Month: March 2017

  • राम मंदिर तर्क नहीं आस्था का प्रतीक

    राम मंदिर तर्क नहीं आस्था का प्रतीक

    – भरतचन्द्र नायक
    विश्व के लब्ध प्रतिष्ठित इतिहासकार मौलाना आजाद स्मृति व्याख्यान माला में भाग लेने आये थे। तब उन्होनें आक्रांताओं द्वारा विजित देशों में की गयी ज्यादियतों का हवाला देते हुए कहा था कि आक्रांता विजित देश में अपने समर्थन में भवन प्रासाद स्मृति के रूप में बनाते रहे है। लेकिन इन स्मारकों का उद्देश्य मजहबी नहीं सियासी होता आया है। इसलिए साम्प्रदायिक भावुकता से इन स्मारकों को देखना अपने आपको धोखा देना है। विश्व इतिहासकार अर्नोल्ड टोनवी ने बताया कि 1614 में रूस ने पोलेंड के वारसा पर अपना अधिकार जमा लिया था। रूस ने अपनी विजयी महत्वाकांक्षा में ईस्टर्न आर्थोडाॅक्स क्रिश्चियन केथेडूल प्रमुख स्थान पर बना डाला। रूस का इसके पीछे उद्देश्य यही था कि पोलिस में यह भावना बैठ जाये कि उनका असल मालिक रूस है। बाद में 1918 में पोलेंड की आजादी के बाद केथेडूल को जमीदोंज करने में पोलिस ने वक्त नहीं लगाया। उन्होनें भारत सरकार की इस बात के लिए खुले मन से प्रशंसा की कि उसने औरंगजेब की मसजिदों को सम्मान के साथ वजूद में रहने दिया। उलटे भारत सरकार पुरातत्व विभाग मुगलकालीन स्मारकों का संधारण करता है, जबकि स्मारकों का उद्देश्य सिर्फ आक्रान्ता, विदेश से भारत आये आक्रांताओं का वर्चस्व याद दिलाना, भारतीय अस्मिता को आहत करना है। अर्नोल्ड टोनवी ने भारतीयों की सहिष्णुता को विश्व में सर्वोच्च निरूपित किया है। ऐसे में अयोध्या में राम मंदिर को ढहाये जाने और विध्वंस में बचे अवशेषों को जोड़कर बाबर द्वारा मजिस्द बनाये जाने का मंतव्य समझना कठिन नहीं है। ऐसे में बरसों से अदालत में चल रहे इस विवाद पर सर्वोच्च न्यायालय ने इस मसले को यदि हिन्दू-मुस्लिम के बीच सुलह सफाई से हल करने को कहा है तो यह अदालत की दूरदर्शितापूर्ण परामर्ष है। सर्वोच्च न्यायालय ने यहां पर सदाशयता बतायी कि जरूरत पड़ने पर न्यायालय मध्यस्थता करने को भी तैयार है। मुख्य न्यायाधीश ने माननीय न्यायाधीश की सेवाएं देने का प्रस्ताव किया है।

    अध्योध्या में राम मंदिर विवाद पर तकनीकी रूप से स्पष्ट है कि आक्रान्ता बाबर ने राम मंदिर के विशाल ढांचे को ध्वस्त किया और मसजिद का निर्माण करा दिया, जिसे बाद में बाबरी मसजिद कहा गया और कार सेवा करते हुए आवेश में कार सेवकों ने ढांचा जमीदोंज कर दिया। इस विवाद में इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने माना है कि रामलला जहां तम्बू के नीचे विराजमान है, उस भूमि पर मंदिर के स्थान पर मंदिर बनाया जाये। एक तिहायी भूमि अखाड़े को शेष आवेदक मुस्लिम समाज के हक में जायेगी। लेकिन फैसला माना नही गया और सर्वोच्च न्यायालय में विवाद पहुंचा जहां सर्वोच्च न्यायालय ने सुलह करने की सलाह दी है। अगर इस सद्परामर्श पर भी असहमति जताते हुए कुछ मुस्लिम संगठन मामले पर न्यायालय के निर्देश की अवमानना करते हुए जिद पर अड़े है। न्यायालय के आदेश के समर्थन में कुछ अल्पसंख्यक संगठन आगे भी आये है। लेकिन उनकी आवाज कमजोर मानी जा रही है। मजे की बात यह है कि अयोध्या में बाबरी ढांचा ढहाये जाने के बाद अदालत में जिस बुजुर्ग मुस्लिम हाशिम अंसारी ने याचिका दर्ज की थी, उसका बाद में हृदय परिवर्तन हुआ और उसने सुलह सफायी की बात करते हुए इस बात पर अफसोस जाहिर किया कि मजहब के नाम पर आक्रामक तेवर अपनाने वाले लोग खाते-पीते लड़ रहे है और आराध्य रामलला एक तंबू में ऐसे मौसम की मार झेल रहे है कि उन्हें भोग लगना भी मयस्सर नहीं है। लेकिन अफसोस इस बात का है कि आज जब परस्पर संवाद का अवसर मिला है, हासिम अंसारी जन्नत सिधार चुके है, मुस्लिमों के बीच ऐसे नेक इंसानों की कमी है, अहंकार और तर्क परोसा जा रहा है। वे भूलते है कि राममंदिर विवाद आस्था का विषय है, यह जायदाद के बंटवारे का मामला नहीं है। आस्था में तर्क कम हृदय की विशालता, संवेदशनीलता अपेक्षित होती है।

