Month: November 2016

  • नीयत, नीति और नेता का नेकपन

    नीयत, नीति और नेता का नेकपन

    bharatchandra nayak
    भरतचन्द्र नायक….

    इतिहास बड़ा निर्दयी होता है। शासक और प्रशासक कितना भी महत्वाकांक्षी हो, लेकिन ऐसे शख्स कम ही अपवाद होते है जो समय, परिस्थिति से समझौता नहीं करते। उनके इरादे मजबूत होते है, और समाज-देश में आस्था उनका संबल होता है। आधुनिक काल के निर्माता और प्रथम प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरू ने गद्दी संभालते ही राजनैतिक, आर्थिक क्षेत्र में व्याप्त प्रदूषण को समाजवाद के रास्ते में रोढ़ा मारकर साफ-सुथरी सरकार देने का मंसूबा संजोया था। भारत में 1961 में आयकर कानून बनानें और बाद में सीबीआई के रूप मंे स्पेशल स्टेब्लिशमेंट एक्ट को परिष्कृत करने के पीछे उनका इरादा देश से भ्रष्टाचार के कदाचार को समाप्त करना था। देश में कालेधन के खिलाफ प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का अभियान जब वाद-विवाद और चर्चा का केन्द्र बना है, पं. नेहरू के जन्मदिन पर उत्तर प्रदेश के गाजीपुर में एक सभा में उन्होनें जो कहा और पं. नेहरू का पुण्य स्मरण किया, उससे संकेत मिलता है कि नरेन्द्र मोदी इतिहास की समग्रता से पुनार्वृत्ति करनें के लिए कृत-संकल्प है। विपक्ष द्वारा उठाये जा रहे लेकिन, किन्तु, परन्तु से अविचलित रहकर उन्होनें आर्थिक क्षेत्र में जो स्ट्राईक किया है कालेधन की मुहिम नोट बंदी आर्थिक सर्जिकल स्ट्राईक के रूप में प्रशंसा और विपक्षी मंच पर आलोचना का विषय जरूर बन गयी है। लेकिन लंबी लाइन में पसीना बहाते नये नोटों के इंतजार मंे खड़ा देश का आम आदमी नरेन्द्र मोदी की प्रशंसा किये बिना नहीं रहता। लंबी लाइन में परेशान हो रहे उपभोक्ताओं की सेवा में ठंडा पानी, चाय परोसते युवक मानों इस मुहिम के सही प्रशंसक बन चुके है।

    बड़े नोटों के प्रचनल पर लगायी गयी रोक से आम जनता की परेशानी, बाजार में आयी घबराहट के बावजूद जनता में एक आत्मविश्वास जगता दिखायी दे रहा है और वह इस बात से कतई इत्तेफाक नहीं रखता कि नरेन्द्र मोदी ने देश पर आर्थिक आपातकाल थोप दिया है। नोट बंदी का नया आयाम सिर्फ सामाजिक आर्थिक सिस्टम का परिष्कार ही नहीं है अपितु राजनैतिक क्षेत्र में नयी सरंचना का संकेत भी है। आजादी के बाद चुनाव आयोग ने लंबी बहस की और चुनाव के खर्चीले होने पर सवाल भी उठाया। माना गया कि चुनाव में कालेधन के इस्तेमाल से निर्वाचन की शुचिता दाखिल हुई है। लेकिन मंचीय चिंता व्यक्त करने वाले राजनैतिक दलों की भूमिका एक तटस्थ मौन दर्शक से ज्यादा नहीं रही। शुचिता लाने के लिए उन्होनें कोई प्रयास नहीं किया। 500 और 1000 रू. के बड़े नोटों के प्रचलन पर लगी रोक से लाखों करोड़ रूपया रखने वाले कालाधन धारियों की चिंता का कोई ठिकाना नहीं रहा। राजनैतिक दलों ने आगामी विधानसभा चुनाव के लिए जो बड़े नोटों का अंबार बनाकर रखा था, उनकी सांसे थम गयी और उन्होनें नरेन्द्र मोदी पर निशाना तान दिया है। यहां तक कि देश के सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा भी खटखटा दिया। लेेकिन सर्वोच्च न्यायालय की खंडपीठ ने भी उन्हें निराश कर दिया और इस कदम की नेक नीयति पर अपनी मोहर लगा दी। अलबत्ता, न्यायालय ने सुझाया कि आम आदमी जो रोज कुआं खोदता है और पानी पीता है, उसे किल्लत न हो। इसका केन्द्र को ध्यान रखना होगा। पुराने बड़े नोटों, नकली मुद्रा के खारिज होने के बाद नये नोटों को प्रचलन में लाने का गंभीर दायित्व केन्द्र सरकार को सौंपा है। केन्द्र सरकार भी जनता के प्रति संवेदनशील है। 8-9 नवंबर 2016 की मध्यरात्रि से अचानक बड़े नोटों पर लगी पाबंदी से जनता हैरान है, लेकिन एनडीए सरकार का यह तर्क भी मायने रखता है कि यदि इसकी पूर्व सूचना दी जाती तो उद्देश्य ही पराजित हो जाता। इस आकस्मिक् नोट बंदी में जनता के सब्र का सबसे बड़ा कारण इस पाबंदी से आतंकवाद, तस्करी और भ्रष्टाचार का मेरूदंड झुक जाने से हुई सुखद अनुभूति है। मेहनत मशक्कत कर पेट पालने वाले दिन भर की मजदूरी खोकर अपनी गाढ़ी कमाई के नोट बदलने के लिए लंबी कतार में इंतजार करते हुए भी नरेन्द्र मोदी के साहसिक कदम के दीवाने हो गये है। उनका मानना है कि जहां नोटों का अंबार रद्दी में तब्दील हो गया है, वहीं अमीर और गरीब एक पंक्ति में आ गये है। नरेन्द्र मोदी ने 50 दिनों में स्थिति सामान्य होने की दिलासा दी है। भारतीय जनता पार्टी के नेता और मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चैहान का यह कथन मौजू है कि इस कदम ने श्री सत्यनारायण भगवान की कथा में आये किरदार वणिक व्यापारी जैसी हालत उन रईसों की कर दी है,

