
भोपाल 5 नवंबर(पीआईसीएमपीडॉटकॉम)। सिमी आतंकवादियों ने भोपाल जेल की दीवार तो फांद ली लेकिन भोपाल पुलिस की चौकस निगाहों ने उन्हें कानून को लतियाने की उचित सजा देकर अपनी मुस्तैदी का सबूत भी दे डाला। इस मुठभेड़ की जितनी प्रशंसा की जाए कम है। इसलिए जो लोग जेल से हवलदार की हत्या कर भागे आतंकवादियों को टपका देने पर मरसिया पढ़ रहे हैं उनकी बातें रद्दी की टोकरी में फेंकने लायक हैं। मगर इस पर तो विचार करना ही होगा कि कानून से खिलवाड़ करने का ये साहस किसमें, कैसे और क्यों पलता रहा है।
मध्यप्रदेश की जेलें अपनी सुधारात्मक गतिविधियों के लिए जानी जाती हैं। यहां ये माना जाता है कि बुरा आदमी गलत शिक्षा का नतीजा होता है । जब कानून किसी को दोषी ठहराए तो जेलों में ले जाकर उन्हें नए सिरे से संस्कारित किया जा सकता है। इसलिए मध्यप्रदेश की जेलों को सुधारगृह कहा जाता है। होशंगाबाद में तो खुली जेल का जो प्रयोग किया गया वो सबसे सफल प्रोजेक्ट रहा है। जेल प्रशासन हमेशा से जेलों में इतने बुलंद अफसरों को तैनात करता रहा है कि वे समाज के कबाड़ कहे जाने वाले अपराधियों को मुख्य धारा में चलने लायक जरूर बना देते थे। पिछले कुछ सालों में जेलों की ये साख खंडित हुई है। इसकी वजहों पर विचार किए बिना मध्यप्रदेश की सरकार, प्रशासन और प्रेस जिस तरह हवा हवाई उपाय सुझा रही है उससे कहा जा सकता है कि सुशासन का दावा करने वाली मध्यप्रदेश की सरकार कांग्रेस की लचर सरकार के मुकाबले लाचार अधिक साबित हो रही है।
जब भी कोई मुठभेड़ होती है और पुलिस की गोली से एक भी अपराधी मारा जाता है तो उस मामले की मजिस्ट्रीयल जांच की जाती है। जाहिर है भोपाल जेल से भागे सिमी आतंकवादियों की हत्या के मामले में भी न्यायिक जांच ही एक मात्र कानून सम्मत कदम है। इसके बावजूद एसआईटी के गठन, एनआईए, सीबीआई , सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश जैसी संस्थाओं से जांच की बात करके इस मामले का राजनीतिकरण किया जा रहा है। सरकार की इच्छा का सम्मान करते हुए पुलिस महानिदेशक ऋषि कुमार शुक्ला ने एसआईटी के गठन की घोषणा भी कर दी. उन्होंने बताया कि एसआईटी की तीन सदस्यीय टीम का नेतृत्व सीआईडी के एसपी अनुराग शर्मा करेंगे और वो पूरे मामले की रिपोर्ट पुलिस हेडक्वाटर को सौपेंगे.मुठभेड़ कांड के बाद मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने पूर्व पुलिस महानिदेशक नंदन दुबे को मामले की जांच करने भेजा था लेकिन बाद में उन्हें इस प्रक्रिया से हटा दिया गया। उनके खिलाफ प्रदेश के पुलिस थानों में रिलायंस जियो कंपनी को फ्री में टावर लगाने का मामला उच्च न्यायालय में विचाराधीन है। इस सौदे में प्रदेश को कथित तौर पर 1400 करोड़ रुपए की क्षति पहुंचाई गई थी। सुप्रीम कोर्ट उनके खिलाफ काफी पहले स्ट्रक्चर पारित कर कह चुका है कि उन्हें किसी बड़े पद पर नहीं रखा जाना चाहिए। इसके बावजूद प्रदेश सरकार ने उन्हें डीजीपी बनाया और रिटायर होने के बाद एक निगम में पुनर्वासित भी कर दिया। जबकि हकीकत ये है जेल तोड़ने की साजिश भी तबसे रची जा रही थी जबसे वे पुलिस महानिदेशक रहे । उन्होंने अपने प्रिय अफसर सुशोभन बैनर्जी को डीजी जेल बनवाया था। उनके कार्यकाल में ही खंडवा जेल से सिमी के आतंकवादी फरार हुए थे। जब मार्च 2015 में सुशोभन बैनर्जी को डीजी जेल बनाया गया तबसे सिमी आतंकवादियों को मिलने वाली सहूलियतें भी बढ़ गईं थीं।