    राम जन्मभूमि जमीन के विवाद में उच्च न्यायालय अपना फैसला पहले ही दे चुका है, जिसे मान्य नहीं किया गया। अस्मिता से जुड़े मामले को दीवानी विवाद मानते हुए जो लोग अंतिम रूप से सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय की बात कहने पर अड़े है, वे मुगालते में है कि विवाद में उनके पक्ष में ही निर्णय सुनाया जायेगा। कुछ लोग देश की न्याय व्यवस्था पर इस मामले के निर्णय कराने का दायित्व थोप रहे है, उनमें दूरदर्शितापूर्ण सोच की आस्था केन्द्रित भावना और न्यायालय के प्रति सम्मान की कमी है। कमी इस बात से जाहिर हो जाती है कि वे अपनी महत्वाकांक्षा के मोह में न्यायपालिका की मर्यादा नहीं समझ पा रहे है, वास्तव में सर्वोच्च न्यायालय के माननीय मुख्य न्यायाधीश खेहर की अध्यक्षता वाली खंडपीठ का निर्णय एक आदर्श है जो दोनों पक्षों को सम्मान देता है और उनकी सदाशयता पर विश्वास करता है। राष्ट्र में समरसता का स्थायी भाव जगाता है। आत्म परीक्षण का संकेत करता है। आज समस्या यह है कि भावनात्मक विवाद न्यायालय की देहलीज पर पहुंचते है और जब लंबे खिंचने के बाद उन पर अदालत का निर्णय आता है तो सरकारें निर्णय को अमल में लाने में अपने को असमर्थ पाती है। दुनिया की महाशक्ति अमेरिका भी ऐसे हालात से गुजरा है। इसलिए भारत को सबक लेने की आवश्यकता है। अमेरिका का सर्वोच्च न्यायालय शक्तिमान है और अमेरिकी न्याय व्यवस्था हर मामले में हमारी व्यवस्था से परिपक्व और शासन व्यवस्था साधन संपन्न है। फिर भी 1930 में जब एक मामले पर निर्णय आया तो अमेरिका प्रशासन के हाथ-पैर फूल गये। तत्कालीन राष्ट्रपति रूजवेल्ट को कहना पड़ा था कि निर्णय का अनुपालन भी सर्वोच्च न्यायालय ही करे, सरकार सक्षम नहीं है। हमें भारतीय न्याय व्यवस्था की विश्वसनीयता और न्याय की अस्मिता को उस दिशा में धकेलना बुद्धिमानी नहीं कही जा सकती। देश में सर्वधर्म समभाव से सभी जी रहे है। उन्हें भावनात्मक अतिरेक में धकेलना बुद्धिमानी नहीं है।

    परस्पर विश्वास जीतकर ले-देकर इस समस्या का समाधान कर आने वाली पीढ़ी को सद्भाव से जीने, आजाद मुल्क की तरह बरताव करने, राष्ट्र की अस्मिता को कायम रखने का संदेश देना है। इसलिए अहंकार और जिद् पर अड़े रहने का यह वक्त नहीं है। मर्यादा पुरूषोत्तम श्रीराम की हम सभी संतान है, हिन्दु और मुसलमान, क्योंकि जो भारत में जन्मा है उसके आदिपुरूष श्रीराम ही थे। धर्म परिवर्तन एक आकस्मिता थी जो दंड के भय, लालच और प्रलोभन से विवशता बनी। लेकिन धर्म परिवर्तन मात्र से पुरखे तो नहीं बदल जाते। इस बात पर हमें गौरव भी महसूस करना है कि भारत ही हमारा वतन है और श्रीराम हमारे आदर्श पूर्वज है। राम मंदिर अयोध्या का हल वार्तालाप से ही निकलेगा। सर्वोच्च न्यायालय को तत्कालीन प्रधानमंत्री नरसिंहा राव के समय राष्ट्रपति जी ने कहा था कि वे समस्या का समाधान बतावें। तब सर्वोच्च न्यायलय ने दूरदर्शितापूर्ण उत्तर दिया था कि यह तो भावना का ज्वार है, इसे अपने ढंग से शांत होने दीजिये। एक कौम के रूप में हमें संकेत है कि आस्था में दखल देने के बजाय भाईचारा और बढ़प्पन का परिचय दें।
    अयोध्या मामले को मंदिर की लड़ाई कहकर हम वास्तविकता से मुंह नहीं छिपा सकते। वास्तव में यह राष्ट्रीय सांस्कृतिक जागरण का संदेश है। भारत में थोपी गयी गलत धारणाओं के अवगुंठन से सच्चाई के अविष्कार का जन अभियान है। सोमनाथ के मंदिर के निर्माण के पीछे जो राष्ट्रवाद का आवेग था, अयोध्या मामला इसका अपवाद नहीं है। लेकिन सोमनाथ का भव्य मंदिर बनाना उसके पीछे महात्मा गांधी की जबरदस्त सहमति थी। सरदार वल्लभ भाई पटेल और तत्कालीन राष्ट्रपति डाॅ. राजेन्द्र प्रसाद तो सोमनाथ मंदिर के निर्माण के बाद सोमनाथ पहुंचे और उद्घाटन के भव्य समारोह में भाग लेकर गौरवान्वित हुए थे। अयोध्या में राममंदिर के पीछे किसी दल, संगठन विशेष की भूमिका समझना न्यायसंगत नहीं है। यह सांस्कृतिक नवजागरण अपने को पहचानने का एक सात्विक अभियान बना है, जिसकी निरंतरता 1984 से दिखायी देती है। मामला आस्था बनाम कानून नहीं समझना चाहिए। बल्कि आस्था को कानून का समर्थन और सद्इच्छा के संबल की आवश्यकता है। महान भारत श्रेष्ठ भारत के नारे को सफल बनाने की परीक्षा की घड़ी है। न्यायालय के सहमति बनाने के आदेश पर असहमति दर्ज करने में साहस की आवश्यकता नहीं है। साहस इस बात का दिखाने का समय है कि राष्ट्रहित में अपनी सियासत, हार-जीत का जज्बा छोड़कर कौन आगे बढ़ता है और राष्ट्रीय भावनात्मक एकता का अमिट किरदार बनने का सौभाग्य प्राप्त करता है। साम्प्रदायिक संकीर्णता को त्याग कर आजादी की जंग जीती, लेकिन आजादी के बाद साम्प्रदायिक आधार पर विभाजन कर हम आज पराजित महसूस कर रहे है। हमारे सिर पर उजला दाग न लगे यह अहम प्रश्न है। जिस तरह मक्का मदीना पाक है, अयोध्या के प्रति हिन्दू की आस्था उसपे कम नहीं है। भारत को दुनिया ने विश्व गुरू रहने का गौरव दिया है। क्या हम एकता के हित में कुछ कर पाने में असहाय है। इस तर्क को खारिज नहीं किया जाना चाहिए कि अनेक मुस्लिम बहुल देशों में पाक मसजिदों को आवश्यकतानुसार शिफ्ट किया गया है। विवादित स्थल पर मसजिद बनाना वर्जित है, नमाज ऐसी पाक इबादत है जो कहीं पर भी अता की जाये स्वीकार्य होती है। ऐसे में सियासी ढंग से रंग देना उचित नहीं है।