    जिन्होनें केन्द्र सरकार की तमाम चेतावनियों पर यह दर्शाया कि उनके पास कोई ब्लैक मनी (कालधन) नहीं है। नरेन्द्र मोदी ने जखीराबाजों को तथास्तु कहकर उसी अंजाम पर पहुंचा दिया। ब्लैकमनी का अंबार लतम्-पत्ताम् में नोटों का जखीरा बदल गया है। आर्थिक विशेषज्ञों की राय है कि कालाधन अर्थव्यवस्था में घुन बन रहा था। इससे जहां भ्रष्टाचार का पोषण होता था, आतंकवादियों के स्लीपर सेल पैदा होकर सरसब्ज हो रहे थे। वे धीरे-धीरे कुपोषण का शिकार होकर मृतपाय होंगे। नक्सलियों की कमर टूट चुकी है, क्योंकि वे तो धन एंेठकर जमीन में छिपाते आ रहे है। जरूरत पड़ने पर हथियार खरीद लेते थे। हवाला पर लगाम लगाने के साथ मादक द्रव्यों की तस्करी करने वाले भी हैरान है। उनका दावा है कि बड़े नोट तर्कसंगत कारणों पर बदले जाने और मौजूदा खातों में जमा होने से काली मुद्रा प्रचलन से बाहर हो रही है। और जो पूंजी सुप्त थी, वह बैंकों के माध्यम से विकास और उत्पादनशील प्रयोजनों के काम आयेगी। इससे असली मुद्रा का परिमाण प्रचलन में मर्यादित होने से ईएमआई (ब्याज दर) घटेगी। केन्द्र सरकार की पावंदी का अनुकूल प्रभाव देखने में आया है।

    अनुमान है कि 9 नवंबर से प्रथम चरण में चार दिनों में ही बैंको में एक लाख करोड़ रू0 से अधिक का ट्रांजेक्शन (लेन-देन) हुआ। इससे बैंको की लिक्विडिटी में इजाफा हुआ है, एटीएम में नोटों का आकार-प्रकार बदलने से उनकी क्षमता घटने से हो रही उपभोक्ता की परेशानी के प्रति सरकार की संवेदनशीलता का ही नतीजा है कि केन्द्र ने पोस्ट आॅफिस को भी इस काम में जुटा दिया है। ग्रामीण केन्द्र भी सक्रिय किये जा चुके है। निश्चित रूप से केन्द्र के इस बहुप्रतीक्षित कदम से जनता हलाकान हुई है, लेकिन जनता को भरोसा है कि इससे मुल्क को लगभग 3 लाख करोड़ रू. का लाभ हो सकता है। एक सर्वेक्षण के अनुसार देश में 1000 और 500 रू. की मुद्रा के रूप में 14 लाख करोड़ रू. के नोट है, जिसमें 20 प्रतिशत कालाधन है। यह राशि इस मुहिम में लौटने से रही। यह सरकारी खजाने की निधि में दर्ज हो जायेगी। आरबीआई द्वारा जारी हर नोट सरकार की लायबिलिटी होती है। उन नोटों की देयता स्वयं समाप्त हो जायेगी। राजनैतिक दल भले ही नोट बंदी का विरोध कर रहे हों, लेकिन उद्योग जगत और आम आदमी ने इसे आर्थिक क्षेत्र में सर्जिकल स्ट्राईक बताकर इस कदम का जोरदार स्वागत किया है। एक बात यह भी कि नकद के रूप में भारत में इसका जीडीपी में हिस्सा 12 प्रतिशत है यानि नकदी में लेन-देन चलता है। जबकि दूसरे देशों में नकदी का अंश 3 से 4 प्रतिशत ही रहता है। इस तरह प्रधानमंत्री ने बड़े नोट बंद करके जो आर्थिक शुद्धीकरण की क्रांति की है, उस पर 2014 के पहले भी तत्कालीन प्रधानमंत्री डाॅ. मनमोहन सिंह सरकार ने विचार किया था। लेकिन न तो वे जनता के चुने हुए प्रधानमंत्री थे और न कांगे्रस ऐसा करने का साहस करने के लिए तैयार थी। कारण जो भी रहा हो।

