत करने के निर्देश दिए हैं।

    किसानों के पक्ष में सरकार के इन फैसलों पर मिली जुली प्रतिक्रियाएं सामने आ रहीं हैं। जन न्याय दल के राष्ट्रीय अध्यक्ष बृज बिहारी चौरसिया ने कहा है कि किसान आंदोलन सरकार की नाकामी का जीता जागता प्रमाण है। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान सरकारी मशीनरी पर अपना नियंत्रण खो चुके हैं इसलिए उन्हें सत्ता में रहने का नैतिक अधिकार नहीं है। श्री चौरसिया ने कहा कि मुख्यमंत्री स्वयं जनता के बीच कड़ी धूप में दौरे करते हैं जबकि उनके अफसर वातानुकूलित कक्षों से बाहर नहीं निकलते हैं। किसान कल्याण की राशि से विदेश यात्राएं करके अफसर गुलछर्रे उड़ा रहे हैं। कृषि पर सरकार का कोई नियंत्रण नहीं है। कितने रकबे पर कितनी फसल कैसे बोई जाएगी सरकार इसका आकलन नहीं कर पाती है। यही वजह है कि गैर जरूरी जिंसों की खेती धड़ल्ले से हो रही है जबकि जरूरी फसलें नहीं बोई जा रहीं हैं।

    सरकार कृषि कैलेन्डर का पालन नहीं करा पा रही है इससे किसानों को उनकी उपज का उचित मूल्य तक नहीं मिल पा रहा है। थोथे नारों से सरकार किसानों को बहला रही है जबकि लागत मूल्य तक न मिल पाने के कारण किसान आत्महत्या करने को मजबूर हैं। पिछली साल भी सरकार ने प्याज की खरीदी पर जनता की गाढ़ी कमाई के चार सौ करोड़ रुपए पानी की तरह बहा दिए थे। इस बार भी प्याज के भंडारण और वितरण की व्यवस्था नहीं की गई है और बगैर सोचे समझे किसानों की उपज खरीदने का पाखंड किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि किसानों के आंदोलन से जनता में भय व्याप्त है और व्यापारी जमाखोरी में लिप्त हैं।

  • ट्रम्प की लताड़ समझ नहीं आती क्या नेताजी

    ट्रम्प की लताड़ समझ नहीं आती क्या नेताजी

    जिस देश में ‘समृद्ध’ नेताओं की कमाई सरकारी दलाली पर निर्भर हो, जहाँ नौकरशाह रिश्वतखोर और उद्योगपति कर-चोर हों, उस देश के बारे में अगर डोनाल्ड ट्रम्प ये कहें कि भारत अरबों डालरों के दान और ग्रांट का भूखा है तो बुरा तो बहुत लगता है…लेकिन ट्रम्प की बात गलत नही है.
    ट्रम्प मुहंफट हैं, बेधडक हैं, इसलिए किसी अबूझ या कुभाषी की तरह अक्सर नंगा सच बोल जाते हैं. उन्होंने पेरिस की पर्यावरण संधि के संदर्भ में कहा कि भारत को विकसित देशों से सिर्फ अरबो-खरबों की ग्रांट चाहिए. भले ही भारत अपने यहाँ प्रदूषण कम करे या ना करे लेकिन खरबों डालर की ग्रांट पर उसकी निगाह है. ट्रम्प के इस भारत विरोधी बयान की निंदा होनी चाहिए लेकिन इस ग्रांट का बड़ा हिस्सा लूटने वाले नेता-नौकरशाह-उद्योगपतियों पर हम पर्दा क्यूँ डालें ?..

    आखिर कब तक महाशक्ति का सपना देखना वाला ये देश अंतर्राष्ट्रीय सहायता और दान के लिए हाथ पसारेगा ? क्या यही 1.30 अरब भारतियों का स्वाभिमान है ? क्या यही हमारी गैरत और आबरू है ? क्या देश को 2.60 अरब हाथ दुनिया से दान और भीख मांगने के लिए मिलें हैं ?

    हमारे बराबर या हमसे कुछ ही ज्यादा जनसँख्या वाला चीन है …जो तीन दशक पहले अर्थ व्यवस्था में हमसे पीछे था लेकिन आज वो दुनिया के आगे हाथ नही फैलाता है. आज, हमारा पडौसी चीन, अफ्रीका और कईं कमज़ोर एशियाई देशों का पेट पाल रहा है.