    अयोध्या विवाद से लंबे समय तक संबद्ध रहे इलाहाबाद उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त माननीय न्यायाधीश पलोक वसु बताते है कि सर्वोच्च न्यायालय के ताजा आदेश के संदर्भ में सुलह के द्वार अवश्य खुलेंगे। बाबरी मजिस्द की कानूनी लड़ाई आरंभ करने वाले हासिम अंसारी ने भी इंतकाल के पहले बताया था कि कद्रदान लोग आगे आकर सुलह की राह निकालेंगे। हासिम अंसारी अंत काल में ईश्वर को प्यारें होने के पहले इस बात पर अफसोस जता रहे थे कि सियासतदां अपनी सियासत कर रहे है और रामलला कानूनी बंधन में बंधक है। जितना धन इस विवाद पर पानी की तरह बहाया गया है, उतने में अयोध्या और फैजाबाद जिला चमन बन जाता। हासिम अंसारी की सोच अल्हदा दी। इस समय उनकी आवश्यकता थी। यदि हासिम अंसारी के नेक तर्क में दम है तो ऐसा क्या कारण है कि कुछ लोग सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय की टेर लगाते समय और धन, समाज के अमन-चैन को दांव पर लगा रहे है। स्थानीय जनता ने पहल की है, दस हजार से अधिक लोगों ने एक ज्ञापन पर रजाबंदी बताते हुए कहा कि शांतिपूर्ण समाधान की दिशा में पहल हो। ज्ञापन में सचेत किया है कि पहल में स्थानीय लोगों को महत्व मिले। सियासत करने वाले लोगों को उसी तरह हाथ नहीं डालना चाहिए, जिस तरह इस ढांचे को बनाने वालों का मजहब से सरोकार नहीं था। उनका उद्देश्य समाज के विजित और विजेता के भाव को स्थायित्व प्रदान करना था। वास्तव में भारत की संस्कृति में नृपमत, लोकमत और साधुमत को मान्यता मिली है। जनता जाग चुकी है और इस मसले को लेकर जन-जन आश्वस्त है। 1992 की तरह न तो बगावती तेवर है और न जिद करने वालों को जनसमर्थन है। सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश की टिप्पणी को भी सकारात्मक ढंग से पढ़ा और सुना जाना चाहिए।