    नोट बंदी के कई आयाम है। राष्ट्र हित में उन पर बहस की गंुजाईश है, लेकिन उस पर बहस करने के बजाय कुछ लोग अफवाहों को पंख देकर जनता को भ्रमित करनें में जुटे है। 100 रू. और 50 रू. के नोट बंद किये जाने की अफवाह को केन्द्र सरकार ने शरारतपूर्ण बताकर खारिज कर दिया है। विधि आयोग और चुनाव आयोग चुनाव में कालेधन के दुरूपयोग पर लंबे समय से चिंता व्यक्त करते आ रहे है। मंचों पर राजनैतिक दल भी इसकी पेरोकारी करनें में पीछे नहीं रहे। लेकिन इन दलों ने इस पर सहमति बनानें का साहस नहीं दिखाया। इनकी नीयत में हमेशा खोट देखी गयी है। लेकिन नोट बंदी ने देश में हो रहे उपचुनावों में इसका सबूत दे दिया है कि नोट बंदी से नकली नोटों का प्रचलन बंद होने से चुनाव में कालेधन पर रोक लगाने का भरोसा किया जा सकता है। नोट बंदी भ्रष्टाचारियों के लिए सबक है, लेकिन इस अभियान में गेहूं के साथ घुन पिस रहा है, यह एक मजबूरी सरकार के सामने आ रही है। अर्थव्यवस्था के शु़िद्धकरण के अनुष्ठान में आम आदमी को सजा भुगतना राष्ट्रीय अनुष्ठान में आम आदमी की सात्विक आहुति है। देश की उभरती अर्थव्यवस्था का इसे परीक्षाकाल भीमानकर संतोष करना पड़ेगा। इसके लिए यदि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की प्रशंसा और एनडीए सरकार की सराहना की जाये तो यह न तो अतिश्योक्ति होगी और न इसे प्रशस्ति गान माना जाना चाहिए।

    शीतकालीन संसद सत्र में विपक्ष नोटबंदी को लेकर केन्द्र सरकार को घेरने के लिए एकजुटता का संदेश दे चुका है। बुद्धिजीवी भी चाहते है कि लोकतंत्र में विरोध हो और रचनात्मक विरोध और बहस से सिस्टम की कमियां दूर करनें मंे मदद मिलती है। लेकिन विरोध में भी संवेदना आवश्यक है। विपक्ष की आक्रामकता को देखते हुए जनता चकित है। लेकिन प्रधानमंत्री और एनडीए सरकार विपक्ष की लामबंदी पर हैरत में नहीं है। एनडीए ने कहा है कि उसकी नीति और नीयत साफ है। हर मुद्दे पर किसी भी दृष्टिकोण से बहस के लिए केन्द्र सरकार तैयार है। उसे खतरा इसलिए नहीं है कि क्योंकि वह बहुमत में है। इससे भी बड़ी बात यह है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को आम आदमी के समर्थन का बल होने से उनका हौंसला बुलंद है।

  • भाजपा का मलाई खाने वाला कैडर

    भाजपा का मलाई खाने वाला कैडर

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    भारतीय जनता पार्टी को उसके कैडर के लिए जाना जाता रहा है। कांग्रेस के धराशायी होने की वजह भीउस पार्टी का कैडर ही रहा। जिस पार्टी का कैडर भ्रष्ट नेताओं और सुविधाभोगी अय्याशों से भर जाए उसे विदा करने में जनता जरा भी देरी नहीं करती। कांग्रेस इसका जीता जागता सबूत है। ये जानते बूझते हुए भी पिछले कुछ सालों में मध्यप्रदेश की भारतीय जनता पार्टी ने कैडर के नाम पर केवल चुनाव जीतने और जिताने वाले लोगों को ही तवज्जो दी है। पार्टी कैडर मेंशीर्ष के आसपास इसी तरह के कार्यकर्ताओं और नेताओं का जमघट हो गया है जो कांग्रेसियों के तमाम हथकंडों को अपनाकर चुनावी विजय का लक्ष्य लेकर चल रहे हैं। इसमें पार्टी को सफलता भी मिल रही है। हालिया उपचुनाव में पार्टी ने शहडोल और नेपानगर सीट पर विजय भी हासिल की। इस विजय को मोदी सरकार की नोटबंदी का लिटमस परीक्षण बताकर प्रचारित किया जा रहा है। लेकिन हकीकत इसके विपरीत है। आठ तारीख को जब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने पुराने बड़े नोटों के बंद करने की घोषणा की तबसे भारतीय जनता पार्टी को मानों सांप सूंघ गया है। कांग्रेसियों की बैचेनी की बात करने का तो कोई औचित्य है ही नहीं। भाजपा का प्रदेश नेतृत्व हो या राज्य सरकार दोनों इस मुद्दे पर तभी से चुप्पी साधे हुए हैं। भाजपा के राज्य नेतृत्व ने एक भी बयान अब तक जारी नहीं किया जिसमें कार्यकर्ताओं को नोटबंदी के कारण आ रही परेशानियों से निपटने में जनता के साथ खड़े होने के निर्देश दिए गए हों। जो पार्टी हर चुनाव के दौरान दम भरती हो कि हम बूथ लेवल मैनेजमेंट पर सबसे ज्यादा जोर देते हैं वह पार्टी अपने राष्ट्रीय नेता के क्रांतिकारी फैसले पर आखिर क्यों खामोश खड़ी है। किसका चेहरा देखकर पार्टी ने इस मुद्दे पर चुप्पी साधे रखने का फैसला लिया। क्या पार्टी का लक्ष्य केवल वोट लेना और सत्ता का आनंद लेना भर है। भाजपा के संवाद केन्द्र से जारी प्रेस नोट में युवा मोर्चा के किसी आयोजन का उल्लेख छोड़ दें जिसमें बैंकों में हेल्प डेस्क अभियान चलाने की बात कही गई हो लेकिन पार्टी के स्तर पर न तो कोई आपातकालीन बैठक बुलाई गई और न ही हालात से निपटने की कोई रणनीति बनाई गई। मध्यप्रदेश की भारतीय जनता पार्टी के संगठन को स्व. कुशाभाऊ ठाकरे जैसे जीवट व्यक्तित्व के कारण पूरे देश में गंभीरता से याद किया जाता रहा है। आज इस पार्टी में ऐसा क्या हो गया कि नोट बंदी जैसे जनहितकारी फैसले पर वह चुप्पी साधे बैठी है। मध्यप्रदेश की शिवराज सिहं चौहान सरकार को समाज के सभी वर्गों के लिए नीतियां बनाने के कारण खासी लोकप्रियता हासिल है। जनता ने उसे तीन तीन बार सत्ता सौंपी और प्रदेश के विकास का मौका दिया लेकिन इसके बावजूद सरकार ने नोटबंदी को सफल बनाने के लिए कोई अभियान नहीं चलाया। नोटबंदी की घोषणा के अठारह दिन बीत जाने के बाद भी जब अखबारों में जनता की परेशानियों की खबरें छपना बंद नहीं हुईं तो हाईकमान के निर्देश के बाद सरकार ने आनन फानन में कुछेक अखबारों को एक विज्ञापन जारी किया जिसमें वही बातें दुहराई गईं हैं जो भारत सरकार की ओर से जारी विज्ञापनों में कही जाती रहीं हैं। सरकार समर्थक एक बड़े समाचार पत्र ने तो अपने संपादकीय में नोटबंदी को मोदी का व्यक्तिगत फैसला बताकर इसका खुला विरोध भी किया। वास्तव में सरकार में बैठे महत्वपूर्ण लोगों और भ्रष्ट व्यापारियों के बीच इस तरह का गठजोड़ बन गया है कि वो किसी भी नवाचार को स्वीकार करने तैयार नहीं है। सार्वजनिक धन का अपवंचन करने के लिए इस गठजोड़ ने कई फार्मूले अपना लिए हैं। विकास के नारे लगाना इसमें सबसे उल्लेखनीय है। एक सामान्य सा अर्थशास्त्री भी समझ सकता है कि सत्ता से जुड़े शोषकों के गिरोहों ने विकास योजनाओं का जो धन चोर दरवाजे से अपने पास जुटा लिया उसे वापस लाने के लिए ही नोटबंदी की गई है। पर मध्यप्रदेश में तो सरकार फैसले के बाद से ही लकवा ग्रस्त नजर आ रही है।जिस फैसले को जनता का व्यापक समर्थन मिल रहा हो। भाजपा के पारंपरिक विरोधी वोट बैंक ने भी इस कदम को अच्छा फैसला बताया है। इसके बावजूद सरकार ऊहापोह की स्थिति से बाहर नहीं निकल पा रही है।जिस फैसले को जनता हाथों हाथलेकर चल रही है प्रदेश सरकार इस दौरान जनता से साथ हाथ बंटाने खड़ी नहीं हो पा रही है।क्या इसे भारतीय जनता पार्टी के भीतर आपसी प्रतिद्वंदिता की लड़ाई समझा जाए। पार्टी के नेताओं से ये सवाल पूछा जाना चाहिए कि क्या पार्टी का कैडर केवल मलाई खाने के लिए ही संयोजित किया गया है। क्या मध्यप्रदेश की भारतीय जनता पार्टी सरकार काला धन बनाने वाले व्यापारियों, अफसरों और राजनेताओं के साथ है। जनता की समस्याओं से उसे कोई वास्ता नहीं।