    और एक हम है …जो हमेशा दरिद्र पाकिस्तान को अपनी विदेश नीति के केंद्र में रखते हैं. कश्मीर हो आतंकवाद हो, नक्सल समस्या हो…पाकिस्तान सर्वविदित है. इधर घरेलू मामलों में हमारी राजनीति या यूँ कहें कि हर नीति, मुस्लिम, ओबीसी और दलित वोटबैंक पर केन्द्रित रहती है. नौकरी हो, सब्सिडी हो, कोई आयोग हो या बड़ा निर्णय हो, पिछड़े, दलित, मुस्लिम हम नही भूलते. क्यूंकि ये वोट की राजनीति में निर्णायक है. शायद यही वजह है कि हमारी सरकारें पाकिस्तान और वोटबैंक के जाल से कभी आगे बढ़कर इस देश को किसी बहुत ऊंचे लक्ष्य तक नही ले जा सकीं.

    हमने अर्थ क्रांति को कभी देश के अजेंडे पर सबसे ऊपर रखा ही नही. हमने ओद्योगिक उत्पादन को राष्ट्रीय लक्ष्य कभी माना ही नही. हम 21वी शताब्दी में भी खुले में शौच करने वाले लोगों को गली-गली, गाँव-गाँव ढूंढ रहे हैं. महानायक अमिताभ बच्चन देश के बच्चों से कह रहे हैं कि लोटा लेकर चलने वालों को ढूंढो. गाँव-गाँव ढूंढो. ये अलग बात है कि आज हमे ढूँढना तो नये जमशेदजी टाटा, घनश्याम दास बिरला या जमना लाल बजाज को है…लेकिन हम ढूंढ किसी और को रहे हैं. हमे ढूंढना तो उन युक्ति और निर्माण पुरुषों को है जिन्होंने ब्रिटिश साम्राज्य से लोहा लेकर ब्रिटिश मिलों को पानी पिला दिया था. हमे ढूंढना तो उन्हें है जिन्होंने सौ बरस पहले देश में स्वदेशी कारखानों के नये मंदिर निर्माण किये थे.

    कम लोग जानते हैं कि 1950 के दशक में भारत विश्व की सातवीं बड़ी ओद्योगिक शक्ति था जब चीन अपनी गरीबी से संघर्ष कर रहा था. लेकिन हम अपनी ताकत धीरे धीरे खोते चले गये. हमने अपने कारखानों को पूजना बंद कर दिया. हमारे नेताओं की रूचि स्टील कारखानों और मिलों से हटकर , चिट फंड कम्पनी और भ्रष्ट बिल्डरों में बढ़ने लगी. हमारी अर्थ व्यवस्था में जमशेदजी जैसों का महत्व जाता रहा. हमारी नई अर्थ व्यवस्था के मानक झुनझुनवाला जैसे शेयर दलाल हो गये जो आईपीओ की बड़ी बड़ी डील के कुबेर बने. जिस देश के नेशनल स्टॉक एक्सचेंज की सीईओ को ऑनलाइन ट्रेडिंग में कुछ दलालों को फायदा पहुंचाने का दोषी माना जाये उस देश के शेयर मार्किट का असली हाल क्या होगा ..ये कोई अर्थशास्त्री सहजता से समझ सकता हैं. जिस देश में फैक्ट्रियों की जगह शैल कम्पनियों के ज़रिये लाभ अर्जित करने की परम्परा हो वहां ओद्योगिक उत्पादन के श्रम और संकल्प में किसको दिलचस्पी होगी.