  • चार पीढ़ियों के त्याग की श्रद्धांजलि हैं मोदी

    चार पीढ़ियों के त्याग की श्रद्धांजलि हैं मोदी

    – भरतचन्द्र नायक…
    भारत में लोकतंत्र ने अंगड़ाई ली है। लोकतंत्र परिपक्वता की ओर बढ़ता नजर आया और परंपराएं ध्वस्त हुई क्योंकि जनता ने सियासी खोखलापन नापसंद कर दिया। पात्रता के अवसरवाद से मुक्ति के बाद सबका साथ-सबका सशक्तिकरण लोकबोध बनता देखा गया। अमित शाह और नरेन्द्र मोदी की इस बात को लेकर आलोचना हुई कि उत्तर प्रदेश में एक भी अल्पसंख्यक को प्रत्याशी नहीं बनाया। लेकिन मतदान करने में अल्पसंख्यक आगे रहे और कमल की नुमाइंदगी पसंद की। यहां तक कि मुस्लिम महिलाओं ने कमल के समर्थन में तमाम फतबों और दबावों को दरकिनार करके गतिशील भारत की दिशा निर्धारित कर दी। देश-विदेश के राजनैतिक विश्लेषक इस बात पर हैरान-परेशान है कि विमुद्रीकरण ने 86 प्रतिशत बड़ी मुद्रा को चलन से बाहर कर बैंकों के सामने लंबी लाईनों में जनता को खड़ा कर दिया। फिर भी जनता ने नोटबंदी के कारण क्लेशित होने के बाद भी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के समर्थन में मतदान केन्द्रों पर भी कतारों को लंबा कर दिया। कारण स्पष्ट समझ में आया कि सात दशकों तक राजनीति के दिखाऊ मधुर तेवरों में हकीकत कम फसाना अधिक रहा है। नरेन्द्र मोदी ने देश की काली अर्थव्यवस्था में नस्तर लगाया और इसके पहले ताकीद कर दी कि नस्तर से तकलीफ होगी। लेकिन बनने वाले नासूर से आप और अगली पीढ़ी सुरक्षित हो जायेगी। नतीजा सामने आया उत्तर प्रदेश देश के सबसे बड़े सूबे में कमल खिला और ऐसा विशाल जनमत लगभग पौने चार दशक बाद जनता ने परोसा। सत्ता नस्तर लगाने वालों के हाथों में सौंपकर निश्चिन्त हो गयी। पग-पग पर विरोधाभास ने नरेन्द्र मोदी का प्रेतछाया के समान पीछा किया है और नहीं कहा जा सकता है कि यह सिलसिला कहां से कब तक चलेगा? लेकिन जैसा कि वरिष्ठ नेता वैंकेया नायडू ने कहा कि मोदी देश को दैवीय वरदान (गॉड गिफ्ट) है। विरोधाभास वास्तव में उनके लिए पारस स्पर्श देता आ रहा है। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने मोदी को मौत के सौदागर के रूप में संबोधित क्या किया, गुजरात की जनता मोदी पर कुर्बान हो गयी और गुजरात में कांग्रेस का अवसान हो गया। सर्जिकल स्ट्राईक को राहुल बाबा ने सैनिकों के खून की दलाली कहकर जनता का मूड बिगाड़ दिया। पांच में से 4 राज्यों में जीत का सेहरा जनता ने मोदी के सिर बांध दिया।
    बाबरी मजिस्द विवाद के पक्षकार मोहम्मद अंसारी की गणना अल्पसंख्यकों के कट्टर पेरोकार के रूप में हुई है। लेकिन अंसारी मोदी पर ऐसे लटटू हो गये कि उन्होनें अल्पसंख्यकों का आव्हान किया और कहा कि आजादी के बाद पहला प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी हुआ जो न तो राग द्वेष रखता और न ही लोक लुभावन नारे परोसकर जनता को छलता है। उसके लिए समूची कौम एक परिवार और नजर एक है। अल्पसंख्यकों के साथ वेमुरोब्बत बात वहीं कर सकता है जो निष्कपट है। हाल का एक वाकया भी गंभीर विमर्श की अपेक्षा करता है। आतंकवाद के विस्तार में सिमी के सपोलों ने सिर उठाया। मध्यप्रदेश में 6 सपोले पुलिस के हत्थे चढ़ गये। उत्तर प्रदेश में हरकत कर पाते इसके पहले ही हुई मुठभेड़ में सैफुल्ला हला हो गया। सेकुलर ब्रिगेड चुप कैसे रहता? उसे वोटों की सियासत का मनचाहा मौका मिल गया। मुठभेड़ पर सवाल दाग दिये गये। लेकिन आतंकवादी सरगना सैफुल्ला के वालिद जनाब सरताज ने सैफुल्ला की लाश लेने और दफन करने से इंकार करते हुए कहा कि जो वतन का नहीं हुआ वह मेरा लड़का कैसे हो सकता है। सेकुलर ब्रिगेड की सियासत की सरताज ने न केवल पोल खोल दी, बल्कि नरेन्द्र मोदी द्वारा की गयी सर्जिकल स्ट्राईक के औचित्य में चार चांद लगा दिये। कांग्रेस के वे सभी नेता चुप हतप्रभ रह गये जो ऐसे मौकों को सियासत के लिए भुनाने की ताक में रहते है। उन्होनें मुंबई आतंकी घटना, बटाला हाउस एनकाउंटर पर सवाल खड़े ही नहीं किये, बल्कि मुठभेड़ में शहीद हुए रक्षाकर्मियों की शहादत का अपमान भी किया। लगातार अल्पसंख्यकों को भ्रमित करके अल्पसंख्यकों के विश्वास को सेकुलर ब्रिगेड ने डिगा दिया। अब तक सेकुलरवादियों की अल्पसंख्यकों के भावनात्मक शोषण करने की फितरतों ने सेकुलरवाद के छद्म से अल्पसंख्यक ने तौबा कर ली। इसी का दुष्परिणाम कांग्रेस, समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी को उत्तर प्रदेश के चुनाव में भोगना पड़ा। अल्पसंख्यकों के साथ दलितों, पिछड़ों, अति पिछड़ों ने भी नरेन्द्र मोदी की आर्थिक, सामाजिक नीतियों के समर्थन में एकमुश्त मतदान करने की ठान लिया। लोकसभा चुनाव 2014 में नरेन्द्र मोदी के समर्थन में भारतीय जनता पार्टी को जो समर्थन मिला था, ढ़ाई वर्ष बाद भी उसका बरकरार रहना भारतीय लोकतंत्र में विश्वसनीयता का एक अभूतपूर्व कीर्तिमान है। एंटी इन्कमबेंसी की प्रत्याशा में जो ताल ठोक रहे थे वे धराशायी हो गये। नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में उत्तर प्रदेश में तीन चौथाई से अधिक बहुमत ने देश और दुनिया को चमत्कृत किया है। राजनैतिक विश्लेषकों का मानना है कि ऐसा तीन चौथाई बहुमत विधानसभा, लोकसभा चुनाव में पीढ़ी को एक बार ही मयस्सर होता है। 