सुशोभन बैनर्जी मूलतः कलकत्ता के रहने वाले आईपीएस अफसर हैं। जिनका अपराध और कानून की दुनिया से कभी कोई रिश्ता नहीं रहा। तीसरे प्रयास में वे प्रशासनिक सेवा की परीक्षा पास कर सके थे। वे क्रिकेट खिलाड़ी रहे हैं और नौकरी में आने से पहले वे क्रिकेट ही खेलते रहते थे। कालेज के दिनों में ही वे शरीर सौष्ठव और फिल्मों नाटकों में अभिनय से जुड़ गए और नौकरी के दौरान फिल्मों में अभिनय करते रहे। नंदन दुबे जैसे अफसरों की मेहरबानी से उन्होंने मुंबई में घुमक्कड़ी की नौकरी की और उनकी पत्नी ने वहीं अपना कारोबार भी फैलाया। आज उनकी पत्नी मुंबई में बड़ा कारोबार चलाती हैं और बेटा फिल्मों में अभिनय करता है। सुशोभन बैनर्जी ने डीजी जेल की नौकरी भी पूरी तरह पार्ट टाईम जॉब की तरह की। जेल अधीक्षकों और जेलरों को कथित तौर पर टारगेट दिए गये थे कि वे अपने बजट का लगभग पचास फीसदी हिस्सा बचाकर चंदे के रूप में पेश करें। ये नजराना वसूलने वे स्वयं जाते थे। नतीजा ये हुआ कि आज जेलों में कैदियों को मिलने वाला 70 फीसदी बजट गुल्ली हो जाता है। कैदियों को सुविधाएं खरीदने के भरपूर मौके दिए जाते हैं।जेलों को सुरक्षा बढ़ाने के निर्देश कागजों पर हमेशा दिए जाते रहे लेकिन फील्ड पर हकीकत कुछ और थी। आज जो मीडिया सुशोभन बैनर्जी को हटा दिए जाने के बाद उनकी शान में कशीदे पढ़ रहा है उसे ये हकीकत पता करने में जरा भी रुचि नहीं है कि सुशोभन बैनर्जी ने डीजी जेल रहते हुए उनके सत्कार पर जो रकम खर्च की वो उन्होंने कहां से जुटाई थी। जिन अफसरों ने उनके इशारे पर चलने से इंकार कर दिया उनके खिलाफ विभागीय जांचें शुरु कर दीं गईं। उन्हें निलंबित भी किया गया। जेलों के प्रभार से भी हटा दिया गया।
सुशोभन बैनर्जी की रुचि चंदा वसूलने और उसकी रकम मुंबई में पत्नी के कारोबार में लगाने बेटे को फिल्मों में काम दिलाने में तो रही ही है साथ में वे जेल में बंद महिला कैदियों में भी खासी दिलचस्पी लेते रहे हैं। जेलरों और अफसरों को कथित तौर पर निर्देश रहते थे कि वे जेलों में बंद खूबसूरत और चालाक किस्म की महिला अपराधियों को भी पेश करें। सूत्र बताते हैं कि वे अपने दौरों में शराब और शबाब के बीच महिला कैदियों से फिल्मों के लिए कहानियां भी तलाशते रहते थे। समय समय पर अपने मीडिया इंटरव्यू में वे कहते रहे हैं कि वे समाज में महिलाओं की स्थितियों को बदलने के लिए फिल्म बनाना चाहते हैं। उनके इस कथित रंगीलेपन की कहानियां जेलों में आम हो गईं थीं। यही वजह है कि जेलों में कैदियों को सुविधाएं बेचे जाने और उनसे चंदा उगाहने की परंपरा का एक नया युग शुरु हो गया था। जेलों के प्रहरी डीजी जेल के महिला प्रेम की कहानियां भी चटखारे लेकर सुनाते थे और यही वजह जेलों में गुंडागर्दी बढ़ने की असली वजह बनी। एक चर्चित जेल अधिकारी से उनकी करीबियां पूरे महकमे को मालूम है। यही महिला अधिकारी उनके नाम पर जेलों के अफसरों से चंदे के फरमान सुनाती रहती थी। जो अफसर सुनते उन्हें बजट और प्रभार भी मिल जाते और जो नहीं सुनते वे निलंबन की सजा भोगते।
सिमी आतंकवादियों से मुठभेड़ कांड की जांच करने वाले अधिकारी तमाम पहलुओं पर विचार करने में जुटे हैं। सरकार को तो इस घटना के नाम पर एक नया कर्ज लेने का बहाना मिल गया है। उसने जेलों में एक नई चारदिवारी बनाने के नाम पर ढाई सौ करोड़ के कर्ज लेने की भी योजना प्रस्तुत कर दी है। सुशोभन बैनर्जी के स्थान पर भेजे गए 1988 बैच के आईपीएस अधिकारी सुधीर शाही की गिनती ईमानदार अफसरों में की जाती है।व्यापम कांड में अपनी सख्ती के लिए भी उनका नाम लिया जाता रहा है लेकिन सुशोभन बैनर्जी की लापरवाहियों की ओर न तो सरकार और न ही अफसरशाही कोई निगाह कर रही है। अभी हाल ही में जन्माष्टमी के कार्यक्रम में जब जेल मंत्री सुश्री कुसुम सिंह मेहदेले स्वयं मौजूद थीं तब भी सुशोभन बैनर्जी महिला कैदियों में रुचि लेने में शर्म नहीं महसूस कर रहे थे। स्वयं वरिष्ठ मंत्री ने तब टिप्पणी की थी कि इस अफसर के बारे में अब तक तो वे बहुत सुनती रहीं हैं लेकिन ये तो उससे एक कदम आगे है। जेल मंत्री के आदेशों को रद्दी की टोकरी में फेंक देने की बदतमीजी बैनर्जी इसलिए ही करते रहे क्योंकि उन्हें वरिष्ठ पुलिस अफसरों ने अपने कार्यकाल के दौरान बेजा संरक्षण दे रखा था।