  • कर्ज से गुलछर्रे उड़ाने वालों की दहशत

    कर्ज से गुलछर्रे उड़ाने वालों की दहशत

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    देश में विमुद्रीकरण की आंधी ने जनता के नाम पर कर्ज लेकर गुलछर्रे उड़ाने वाले तथाकथित उद्योगपतियों की नींदें उड़ा दी हैं। विकास योजनाओं के नाम पर कर्ज लेने वाले और गुल्ली करने वाले राजनेताओं की भी जान सांसत में है। उन्होंने विकास योजनाओं पर लिए साफ्ट लोन की राशि को गुल्ली कर लिया था।ये धन उन्होंने मंहगी ब्याज दरों पर भूमाफिया, बिल्डरों, उद्योगपतियों को उपलब्ध करा रखा था ।अबउसे ताबड़तोड़ ढंग से वापस जमा करने की चुनौती ने उनकी नींदें उड़ा दी हैं। नतीजा ये है कि नेताओं और उद्योगपतियों के इस गठजोड़ ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पर निशाना लगाना शुरु कर दिया है। आज मध्यप्रदेश के एक अखबार ने संपादकीय लिखा है जिसमें कहा गया है कि सरकार लोगों को नहींसमझा पाई है कि उसने जनता की गाढ़ी कमाई और महिलाओं के बचाकर रखे गए धन को हलक में हाथ डालकर निकाल लिया है वह लोगों के विकास में ही उपयोग की जाएगी। इस तरह की हल्की बातों को कहकर ये गैर जिम्मेदार अखबार विमुद्रीकरण के फैसले के खिलाफ जनमत तैयार करने का काम कर रहा है। ये अखबार ये भी कह रहा है कि विमुद्रीकरण का फैसला केवल और केवल प्रधानमंत्री मोदी ने लिया है। ये बात सही है कि विमुद्रीकरण का फैसला लिए जाते समय पूरी गोपनीयत बरती गई थी। लेकिन ये फैसला सुविचारित ढंग से देश के जिम्मेदार लोगों ने लिया है। सेना के तीनों अध्यक्षों को इसके लिए विश्वास में लिया गया। रिजर्व बैंक के अफसरों, वित्तीय सलाहकारों, और उन तमाम लोगों को भरोसे में लिया गया जो देश की नीति निर्धारण में बड़ी भूमिका निभाते हैं। इसके बावजूद बौखलाए सूदखोर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के खिलाफ जनमत जगाने में जुट गए हैं। उन्हें समझ में नहीं आ रहा है कि उन्होंने वैश्विक मुद्राकोषों से लिए गए जिस साफ्टलोन को मंहगी ब्याजदरों पर बाजार में चला रखा था उसे वे समयसीमा के भीतर वापस कैसे जमा करा सकेंगे। यदि उन्होंने ये धन घोषित नहीं किया तो वह मिट्टी हो जाएगा, और यदि घोषित करते हैं तो जेल जाने के हकदार होंगे। शायद इसीलिए वे जनता की परेशानियों का हवाला देकर तरह तरह की खबरें अखबारों में छपवा रहे हैं। उन घटनाओं को खबर बनाया जा रहा है जिसमें लोग बैक की लाईनों में खड़े होकर अपनी कमजोरियों के कारण बेहोश हो गए या उनकी मौत हो गई। ये सब माहौल वे बना रहे हैं जिन्हें जनता का धन हड़प करने के कारण अपनी मौत करीब नजर आ रही है। खुद भारतीय जनता पार्टी के नेता इस फैसले से अचंभित हैं। उन्हें लग रहा है कि ये फैसला उनकी मौत की वजह बनने जा रहा है। अब तक विकास के नाम पर भाजपा की सरकारों ने भी कांग्रेस की सरकारों की ही तरह भारी कर्ज ले रखा था। इस धन को उन्होंने फर्जी कंपनियों के माध्यम से शेयर मार्केट में भी लगा ऱखा था। जमीनों के भाव अनाप शनाप बढ़ाकर उन्होंने रियल स्टेट सेक्टर में भी भारी निवेश कर ऱखा था। मकानों की जमाखोरी को बढ़ावा देकर वे उस साफ्टलोन से करोड़ों रुपए उलीच रहे थे। सरकार के इस एक फैसले ने उनकी तमाम अय्याशियों को धरातल पर ला दिया है। इसलिए वे ऊपरी तौर से तो भले ही प्रधानमंत्री मोदी की तारीफ कर रहे हैं लेकिन छिपकर वे भारत सरकार पर भी प्रहार करने से बाज नहीं आ रहे हैं। वे भूल गए हैं कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ हमेशा से भारतीय अर्थव्यवस्था को नई कसावट देने का पक्षधर रहा है। भाजपा और आरएसएस के चिंतकों का एक बड़ा वर्ग नोटों से महात्मा गांधी की फोटो हटाने के पक्षधर रहे हैं। सच भी तो है महात्मा गांधी अपरिग्रह के पक्षधर थे और वे पूंजी के अधिक उपयोग के विरोधी थे। गांधीवाद वास्तव में पूंजी के विरोध पर टिका था जबकि पूंजीवाद लोगों की भौतिक आवश्यकताओं को पूरा करके सुलझे समाज के निर्माण की बात करता है। ये दोनों विचार परस्पर विरोधी हैं इसलिए अब गांधी को विसर्जित करने का समय आ गया है। महात्मा गांधी को मुख्य धारा से हटाए बगैर हम सुखी समाज के निर्माण का अपना लक्ष्य नहीं पा सकते हैं। अब जबकि भारत ने पूंजीवाद के रास्ते पर पच्चीस सालों तक चलने के बाद ठोस फैसले लेकर पूंजीवाद को सफल बनाने की रणनीति पर काम शुरु कर दिया है तब ये सूदखोरों की लाबी इस फैसले की आलोचना में जुट गई है। वास्तव में विमुद्रीकरण का फैसला जनता के लिए जितना परेशान नहीं कर रहा उतना ये भ्रष्टाचारियों और शोषकों सिर पर लटकी तलवार साबित हो रहा है।प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की आलोचना सिर्फ एक बात पर की जा सकती है कि वे नए नोटों को गांधी से मुक्ति नहीं दिला सके हैं। शायद उन्होंने पूंजी को मजबूती देने के लिए अभी गांधी से पंगा लेने से बचने की रणनीति अपनाई है। इसके बावजूद विमुद्रीकरण जिस तरह देश की मुद्रा को मजबूती देने मे मील का पत्थर साबित होने वाला है उससे गरीबों के नाम पर शोषण का दुष्चक्र चलाने वालों की नींदें तो उड़ गई हैं। जनता को उसके अपने हित की रक्षा में लड़ रही इस सरकार के हाथ मजबूत करने के लिए आगे आना होगा। प्रधानमंत्री ने वाकई बड़ा पंगा लिया है और हमें समझना होगा कि राष्ट्रभक्ति के इस अनुष्ठान में आगे बढ़कर अपना योगदान देेने का सही वक्त आ गया है।

  • धन की धुलाई में जुटे लोगों पर गाज गिरेगी

    धन की धुलाई में जुटे लोगों पर गाज गिरेगी

    The Prime Minister, Shri Narendra Modi being received on his arrival at Varanasi, Uttar Pradesh on November 14, 2016.
    The Prime Minister, Shri Narendra Modi being received on his arrival at Varanasi, Uttar Pradesh on November 14, 2016.