1952 के चुनावों में पं. जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व में यह जीत नसीब हुई। बाद में गरीबी हटाओं देश को बचाओं जैसे आकर्षक नारे देकर इंदिरा जी को भी जनता ने मौका दिया। उनके अवसान के बाद 1984 में इंदिरा जी की दुःखद मौत के बाद जनता ने सहानुभूति वोट के रूप में राजीव गांधी को भी इस स्तर पर पहुंचाया। लेकिन 37 वर्ष बाद नरेन्द्र मोदी ने जैसा कहा कि देश की जनता की खिदमत में उनका 56 इंच का सीना चट्टान की तरह आगे रहेगा। उन्होनें 16वीं लोकसभा के चुनाव और उत्तर प्रदेश की 16वीं विधानसभा के चुनाव में अप्रत्याशित जीत हासिल कर साबित कर दिया कि वे सेवादारों की सैना में यदि सेनापति है तो बेरेक में रहकर हुक्म चलाना नहीं जानते, सीना मोर्चा पर हमेशा आगे रहता है। ‘न खाऊंगा न खाने दूंगा’, न चैन से बैठूंगा और न दूसरों को बैठने दूंगा। छाती ठोककर प्रमाणित कर दिखाया है। नरेन्द्र मोदी का कद पं. नेहरू, इंदिरा गांधी से आगे नहीं तो, पीछे भी नहीं है। यह अतिश्योक्ति नहीं। सात समन्दर पार विश्व संचार माध्यम जो अब तक नरेन्द्र मोदी के खिलाफ विष वमन करने में अग्रणी थे, वे ही फरमा रहे है कि नरेन्द्र मोदी की भारत की जनता ऐसी मुरीद है कि 2019 में 17वीं लोकसभा चुनाव में कमल खिलाने को आतुर है। आहट सोलहवीं विधानसभा (उ.प्र.) चुनावों से कर्णगोचर हो चुकी है। समाजशास्त्रियों, राजनैतिक विश्लेषकों और वरिष्ठ सियासतदारों का मानना है कि नरेन्द्र मोदी ने समाज के बिखराव के जो कारक अभी तक राजनेताओं ने ईजाद किये थे, उन्हें झुठला दिया है। उनकी नीतियों से पात्रता क्रम मिट चुका है। उन्होनें सबका साथ-सबका सशक्तिकरण मूलमंत्र साबित किया है। चाहे जन-धन योजना हो, मुद्रा बैंक योजना हो, उज्जवला योजना और 79 प्रकार की जो भी जन हितकारी योजनाएं है, उनमें एक ही सांचा है। भारत का नागरिक, शोषित, पीडि़त, वंचित, गरीब, अबाल, वृद्ध नर-नारी, किसान, मजदूर, युवा, महिला सब एक समान न्याय और समानता के अधिकार के हकदार है। पूर्ववर्ती कांग्रेस की यूपीए सरकार के प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने योजना भवन दिल्ली में बैठकर यह कहकर कि देश की संपदा पर पहला अधिकार अल्पसंख्यकों का है, अलगाव के बीज बो दिये थे। लेकिन नरेन्द्र मोदी ने लाग-लपेट बिना कहा कि देश की संपदा पर पहला अधिकार सवा अरब जनता का है, लेकिन प्राथमिकता में गरीब सर्वोच्च है। इसी का नतीजा है कि भारतीय जनसंघ के संस्थापक पं. दीनदयाल उपाध्याय के जन्मशताब्दी समारोह के वर्ष को नरेन्द्र मोदी ने देश के वंचितों, गरीबों को समर्पित कर गरीब कल्याण वर्ष के अनुरूप कार्यक्रम का संचालन किया है। नरेन्द्र मोदी को गरीबों में मसीहा की निगाह से देखे जाने के पीछे एक वजह यह है कि मोदी ने कहा है कि गरीब को राहत, डोल की जरूरत नहीं है। उसे ऐसे अवसर और परिस्थिति चाहिए जिसमें गरीब अपना बोझ उठा सके। इसका नतीजा यह होगा कि देश के मध्यम वर्ग के सिर का बोझ कम होगा। देश के संचालन में किफायत होगी और कराधान उदार मॉडल में पहुंच जायेगा। वास्तव में नरेन्द्र मोदी ने सामाजिक न्याय और सेकुलरवाद को ऐसा परिभाषित कर दिखाया है कि समाजवाद, वामपंथ और अन्य सभी वाद भूलुंठित हो चुके है। उत्तर प्रदेश में नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में आशातीत विजय के एकाधिक कारण है जो अन्य दलों के लिए सबक बन सकते है। विजय के रूप में उत्तर प्रदेश की परिघटना में केन्द्र सरकार और भाजपा संगठन का मेलजोल का अपूर्व संगम रहा है। मोदी ने जहां राष्ट्रहित में संकुचित स्वार्थ को बलि चढ़ाने का साहस दिखाया और नोटबंदी करके अमीरांे और गरीबों को एक कतार में खड़ा करते हुए कहा कि आने वाले कल के लिए आज कुर्बान करना होगा। जनता ने तकलीफ भोगी लेकिन गरीब समझ गये कि देश के माफिया, भ्रष्टाचारी सब नोटबंदी के निशाने पर आ चुके है। विपक्ष ने जनता को बहकाने, विरोध करने के लिए उकसाया लेकिन जनता ने राष्ट्रीय हित में मोदी का साथ दिया। भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने संगठन में केन्द्रीय कार्यालय से मतदान केन्द्र तक ऐसा संगठनात्मक ताना-बाना बुन डाला और पार्टी की सदस्य संख्या 12 करोड़ पहुंचाकर भारतीय जनता पार्टी को दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी में गणना करा दी। देश में ऐसी परिस्थति बनी कि जनता ने महसूस किया कि यदि हम अपना और आने वाली पीढ़ी का भविष्य चाहते है तो राष्ट्रवाद की परिभाषा गढ़ें। राष्ट्रवाद के नाम पर नाक-भौंह सिकोड़ने वालों से देश को अधिक जोखिम है, जितना बाहर से नहीं। देश में सामाजिक, आर्थिक सुधार का जो सिलसिला आरंभ हुआ है, उससे दुनिया में भारत की साख में चार चांद लग गये है। श्री नरेन्द्र मोदी अंतर्राष्ट्रीय फलक पर नेता के रूप में स्थापित हो चुके है। विश्व शक्तियां भारत की ओर टकटकी लगाये है। 2014 के लोकसभा चुनाव में कमल की विजय के 32 माह बाद यदि उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड में भारतीय जनता पार्टी का परचम शान से फहराया गया है तो मानना पड़ेगा कि नरेन्द्र मोदी युग का प्रादुर्भाव हो गया है। यह युग आरंभ तो हो गया है इसका सुदीर्घ भविष्य भी है। सुनहरा भविष्य भाजपा के लिए ही नहीं सवा अरब जनता के कल्याण के लिए समर्पित। नरेन्द्र मोदी ने सादा जीवन-उच्च विचार का जो सामाजिक, राजनैतिक, आर्थिक दर्शन गढ़ा हे, वास्तव में यह भारतीय जनसंघ और पार्टी के उन महामना नेताओं, जिनकी चार पीढ़ी खप गयी है, के प्रति सच्ची भावांजलि है।