    बहरहाल वक़्त अभी गुजरा नही. भारत को बड़े कारखाने, भारी उद्योग के नये प्रतीक चाहिए. हर प्रदेश को कोई जमशेदजी चाहिए. हर प्रदेश को विश्वकर्मा का अवतार चाहिए. लेकिन सच ये है कि आज हमारे प्रदेश सुब्रोतो रॉय, पोंटी चढ्ढा या आम्रपाली और सुपर टेक जैसे बिल्डर और चिट फंड मालिक खोज रहे हैं. शायद सत्ता को ज़रुरत धन सम्पनता की नही धन संचय करने वालों की है. यही वजह है कि देश के सबसे बड़े प्रदेश यूपी में उद्योग का बहुत बुरा हाल है. अगर नॉएडा/ग्रेटर नॉएडा छोड़ दें तो पूरे प्रदेश में 1989 के बाद से कोई भी बड़ी इंडस्ट्री नही आई. कानपुर से लेकर बनारस तक और आगरा से लेकर गोरखपुर तक भारी उद्योग के क्षेत्र में तीस वर्षों से अकाल है.
    मित्रों, जिस समाज और सभ्यता में, हज़ारों वर्षों से युक्ति और निर्माण की अवधारणा रही हो वहां की दुर्दशा देख आज मन विचलित होता है. इसलिए भगवान् विश्वकर्मा का आज आशीर्वाद चाहिए. हे युक्ति, निर्माण और उपकरणों के देव विश्वकर्मा ! हे शिल्प शास्त्री ! हे उत्पादन और सम्पनता के जनक …अब आप ही अवतरित हो जाईये . वर्ना पाकिस्तान की आढ़ में ये चीन हमें निगल जाएगा. .

  • विलीनीकरण वर्षगांठ के बहाने एजेंडे पर लौटती भाजपा

    विलीनीकरण वर्षगांठ के बहाने एजेंडे पर लौटती भाजपा

    मध्यप्रदेश की शिवराज सिंह सरकार अपनी असफलताओं से घबराकर पार्टी के पुराने एजेंडों पर लौटने लगी है। लगभग चौदह सालों बाद भाजपा ने भोपाल के विलीनीकरण की वर्षगांठ मनाकर ये जताने की कोशिश की है कि वह कांग्रेस की पिछली भ्रष्ट सरकारों से अलग है। हालांकि भाजपा के ये प्रयास अब ट्रेन चूकने के बाद किए जाने वाले प्रयास ही साबित हो रहे हैं। इसकी वजह ये है कि सरकार के खिलाफ सत्ता विरोधी लहर शुरु हो गई है। मालवा के किसानों ने भारतीय किसान संघ के बैनर तले दूध और प्याज सड़कों पर फेंककर जनता की नब्ज दर्शाने का काम किया है। जनता के बीच कांग्रेस के कुशासन की बदबू अभी तक नहीं गई है। इसी के चलते वो अपनी प्यारी सरकार को लगातार बर्दाश्त कर रही है। इसके बावजूद अभी ये नहीं कहा जा सकता कि चुनाव की बेला में भी जनता का ये धीरज बरकरार रह पाएगा।

    भोपाल रियासत का भारत में विलीनीकरण आजादी के दो साल बाद हुआ ये बात आज की नई पीढ़ी को मालूम भी नहीं है। खुद शिवराज सिंह चौहान ने भोपाल के बोट क्लब पर आयोजित कार्यक्रम में कहा कि भोपाल के नवाब ने पाकिस्तान में मिलने की इच्छा के चलते हिंदुस्तान में विलीनीकरण स्वीकार नहीं किया था। तब भोपाल के नागरिकों ने आंदोलन चलाकर संघर्ष किया और फिर ये रियासत हिंदुस्तान का हिस्सा बनी। इस दौरान भोपाल के कई बहादुरों ने अपनी जान की बाजी लगाई। राजपूतों की तो एक पूरी टुकड़ी को धोखे से भोजन पर बुलाकर कत्ल कर दिया गया। भोपाल की खूनी बेगम ने अंग्रेजों की टुकड़खोरी करते हुए यहां के मुसलमानों और हिंदुओं की जायदाद हड़पी और उनका कत्ले आम किया। ये कहानियां राजा भोज की विरासत से कतई मेल नहीं खाती हैं। भाजपा और खासतौर पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ बरसों से इस दिशा में काम करता रहा है। स्थानीय इतिहासकारों ने तथ्यों को संजोकर वे तमाम कड़ियां जोड़ीं जिनमें नवाब खानदान की गद्दारी की वजहें तलाशी गईँ हैं। अपना निजी वर्चस्व बनाने के लिए किस तरह अंग्रेजों के तलुए चांटे गए इसकी एक नहीं सैकड़ों कहानियां जनता के बीच सुनी सुनाई जाती हैं। नवाब के कुशासन को उचित साबित करने के लिए जो स्थानीय व्यापारी, कलाकार और पत्रकार उनकी जी हुजूरी में लगे रहते थे उनके वंशज आज भी कांग्रेस के बैनर तले सत्ता शीर्ष के करीब बने हुए हैं।