    नईदिल्ली(पीआईसीएमपीडॉटकॉम)।
    18-नवंबर, 2016

    अपने काले धन को नए नोटों में परिवर्तित करने के लिए अन्य व्यक्तियों के बैंक खातों का उपयोग करने वाले कर चोरों के खिलाफ सख्त कार्रवाई होगी

    इस उद्देश्‍य के लिए अपने बैंक खातों के दुरुपयोग की अनु‍मति देने वाले लोगों पर उकसाने के लिए आयकर अधिनियम के तहत मुकदमा चल सकता है, सरकार ने लोगों से अपील की है कि वे काले धन को परिवर्तित करने वालों के लालच में न आएं और इस तरीके से काले धन को सफेद करने के अपराध में भागीदार न बनें तथा इसे समाप्‍त करने में सरकार से जुड़कर उसकी मदद करें

    सरकार ने पहले इस आशय की घोषणा की थी कि कारीगरों, कामगारों, गृहणियों इत्‍यादि द्वारा बैंकों में जमा की जाने वाली छोटी राशियों पर आयकर विभाग वर्तमान आयकर छूट सीमा के 2.5 लाख रुपये रहने के तथ्‍य को ध्‍यान में रखते हुए कोई भी सवाल नहीं करेगा। इस बीच, ऐसी जानकारियां मिली हैं कि कुछ लोग अपने काले धन को नये नोटों में बदलने के लिए अन्‍य व्‍यक्तियों के बैंक खातों का उपयोग कर रहे हैं, जिसके लिए उन खाताधारकों को इनाम भी दिया जा रहा है जो अपने खातों के इस्‍तेमाल की अनुमति देने पर सहमत हो जाते हैं। इस तरह की गतिविधि जन धन खातों में भी होने की सूचना मिली है।
    यह स्‍पष्‍ट किया गया है कि यदि यह बात साबित हो जाती है कि किसी बैंक खाते में जमा की गई राशि खाताधारक के बज़ाय किसी और व्‍यक्ति की है तो इस तरह की कर चोरी पर आयकर के साथ-साथ जुर्माना भी लगाया जा सकता है। यही नहीं, जो व्‍यक्ति इस उद्देश्‍य के लिए अपने खाते के दुरुपयोग की अनुमति देगा उस पर उकसाने के लिए आयकर अधिनियम के तहत मुकदमा चलाया जा सकता है।
    हालांकि, अपनी ही नकद बचत राशि को बैंक खाते में जमा करने वाले वास्‍तविक व्‍यक्तियों से कोई भी सवाल नहीं पूछा जायेगा।