  • विश्व बंधुत्व का उत्तम प्रदेश

    विश्व बंधुत्व का उत्तम प्रदेश

    आजाद हिंदुस्तान में भारतीय जनता पार्टी ने कई गैर कांग्रेसी सरकारें दी हैं। अन्य राजनीतिक दलों को भी गैर कांग्रेसी शासन देने का अवसर मिला है। इसके बावजूद कभी भारतीय संस्कृति का उद्घोष करती सरकारें अपने मुखौटे के साथ अवतरित नहीं हो सकीं हैं। मध्यप्रदेश को भारतीय संस्कृति पर आधारित राजनैतिक व्यवस्था देने वाली प्रयोग शाला के रूप में जाना जाता रहा है। यहां का चित्रकूट ग्रामोदय विश्वविद्यालय तो भारतीय संस्कृति पर आधारित राजनैतिक व्यवस्था की सबसे उत्कृष्ट लैब कहा जाता रहा है। इसके बावजूद जब उमा भारती के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी की विशाल बहुमत वाली सरकार बनी तो वो फार्मूला बुरी तरह फेल हो गया। उमा भारती जिस जन, जंगल, जमीन, जानवर और जल का नारा लेकर सत्तासीन हुईं थीं वो फार्मूला विश्व आर्थिक प्रवाह के सामने न टिक सका। उमा भारती को बदलकर भाजपा ने बाबूलाल गौर के गोकुल ग्राम का सूत्र दिया वो भी न टिक सका और अंततः भाजपा को कांग्रेस के पूर्व निर्धारित विदेशी कर्ज आधारित विकास का माडल ही अपनाना पड़ा। इस माडल पर पिछले तेरह सालों से मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान सफल सरकार चला रहे हैं। मध्यप्रदेश पर कर्ज का भार जरूर बढ़ा है लेकिन ढांचागत विकास के पैमाने पर भाजपा की सरकार ने भरपूर लोकप्रियता बटोरी है। कर्ज का ब्याज चुकाने के लिए सरकार ने अपने संसाधनों का दोहन बढ़ाया है। टैक्स जुटाने के तरीके भी बदले हैं और प्रदेश की आय में भारी इजाफा किया है। इसके बावजूद वह रोजगार के साधन बढ़ाने के मोर्चे पर संघर्ष कर रही है। वजह साफ है कि प्रदेश में उत्पादकता का तंत्र आज भी आत्मनिर्भर नहीं बन पाया है।यही वजह है कि मध्यप्रदेश की सरकार भले ही आनंद मंत्रालय के माध्यम से लोगों के दिलों में खुशियों भरा गुब्बारा फुलाने में जुटी हो पर यहां के जन मानस के बीच रह रहकर बढ़ती मंहगाई की कराह सुनाई देती रहती है।
    यूपी में भाजपा को इसी कसौटी पर परखा जा रहा है। पंजाब में मरती कांग्रेस को जीवनदान मिल जाने की वजह भी शायद यही रही है कि भाजपा की सरकारें जनता के बीच आनंद का भाव नहीं जगा पा रहीं हैं। ये बात सही है कि देश की युवा पीढ़ी कांग्रेस से मुक्ति चाहती है। वो कांग्रेस को अब ढोना नहीं चाहती। कांग्रेस कोई भी मुखौटा लगाए वो अब उसके कथित सामाजिक सद्भाव के छलावे में नहीं आना चाहती। कांग्रेस के नेता जब जब भाजपा पर असहिष्णु और साम्प्रदायिक होने के आरोप लगाते रहे हैं तब तब जनता भाजपा को सिर आंखों पर बिठाकर सत्ता में पहुंचाती रही है। यूपी की जनता ने भी लामबंद होकर समाजवादी पार्टी की पाखंडी राजनीति को धूल चटाई है। विकास बोलता के नारों को धूल धूसरित करते हुए जनता ने कोई संशय नहीं किया और भाजपा को दो टूक फैसला सुनाते हुए सत्ता में भेजा है। बहन मायावती के जातिवादी झांसे में न आकर दलित राजनीति की जो सच्चाई सामने आई उससे भी राजनीतिक पंडितों के अरमान धराशायी हो गए हैं।
    इन सबसे अलग योगी आदित्य नाथ लगातार आगे बढ़ते हुए जनता की कसौटी पर खरे उतरते गए। जो गोरखपुर कभी अपने माफिया आतंक के लिए जाना जाता था वहां हिंदु मुस्लिम सद्भाव की मिसाल कायम करके सकारात्मक राजनीति की आधारशिला रखने वाले योगी आज भरोसे की अग्निशिखा के रूप में सबके सामने हैं। इस हवन कुंड में सबके नाम की आहुतियां पड़ रहीं हैं। यूपी आज एकजुट है। विकास के पथ पर आगे बढ़ने के लिए तैयार है। इसके बावजूद भाजपा से लंबा दुराव रखने वाले जो राजनेता दुष्प्रचार में जुटे हैं उन्हें अब जनता ने जवाब देना शुरु कर दिया है। लोग सोशल मीडिया पर आकर बता रहे हैं कि उन्होंने जो फैसला किया है वो सोच समझकर किया है। उन्होंने सक्षम नेतृत्व को चुना है और उन्हें पूरा भरोसा है कि ये नेतृत्व यूपी के लिए हितकारी साबित होगा।
    यूपी के चुनाव में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने जनता को जिस विकास का भरोसा जताया है वह कोई लौह पुरुष ही साकार कर सकता है। अब तक पटरी से उतरकर घिसटती रही यूपी की राजनीति को बदलना किसी आम राजनेता के बस की बात है भी नहीं। न तो वहां जाति के आधार पर दिया गया नेतृत्व कारगर हो सकता है और न ही फार्मूलों से सरकार चलाई जा सकती है। वहां तो सख्त और कुशल प्रशासक की ही जरूरत रही है। ऐसा शासक जो राजनैतिक षड़यंत्रकारियों की गीदड़ भभकियों के सामने जरा भी न सकुचाए। आज जो लोग मुख्यमंत्री योगी आदित्य नाथ पर दर्ज पुराने मुकदमों का हवाला देकर लांछन लगाने की कोशिश कर रहे हैं वे उनके लिए अमृत की बूंदें साबित हो रहे हैं। जनता जानती है कि तब योगी ने किस जांबाजी के साथ कानून व्यवस्था को बचाने में लोहे की दीवार बनकर जनता का साथ दिया था। आज यूपी की जनता को भरोसा है कि योगी के रूप में उन्हें एक सक्षम नेतृत्व मिल गया है। जाहिर है कि इन हालात में जनता का आशीर्वाद उत्तर प्रदेश को उत्तम प्रदेश बनाने में कोई कसर छोड़ने वाला नहीं है।