अब जबकि उन्हें इस महत्वपूर्ण पद से हटा दिया गया है तब भी उनके खिलाफ किसी किस्म की विभागीय जांच नहीं खोली गई है। एक नाकारा और बेईमान अफसर को नौकरी में रखकर पालते रहने वाली शिवराज सिंह चौहान की मजबूर सरकार तरह तरह के वायदे करके लोगों को यकीन दिलाने में जुटी है कि वह जेलों की सुरक्षा के प्रति वचन बद्ध है। इसके बावजूद लोगो में मुठभेड़ को लेकर तरह तरह के सवाल उठ रहे हैं। भोपाल में तो इस मुठभेड़ को फर्जी बताने का माहौल बनाया जा रहा है। मुस्लिम समाज के जन प्रतिनिधियों ने इस मामले पर भारी प्रदर्शन की अनुमति मांगी थी जिसे प्रशासन ने शांति व्यवस्था बनाए रखने के नाम पर रद्द करवा दिया। इसके बावजूद कुछ मुस्लिम युवाओं ने इकबाल मैदान के समीप नारेबाजी करके अपना विरोध जताया।
सरकार यदि इस मुठभेड़ कांड के बाद यदि अपनी गलती सुधारने की मंशा रखती है तो उसे अपनी जेलों में पनप रहे कुशासन पर लगाम लगानी होगी। अदालतों को भी उन कारणों पर विचार करना होगा जिनसे उनके आधिपत्य वाली जेलों में अराजकता के हालातों पर काबू पाया जा सके ।
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सेंट्रल जेल भोपाल से बंदियों के फरार होने और मुठभेड़ की जाँच के बिन्दु तय
आयोग का मुख्यालय भोपाल होगा, तीन माह में रिपोर्ट देगा
राज्य सरकार द्वारा जाँच आयोग के गठन की अधिसूचना जारी
भोपाल : सोमवार, नवम्बर 7, 2016,
सेंट्रल जेल भोपाल से 30-31 अक्टूबर की दरम्यानी रात को आठ विचाराधीन बंदियों के जेल से भागने और मुठभेड़ में मृत्यु होने की घटना की जाँच के बिन्दु तय किये गये हैं। उल्लेखनीय है कि मुख्यमंत्री श्री चौहान ने घटना की जाँच के लिये उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश श्री एस.के. पाण्डे की अध्यक्षता में एक-सदस्यीय जाँच आयोग गठित करने की घोषणा की थी। जाँच आयोग का मुख्यालय भोपाल (मध्यप्रदेश) होगा। आयोग अधिसूचना के मध्यप्रदेश राजपत्र में प्रकाशन की तारीख से 3 माह के भीतर जाँच पूरी कर अपनी रिपोर्ट राज्य सरकार को प्रस्तुत करेगा।
राज्य शासन ने जाँच आयोग और उसके जाँच के बिन्दु की अधिसूचना आज जारी की है। जाँच आयोग जेल से विचाराधीन बंदियों के फरार होने और ग्राम मनीखेड़ा थाना गुनगा जिला भोपाल के निकट पुलिस मुठभेड़ में बंदियों की मृत्यु की घटना की जाँच निम्न बिन्दुओं पर करेगा:-
1. दिनांक 30-31 अक्टूबर की दरम्यानी रात में केन्द्रीय जेल भोपाल से आठ विचाराधीन बंदी किन परिस्थितियों एवं घटनाक्रम में जेल से फरार हुए? उक्त घटना के लिये कौन अधिकारी एवं कर्मचारी उत्तरदायी हैं?
2. ग्राम मनीखेड़ा थाना गुनगा जिला भोपाल के निकट 31 अक्टूबर को फरार आठ बंदियों के साथ हुई पुलिस मुठभेड़, जिसमें सभी आठ बंदियों की मृत्यु किन परिस्थितियों एवं घटनाक्रम में हुई?
3. क्या मुठभेड़ में पुलिस द्वारा की गयी कार्यवाही तत्समय विद्यमान परिस्थितियों में युक्ति-युक्त थी?
4. कारागार से बंदियों के फरार होने की घटना की पुनरावृत्ति न हो, इसके संबंध में सुझाव।
5. ऐसा अन्य विषय, जो जाँच के लिये अनुषांगिक हो।
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