  • सुशोभन बैनर्जी की हीरोपंती ने तुड़वाई जेल

    सुशोभन बैनर्जी की हीरोपंती ने तुड़वाई जेल

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    भोपाल 5 नवंबर(पीआईसीएमपीडॉटकॉम)। सिमी आतंकवादियों ने भोपाल जेल की दीवार तो फांद ली लेकिन भोपाल पुलिस की चौकस निगाहों ने उन्हें कानून को लतियाने की उचित सजा देकर अपनी मुस्तैदी का सबूत भी दे डाला। इस मुठभेड़ की जितनी प्रशंसा की जाए कम है। इसलिए जो लोग जेल से हवलदार की हत्या कर भागे आतंकवादियों को टपका देने पर मरसिया पढ़ रहे हैं उनकी बातें रद्दी की टोकरी में फेंकने लायक हैं। मगर इस पर तो विचार करना ही होगा कि कानून से खिलवाड़ करने का ये साहस किसमें, कैसे और क्यों पलता रहा है।
    मध्यप्रदेश की जेलें अपनी सुधारात्मक गतिविधियों के लिए जानी जाती हैं। यहां ये माना जाता है कि बुरा आदमी गलत शिक्षा का नतीजा होता है । जब कानून किसी को दोषी ठहराए तो जेलों में ले जाकर उन्हें नए सिरे से संस्कारित किया जा सकता है। इसलिए मध्यप्रदेश की जेलों को सुधारगृह कहा जाता है। होशंगाबाद में तो खुली जेल का जो प्रयोग किया गया वो सबसे सफल प्रोजेक्ट रहा है। जेल प्रशासन हमेशा से जेलों में इतने बुलंद अफसरों को तैनात करता रहा है कि वे समाज के कबाड़ कहे जाने वाले अपराधियों को मुख्य धारा में चलने लायक जरूर बना देते थे। पिछले कुछ सालों में जेलों की ये साख खंडित हुई है। इसकी वजहों पर विचार किए बिना मध्यप्रदेश की सरकार, प्रशासन और प्रेस जिस तरह हवा हवाई उपाय सुझा रही है उससे कहा जा सकता है कि सुशासन का दावा करने वाली मध्यप्रदेश की सरकार कांग्रेस की लचर सरकार के मुकाबले लाचार अधिक साबित हो रही है।
    जब भी कोई मुठभेड़ होती है और पुलिस की गोली से एक भी अपराधी मारा जाता है तो उस मामले की मजिस्ट्रीयल जांच की जाती है। जाहिर है भोपाल जेल से भागे सिमी आतंकवादियों की हत्या के मामले में भी न्यायिक जांच ही एक मात्र कानून सम्मत कदम है। इसके बावजूद एसआईटी के गठन, एनआईए, सीबीआई , सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश जैसी संस्थाओं से जांच की बात करके इस मामले का राजनीतिकरण किया जा रहा है। सरकार की इच्छा का सम्मान करते हुए पुलिस महानिदेशक ऋषि कुमार शुक्ला ने एसआईटी के गठन की घोषणा भी कर दी. उन्होंने बताया कि एसआईटी की तीन सदस्यीय टीम का नेतृत्व सीआईडी के एसपी अनुराग शर्मा करेंगे और वो पूरे मामले की रिपोर्ट पुलिस हेडक्वाटर को सौपेंगे.मुठभेड़ कांड के बाद मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने पूर्व पुलिस महानिदेशक नंदन दुबे को मामले की जांच करने भेजा था लेकिन बाद में उन्हें इस प्रक्रिया से हटा दिया गया। उनके खिलाफ प्रदेश के पुलिस थानों में रिलायंस जियो कंपनी को फ्री में टावर लगाने का मामला उच्च न्यायालय में विचाराधीन है। इस सौदे में प्रदेश को कथित तौर पर 1400 करोड़ रुपए की क्षति पहुंचाई गई थी। सुप्रीम कोर्ट उनके खिलाफ काफी पहले स्ट्रक्चर पारित कर कह चुका है कि उन्हें किसी बड़े पद पर नहीं रखा जाना चाहिए। इसके बावजूद प्रदेश सरकार ने उन्हें डीजीपी बनाया और रिटायर होने के बाद एक निगम में पुनर्वासित भी कर दिया। जबकि हकीकत ये है जेल तोड़ने की साजिश भी तबसे रची जा रही थी जबसे वे पुलिस महानिदेशक रहे । उन्होंने अपने प्रिय अफसर सुशोभन बैनर्जी को डीजी जेल बनवाया था। उनके कार्यकाल में ही खंडवा जेल से सिमी के आतंकवादी फरार हुए थे। जब मार्च 2015 में सुशोभन बैनर्जी को डीजी जेल बनाया गया तबसे सिमी आतंकवादियों को मिलने वाली सहूलियतें भी बढ़ गईं थीं।
    सुशोभन बैनर्जी मूलतः कलकत्ता के रहने वाले आईपीएस अफसर हैं। जिनका अपराध और कानून की दुनिया से कभी कोई रिश्ता नहीं रहा। तीसरे प्रयास में वे प्रशासनिक सेवा की परीक्षा पास कर सके थे। वे क्रिकेट खिलाड़ी रहे हैं और नौकरी में आने से पहले वे क्रिकेट ही खेलते रहते थे। कालेज के दिनों में ही वे शरीर सौष्ठव और फिल्मों नाटकों में अभिनय से जुड़ गए और नौकरी के दौरान फिल्मों में अभिनय करते रहे। नंदन दुबे जैसे अफसरों की मेहरबानी से उन्होंने मुंबई में घुमक्कड़ी की नौकरी की और उनकी पत्नी ने वहीं अपना कारोबार भी फैलाया। आज उनकी पत्नी मुंबई में बड़ा कारोबार चलाती हैं और बेटा फिल्मों में अभिनय करता है। सुशोभन बैनर्जी ने डीजी जेल की नौकरी भी पूरी तरह पार्ट टाईम जॉब की तरह की। जेल अधीक्षकों और जेलरों को कथित तौर पर टारगेट दिए गये थे कि वे अपने बजट का लगभग पचास फीसदी हिस्सा बचाकर चंदे के रूप में पेश करें। ये नजराना वसूलने वे स्वयं जाते थे। नतीजा ये हुआ कि आज जेलों में कैदियों को मिलने वाला 70 फीसदी बजट गुल्ली हो जाता है। कैदियों को सुविधाएं खरीदने के भरपूर मौके दिए जाते हैं।