    सवाल ये है कि आरएसएस को अपनी विचारधारा का पैतृक संगठन मानती रही भाजपा ने चौदह सालों तक इस एजेंडे को क्यों छुपाए रखा। वह कांग्रेस की भ्रष्ट सरकार की तर्ज पर प्रदेश के संसाधनों के दोहन में क्यों जुटी रही। आधारभूत संरचनाओं के विकास की दिशा में भाजपा ने पिछली सरकारों की तुलना में बेशकीमती काम किया है। इसके बावजूद उस विकास की तर्ज वही रही जो कांग्रेस की शैली में भी झलकती थी। भ्रष्टाचार और कमीशनखोरी के बीच विकास की जो कीमत अदा की गई उसके चलते आज भी प्रदेश में रोजगार के संसाधन विकसित नहीं हो पाए हैं। कृषि क्षेत्र की उत्पादकता में प्रकृति का सहयोग यदि न मिला होता तो कृषि उत्पादन में भी मध्यप्रदेश कोई बड़ा बदलाव नहीं ला पाया है। खुद मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने इस अवसर पर आयोजित कार्यक्रम में कहा कि हम रोजगार बढ़ाने की दिशा में बड़ा काम करने जा रहे हैं। इसके बावजूद मध्यप्रदेश की आह चौदह सालों के बाद भी वाह में नहीं बदल सकी है।

    विलीनीकरण दिवस के आयोजन में भी जन भावनाओं की ये तस्वीर साफ नजर आई।बाहुबली जैसी रिकार्डतोड़ सफल फिल्म की गायिका मधुश्री भट्टाचार्या का बेहतरीन आयोजन भी भोपाल की जनता को बोट क्लब पर नहीं खींच पाया। लोग एक अच्छे आयोजन से वंचित रह गए जबकि नगर निगम ने इस आयोजन के लिए रेडियो, टीवी, अखबारों पर भरपूर विज्ञापन भी चलाए। आयोजन के साथ साथ आतिशबाजी भी की गई जबकि रात के वक्त वन विहार के नजदीक इस तरह के आयोजन करना प्रतिबंधित है। इसकी एक वजह ये भी थी कि रमजान का महीना चल रहा है और इस दौरान मुस्लिम धर्मावलंबियों के लिए गीत संगीत के कार्यक्रमों में भाग लेने की इजाजत नहीं होती है। इबादत का दौर भले ही रात भर चलता हो पर लोग टीवी पर हो रहे प्रसारण भी नहीं देखते हैं। हाल में हमीदिया अस्पताल में मस्जिद बनाने की जिद में जो नौटंकी की गई उससे भी भोपाल की फिजा में नाराजगी फैली। जब दंगे के हालात पैदा कर रहे लोगों को पुलिस प्रशासन ने सख्ती से कुचला तो भी लोगों में ये दहशत थी कि कहीं बोट क्लब पर भी वही हालात न बन जाएं। इस पर मुख्यमंत्री शिवराज सिंह का ये बयान कि गदर मचाने वालों को कुचल दिया जाएगा। इससे भी लोगों ने आयोजन से दूरी बनाए रखना ही उचित समझा।

    आखिर भाजपा पिछले चौदह सालों से क्या करती रही है जो वह जनता का वह विश्वास दुबारा नहीं पा सकी जो उसने दिग्विजय सिंह की भ्रष्ट सरकार के खिलाफ पाया था। वह अब तक अपने एजेंडे छोड़कर आखिर कहां कहां भटकती रही। जब देश ने तय कर दिया कि उसे सबका साथ सबका विकास कहने वाले हिंदुत्व से कोई गुरेज नहीं है। सांप्रदायिकता की कांग्रेस की परिभाषा से उसकी कोई सहमति नहीं। भाजपा का सौमनस्यवादी हिंदुत्व उसे स्वीकार है तो फिर भाजपा कांग्रेस की ऊल जलूल नीतियों की नकलपट्टी क्यों करती रही। नए चुनाव की ओर बढ़ती भाजपा को इस पर गंभीरता से विचार करना होगा।