  • कल्याणी को गौरवी बनाने का समय

    कल्याणी को गौरवी बनाने का समय

    जड़ता को तोड़ना बड़ी बात होती है। समाज की जड़ता को तोड़ना तो आसमान से तारे तोड़ लाने जैसा दुष्कर कार्य है। ये संतोष की बात है कि मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की सरकार कभी कभी खुद के होने का अहसास भी करा देती है।इसी तरह का संतोषजनक अहसास सरकार ने विधवा शब्द को विलोपित करने का कदम उठाकर दिलाया है। सरकारी कामकाज में अब विधवा शब्द की जगह कल्याणी शब्द का इस्तेमाल किया जाएगा। उम्मीद की जानी चाहिए कि जिस तरह प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने विकलांग शब्द को हटाकर दिव्यांग प्रयोग करके देश की आबादी के बड़े हिस्से में गौरव जगाने में सफलता पाई उसी तरह कल्याणी शब्द समाज की आधी आबादी के माथे पर दुर्भाग्यवश लगने वाले कलंक को जरूर धो पाएगा। महिला और बाल विकास मंत्री अर्चना चिटनिस जब विधानसभा के शून्यकाल में सरकार के इस प्रयास का उल्लेख कर रहीं थीं तब उनके चेहरे पर खासा संतोष और गौरव का भाव झलक रहा था। बेशक उन्हें महिला जन प्रतिनिधि होने के नाते ये आजीवन संतोष करने लायक अवसर था। उन्होंने राजनीति के माध्यम से समाज को करीब से समझा है। वे जानती हैं कि हमारे पुरुष प्रधान समाज में स्त्री की स्वतंत्र चेतना को किस तरह अवसरों की बाट जोहना पड़ती है। महिला के सामने चुनौती होती है कि पहले तो वह खुद को अविचलित बनाए तब कहीं जाकर समाज के उत्पादक या रचनात्मक कार्य से जुड़ पाए। देश और समाज की उत्पादकता बढ़ाने में ये लिंग भेद बड़ी दीवार बनकर रुकावट पैदा कर रहा है। सदियों से हमारे समाज में स्त्री और पुरुष की भूमिका को दायरे में बांधकर देखा जाता रहा है। जब पारंपरिक समाज था तब भले ही ये दायरे उचित प्रतीत होते रहे हों पर आधुनिक दौर में ये वर्गीकरण निश्चित रूप से काफी मंहगा सौदा है। जब हमारी सारी गतिविधियां आर्थिक उत्पादकता बढ़ाने में ऐड़ी चोटी का जोर लगा रहीं हों तब हम स्त्री और पुरुष के रूप में समाज की शक्ति को बांटकर देखें ये न तो न्यायोचित है और न ही व्यावहारिक । सदियों से भारत में स्त्री की भूमिका को घरों में ही समेटकर रखने की प्रवृत्ति घुमड़ती रही है। समय समय पर कुछ बहादुर महिलाओं ने धारा का रुख मोड़कर भी दिखाया है पर ये बदलाव स्थायी नहीं हो पाया, क्योंकि उसका उदय किसी न किसी व्यक्तित्व के इर्द गिर्द ही होता रहा है। पहली बार किसी बहुमत प्राप्त लोकतांत्रिक सरकार ने इस तरह का बदलाव लाने की पहल की है। निश्चित रूप से इस पहल का स्वागत करना होगा।इसके लिए महिला विकास मंत्री अर्चना चिटनिस और मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को बहुत बहुत साधुवाद। इस बदलाव के साथ सरकार की चुनौतियां और भी ज्यादा बढ़ गईं हैं। पति की असमय मृत्यु होने के वक्त अक्सर महिलाएं आत्मनिर्भर नहीं होती हैं। वैसे तो पुरुष भी बड़ी तादाद में आत्मनिर्भर नहीं हो पाए हैं। लोकतांत्रिक सरकारों की ये बड़ी असफलता रही है कि उन्होंने समाज के पैतृक व्यवसाय बंद करा दिए हैं और नए व्यवसाय सृजित नहीं कर पाई हैं। इन हालात में महिलाओं के दैनंदिनी खर्चों के लिए किसी रोजगार का ढांच खड़ा करना फिलहाल संभव नहीं दिखता है। सरकारी नौकरी में कृपा करके भर्ती करना निहायत मूर्खता भरा कदम साबित हुआ है जो पिछली कांग्रेस की सरकारों की नाकामी के जीते जागते सबूत के रूप में हमारे इर्द गिर्द रोज देखा जा सकता है।एनजीओ में नौकरी देकर भी ज्यादा महिलाओं को आत्मनिर्भर नहीं बनाया जा सका है। एकमुश्त राशि देकर या पेंशन देकर भी कल्याणी की सेवा करना कर्ज मे डूबी मध्यप्रदेश सरकार के लिए भी फिलहाल संभव नहीं दिखता। फिलहाल तो विधवा के कल्याणी बनने पर इतना ही संतोष किया जा सकता है कि उसे सामाजिक तिरस्कार से तो बचाया जा सकेगा। कल्याणी शब्द में जो सेवा भाव छिपा है उसके चलते स्त्रियों को नई किस्म की परेशानियों का भी सामना करना पड़ सकता है। सोचने लायक बात है कि बगैर पढ़ी लिखी, जायदाद से वंचित, शारीरिक रूप से अशक्त, छोटे छोटे बच्चों के पालन के बोझ से दबी हुई स्त्री कैसे कल्याणी बन सकती है। जब उसे ही देखभाल की जरूरत हो तो उसे मजबूर होकर कई बार समाज के क्रूर हाथों में खेलने पर मजबूर होना पड़ जाता है। फिर धीरे धीरे वह विधवा से कुलटा बन जाती है और जीवन की शाम उसे काशी के विधवाश्रमों में ही बिताना पड़ती है। सरकार को सोचना होगा कि कल्याणी शब्द की आड़ में क्या उसे देह का सौदा करने के लिए मजबूर तो नहीं किया जाने लगेगा। वास्तव में जब जीवन की दौड़ में स्त्री अकेली पड़ जाती है तब उसे अपने पैरों पर खड़े होना सबसे पहली प्राथमिकता होती है। क्या सरकार इस दिशा में भी कोई कदम उठाने जा रही है। सरकारी नौकरी इसका कोई समाधान नहीं है। एनजीओ के भरोसे बैठे रहना भी संभव नहीं है। वास्तव में सरकार को रोजगार मूलक वे प्रयास शुरु करने होंगे जिनसे न केवल स्त्री बल्कि कोई पुरुष भी बेकार न बैठा रहे। उसके हाथों को इतना काम तो जरूर मिले कि वह अपना और अपने परिवार का भरण पोषण कर सके। जब ये हालात बन जाएं तब जरूर कहा जा सकता है कि स्त्री भी अपनी शान कायम रख सकेगी। कल्याणी शब्द फिलहाल कुछ ज्यादा ही नरम दिखाई दे रहा है। सरकार की जवाबदारी है कि वह उसे अबला न बनने दे। सबला न भी बना पाए तो कम से कम उसे गौरवी तो जरूर बना रहने दे।

  • बीड़ी मजदूरों की भी पंचायत होः शैलेन्द्र जैन

    बीड़ी मजदूरों की भी पंचायत होः शैलेन्द्र जैन


    भोपाल, 08 मार्च। सागर विधानसभा क्षेत्र के विधायक शैलेन्द्र जैन ने आज श्रम विभाग के बजट पर चलने वाली चर्चा में कहा कि मैं जिस क्षेत्र से आता हूं वहां पर बीड़ी श्रमिकों की 33 हजार की संख्या है पूरे जिले में 66 हजार बीड़ी श्रमिक हैं. प्रदेश में अनेक तरह की पंचायतें हुईं उनके माध्यम से उनकी समस्याओं को दूर करने की दिशा में काम हुआ है, लेकिन बीड़ी श्रमिकों की पंचायत घोषणा करने के बाद भी अभी तक नहीं हो पाई है.

             उन्होंने कहा कि मैं समझता हूं कि कम लागत में अधिकतम लोगों को रोजगार दिया जा सकता है. यह संसार में अगर कोई कर सकता है तो बीड़ी उद्योग है. मैं मंत्री जी से कहना चाहता हूं कि यह पंचायत बुलायी जाये. बीड़ी श्रमिकों की प्रदेश में बहुत अधिक संख्या है उनका कोई सम्मेलन यहां भोपाल में बुलाया जाये, यह उचित नहीं होगा. उनकी पंचायत सागर में या और कहीं पर की जाए जहां पर उनकी संख्या बहुत अधिक हो तो उसका लाभ बीड़ी श्रमिकों को होगा.

             श्री जैन ने कहा कि अभी तक बीड़ी श्रमिकों के आवास के लिये शासन ने 40 हजार रूपये के अनुदान की व्यवस्था की थी,हालांकि उस योजना में केन्द्र का योगदान बहुत ज्यादा है उसको बढ़ाकर के डेढ़ लाख रूपये प्रति हितग्राही कर दिया गया है. मैं इस बात के लिये केन्द्र सरकार एवं मध्यप्रदेश की सरकार को बधाई देना चाहता हूं. यह बीड़ी श्रमिकों के हित में एक अच्छा कदम है, लेकिन मैं यह मानता हूं कि अभी भी महंगाई के दौर में डेढ़ लाख रूपये कम है. हमने प्रधानमंत्री आवास योजना में देखा कि इस तरह के हितग्राहियों के लिये ढाई लाख रूपये की योजना है. वह व्यक्ति जो संनिर्माण कर्मकार मण्डल रजिस्टर्ड हैं उनको लगभग साढ़े तीन लाख रूपये अनुदान देने की व्यवस्था है तो मैं समझता हूं कि बीड़ी श्रमिकों के लिये डेढ़ लाख रूपये की जो राशि है वह कम है उसको बढ़ाकर के कम से कम 2 लाख रूपये किया जाये.