जेलों को सुरक्षा बढ़ाने के निर्देश कागजों पर हमेशा दिए जाते रहे लेकिन फील्ड पर हकीकत कुछ और थी। आज जो मीडिया सुशोभन बैनर्जी को हटा दिए जाने के बाद उनकी शान में कशीदे पढ़ रहा है उसे ये हकीकत पता करने में जरा भी रुचि नहीं है कि सुशोभन बैनर्जी ने डीजी जेल रहते हुए उनके सत्कार पर जो रकम खर्च की वो उन्होंने कहां से जुटाई थी। जिन अफसरों ने उनके इशारे पर चलने से इंकार कर दिया उनके खिलाफ विभागीय जांचें शुरु कर दीं गईं। उन्हें निलंबित भी किया गया। जेलों के प्रभार से भी हटा दिया गया।
    सुशोभन बैनर्जी की रुचि चंदा वसूलने और उसकी रकम मुंबई में पत्नी के कारोबार में लगाने बेटे को फिल्मों में काम दिलाने में तो रही ही है साथ में वे जेल में बंद महिला कैदियों में भी खासी दिलचस्पी लेते रहे हैं। जेलरों और अफसरों को कथित तौर पर निर्देश रहते थे कि वे जेलों में बंद खूबसूरत और चालाक किस्म की महिला अपराधियों को भी पेश करें। सूत्र बताते हैं कि वे अपने दौरों में शराब और शबाब के बीच महिला कैदियों से फिल्मों के लिए कहानियां भी तलाशते रहते थे। समय समय पर अपने मीडिया इंटरव्यू में वे कहते रहे हैं कि वे समाज में महिलाओं की स्थितियों को बदलने के लिए फिल्म बनाना चाहते हैं। उनके इस कथित रंगीलेपन की कहानियां जेलों में आम हो गईं थीं। यही वजह है कि जेलों में कैदियों को सुविधाएं बेचे जाने और उनसे चंदा उगाहने की परंपरा का एक नया युग शुरु हो गया था। जेलों के प्रहरी डीजी जेल के महिला प्रेम की कहानियां भी चटखारे लेकर सुनाते थे और यही वजह जेलों में गुंडागर्दी बढ़ने की असली वजह बनी। एक चर्चित जेल अधिकारी से उनकी करीबियां पूरे महकमे को मालूम है। यही महिला अधिकारी उनके नाम पर जेलों के अफसरों से चंदे के फरमान सुनाती रहती थी। जो अफसर सुनते उन्हें बजट और प्रभार भी मिल जाते और जो नहीं सुनते वे निलंबन की सजा भोगते।
    सिमी आतंकवादियों से मुठभेड़ कांड की जांच करने वाले अधिकारी तमाम पहलुओं पर विचार करने में जुटे हैं। सरकार को तो इस घटना के नाम पर एक नया कर्ज लेने का बहाना मिल गया है। उसने जेलों में एक नई चारदिवारी बनाने के नाम पर ढाई सौ करोड़ के कर्ज लेने की भी योजना प्रस्तुत कर दी है। सुशोभन बैनर्जी के स्थान पर भेजे गए 1988 बैच के आईपीएस अधिकारी सुधीर शाही की गिनती ईमानदार अफसरों में की जाती है।व्यापम कांड में अपनी सख्ती के लिए भी उनका नाम लिया जाता रहा है लेकिन सुशोभन बैनर्जी की लापरवाहियों की ओर न तो सरकार और न ही अफसरशाही कोई निगाह कर रही है। अभी हाल ही में जन्माष्टमी के कार्यक्रम में जब जेल मंत्री सुश्री कुसुम सिंह मेहदेले स्वयं मौजूद थीं तब भी सुशोभन बैनर्जी महिला कैदियों में रुचि लेने में शर्म नहीं महसूस कर रहे थे। स्वयं वरिष्ठ मंत्री ने तब टिप्पणी की थी कि इस अफसर के बारे में अब तक तो वे बहुत सुनती रहीं हैं लेकिन ये तो उससे एक कदम आगे है। जेल मंत्री के आदेशों को रद्दी की टोकरी में फेंक देने की बदतमीजी बैनर्जी इसलिए ही करते रहे क्योंकि उन्हें वरिष्ठ पुलिस अफसरों ने अपने कार्यकाल के दौरान बेजा संरक्षण दे रखा था।
    अब जबकि उन्हें इस महत्वपूर्ण पद से हटा दिया गया है तब भी उनके खिलाफ किसी किस्म की विभागीय जांच नहीं खोली गई है। एक नाकारा और बेईमान अफसर को नौकरी में रखकर पालते रहने वाली शिवराज सिंह चौहान की मजबूर सरकार तरह तरह के वायदे करके लोगों को यकीन दिलाने में जुटी है कि वह जेलों की सुरक्षा के प्रति वचन बद्ध है। इसके बावजूद लोगो में मुठभेड़ को लेकर तरह तरह के सवाल उठ रहे हैं। भोपाल में तो इस मुठभेड़ को फर्जी बताने का माहौल बनाया जा रहा है। मुस्लिम समाज के जन प्रतिनिधियों ने इस मामले पर भारी प्रदर्शन की अनुमति मांगी थी जिसे प्रशासन ने शांति व्यवस्था बनाए रखने के नाम पर रद्द करवा दिया। इसके बावजूद कुछ मुस्लिम युवाओं ने इकबाल मैदान के समीप नारेबाजी करके अपना विरोध जताया।
    सरकार यदि इस मुठभेड़ कांड के बाद यदि अपनी गलती सुधारने की मंशा रखती है तो उसे अपनी जेलों में पनप रहे कुशासन पर लगाम लगानी होगी। अदालतों को भी उन कारणों पर विचार करना होगा जिनसे उनके आधिपत्य वाली जेलों में अराजकता के हालातों पर काबू पाया जा सके ।
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    सेंट्रल जेल भोपाल से बंदियों के फरार होने और मुठभेड़ की जाँच के बिन्दु तय

    आयोग का मुख्यालय भोपाल होगा, तीन माह में रिपोर्ट देगा
    राज्य सरकार द्वारा जाँच आयोग के गठन की अधिसूचना जारी
    भोपाल : सोमवार, नवम्बर 7, 2016,
    सेंट्रल जेल भोपाल से 30-31 अक्टूबर की दरम्यानी रात को आठ विचाराधीन बंदियों के जेल से भागने और मुठभेड़ में मृत्यु होने की घटना की जाँच के बिन्दु तय किये गये हैं। उल्लेखनीय है कि मुख्यमंत्री श्री चौहान ने घटना की जाँच के लिये उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश श्री एस.के. पाण्डे की अध्यक्षता में एक-सदस्यीय जाँच आयोग गठित करने की घोषणा की थी। जाँच आयोग का मुख्यालय भोपाल (मध्यप्रदेश) होगा। आयोग अधिसूचना के मध्यप्रदेश राजपत्र में प्रकाशन की तारीख से 3 माह के भीतर जाँच पूरी कर अपनी रिपोर्ट राज्य सरकार को प्रस्तुत करेगा।

    राज्य शासन ने जाँच आयोग और उसके जाँच के बिन्दु की अधिसूचना आज जारी की है। जाँच आयोग जेल से विचाराधीन बंदियों के फरार होने और ग्राम मनीखेड़ा थाना गुनगा जिला भोपाल के निकट पुलिस मुठभेड़ में बंदियों की मृत्यु की घटना की जाँच निम्न बिन्दुओं पर करेगा:-

    1. दिनांक 30-31 अक्टूबर की दरम्यानी रात में केन्द्रीय जेल भोपाल से आठ विचाराधीन बंदी किन परिस्थितियों एवं घटनाक्रम में जेल से फरार हुए? उक्त घटना के लिये कौन अधिकारी एवं कर्मचारी उत्तरदायी हैं?

    2. ग्राम मनीखेड़ा थाना गुनगा जिला भोपाल के निकट 31 अक्टूबर को फरार आठ बंदियों के साथ हुई पुलिस मुठभेड़, जिसमें सभी आठ बंदियों की मृत्यु किन परिस्थितियों एवं घटनाक्रम में हुई?

    3. क्या मुठभेड़ में पुलिस द्वारा की गयी कार्यवाही तत्समय विद्यमान परिस्थितियों में युक्ति-युक्त थी?

    4. कारागार से बंदियों के फरार होने की घटना की पुनरावृत्ति न हो, इसके संबंध में सुझाव।

    5. ऐसा अन्य विषय, जो जाँच के लिये अनुषांगिक हो।