    उन्होंने कहा कि सागर में एक बीड़ी कामगार अस्पताल है वह काफी पुराना है, लेकिन यह देखने में आया है कि उस अस्पताल में इन्डोर पेशन्ट की भर्ती करने की व्यवस्था नहीं है जिसके चलते बीड़ी श्रमिक काफी परेशान होते हैं. वहां ओपीडी की संख्या तो अच्छी हो रही है, लेकिन एडमीशन कम हो पाते हैं. वह इस दिशा में काम करें. वहां स्वस्थ्य संबंधी उपकरणों की निहायत कमी है जांच कराने के लिए श्रमिकों को बाहर की अस्पतालों में तथा शासकीय अस्पतालों का सहारा लेना पड़ता है. बीड़ी श्रमिकों के हित में अगर अस्पतालों के उन्नयन काम करेंगे तो बहुत अच्छा होगा.

  • हिन्दुत्व से परहेज जनता से धोखाः जन-न्याय दल

    हिन्दुत्व से परहेज जनता से धोखाः जन-न्याय दल

    सागर/8 मार्च/ आर.एस.एस, विहिप संत-समाज सहित हिन्दुवादी संगठनों की प्रेरणा और सहयोग से बहुसंख्यक हिन्दुओं के वोटों के सहारे प्रचण्ड बहुमत पाकर केन्द्र में सरकार बनाने वाली भाजपा अब अपनी घोषित राष्ट्रवादी-हिन्दुत्व की नीतियों के विपरीत जाकर कांग्रेस की ही नीतियों को स्वीकार करने में ज्यादा रूचि दिखा रही है। यह कांग्रेस को देश की सत्ता से उखाड़ फेंकने में सहयोग करने वाली जनता के साथ धोखा है।
    यह बात आज पत्रकारवार्ता में राजनैतिक पार्टी जन-न्याय दल के राष्ट्रीय अध्यक्ष एडवोकेट बृजबिहारी चैरसिया ने कही। उन्होंने कहा कि हिन्दुत्व के मुद्दों को सिर्फ अपने स्वार्थो की पूर्ति के लिये इस्तेमाल करने वाली भाजपा को अब संघ की नीतियों को स्वीकार करने से परहेज करना मंहगा पड़ेगा। उन्होंने कांग्रेस की नीतियों को अंगीकार करती जा रही भाजपा से सवाल किया है कि अब जनता के सामने यह स्पष्ट करें कि उसकी राष्ट्रवादी सोच देश के लिये आवश्यक है या कांग्रेस की नीतियां। एक सवाल के जबाब में उन्होंने कहा कि उनकी पार्टी का आर.एस.एस. से किसी भी प्रकार का संबंध नहीं है मगर संघ के हिन्दु सशक्तिकरण व एकजुट करने की वैचारिक-सोच को हम राष्ट्रीय आवश्यकता मानते हैं।
    मंदिर निर्माण के मुद्दे पर उन्होंने कहा कि देश की जनता अयोध्या में भव्य राम मंदिर निर्माण के नाम पर पिछले दो दशकों से ठगी जा रही है जिससे आस्थावान राम भक्त भारी सदमे में है। उन्होंने कहा कि गौ-हत्या पर कानूनी प्रतिबंध भी अब सिर्फ भाजपा का जुमला बनकर रह गया है। देश में प्रतिदिन हो रही लाखों गायों की हत्या को उन्होंने चिंताजनक बताया। उन्होंने आश्चर्य जताते हुए कहा कि अब तो गौ-रक्षा करने वाले गौ-सेवकों को ही भाजपा के नेता फर्जी बताने लगे हैं। पत्रकारों से उन्होंने कहा कि राम राज्य की कल्पना में अपराध, शोषण व मंहगाई और भ्रष्टाचार का कोई स्थान नहीं होना चाहिये। लेकिन केन्द्र की भाजपाई सरकार की इन मुद्दों पर असफलता ने पौने तीन साल में ही देश की जनता को अंदर तक हिलाकर रख दिया है।
    एक सवाल के जबाब में उन्होंने कहा कि सभी जानते है कि आर.एस.एस. का वैचारिक आंदोलन छल-कपट की राजनीति से दूर रहकर राष्ट्रवादी ताकतों को मजबूत करने और गरीबों- पिछड़ों से उनके कल्याण के लिये किये गये वायदों को पूरा करने में भरोसा रखता है। लेकिन इसके ठीक विपरीत भाजपा के नेता सत्ता में आने के बाद से ही जनता के कल्याण के स्थान पर अगली बार पुनः सत्ता में काबिज होने की जुगत में लग गये है। इसके लिये ये कांग्रेस की तरह ही अल्पसंख्यक तुष्टिकरण की दिशा में जाने से भी परहेज नहीं कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि राष्ट्रवाद के उद्देश्य से चुनाव जीती भाजपा का अब एक मात्र लक्ष्य सिर्फ चुनाव जीतना रह गया है। जिसके लिये अब वह विकास, मोदी की छवि, जातीय गणित और लुके-छिपे हिन्दूवाद की चार नावों पर सवार है।
    उन्होंने राम भक्तों, गौर-रक्षकों, संत समाज और हिन्दुवादी संगठनों से अपील की है कि वे भाजपा पर दबाब बनाये जिससे गरीबों- पिछडों से किये वायदों को वह पूरा करे। उन्होंने कहा कि जनादेश का सम्मान करते हुये संसद में कानून बनाकर तत्काल राम मंदिर बनाने, गौ- हत्या रोकने कानून बनाने आदि का मार्ग प्रशस्त करे। नोटबंदी के सवाल पर चैरसिया ने कहा कि हमें देश की अर्थव्यवस्था पर इसके परिणामों के आकलन के लिये डेढ़ वर्ष का इंतजार करना चाहिये। उन्होंने कहा कि भाजपा सरकार को अब कांग्रेस के समय हुये घोटालों की चुनावी राग अलाप बंद करके जनता को बताना चाहिये कि उसने किन-किन घोटालेबाजों को अब तक जेल भेजा है। विदेशी कालाधन देश में लाने के लिय क्या काम किया है। बेरोजगारों को कितने रोजगार दिलाये है।